ग्लास गिरा तो लगा- गुरु, अब तो नौकरी गई

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अपने घर के बाहर उदय सिन्हा

इंटरव्यू : उदय सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार और 'सहारा टाइम' के एडिटर) : भाग (1) : उन दिनों 'दी हिंदू' में काम करना किसी न्यूज एजेंसी में काम करने के बराबर था : बैकग्राउंड चूंकि जेएनयू और लेफ्ट पालिटिक्स का था, इसलिए स्थाई भाव व्यक्तित्व का स्थाई भाव नहीं था : 'अंग्रेजी प्रभात खबर' का अनुभव मेरे पत्रकारिता के जीवन का सबसे चैलें‍जिंग अनुभव रहा जहां फूल, अक्षत और नैवेद्य के बगैर मैंने पूजा संपन्न किया : भिखारियों को हाकर बनाए जाने की इस परिघटना पर बिड़ला इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालजी (बीआईटी) के प्रबंधन कोर्स के बच्चों ने रिसर्च और प्रोजेक्ट वर्क किए : उस क्षेत्र में मेरी रुचि का कारण जेएनयू में मेरा रूम मेट था जो आसामी था और दिल्ली की सत्ता को खूब गरियाता था : किसी अखबारी संस्था को समझने, गढ़ने और उसके साथ बड़े होने का मेरा गुवाहाटी का अनुभव अदभुत रहा : आज मुझे लगता है कि एलएमटी दिल से कितने बड़े व्यक्ति थे :


रांची से चेन्नई तक। कोलकाता से गुवाहाटी तक। लखनऊ से दिल्ली तक। हिंदी से अंग्रेजी तक। अखबार से मैग्जीन तक। छात्र राजनीति से पत्रकारिता तक। भावना से विचार तक। उदय सिन्हा ने अपने करियर में भौगोलिक, भाषाई और पेशेगत; कई तरह के छोरों को नापा है। कई किस्म के उतार-चढ़ावों को देखा व जिया है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने रांची से ‘प्रभात खबर अंग्रेजी’ अखबार को लांच कराया था और इस अखबार को बेचने के लिए भिखारियों की टीम को ट्रेंड किया। उदय सिन्हा हिंदी के अकेले पत्रकार हैं जिन्होंने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश का ह्वाइट हाउस में तब इंटरव्यू किया जब जार्ज बुश की चार दिनों के बाद भारत यात्रा प्रारंभ होने वाली थी। उन दिनों वे दैनिक भास्कर, दिल्ली के संपादक हुआ करते थे।

बिहार के रहने वाले और जेएनयू से पढ़े-लिखे उदय सिन्हा जब पत्रकारिता में आए तो सरोकार,  समाज व आम जन प्रमुख एजेंडे पर थे। सो, उन्होंने इस मिशन को आत्मसात किया और कई किस्म के प्रयोग किए। जो प्रयोग करेगा वह स्थिर नहीं रहेगा। बंधा नहीं रहेगा। उदय सिन्हा अपने जीवट के साथ इस जगह से उस जगह, इस बैनर से उस बैनर, चुनौतियों से हाथ मिलाते रहे। उन्होंने ‘द हिंदू’ के साथ काम किया। ‘संडे मेल’ के हिस्सा बने। ‘नार्थ इस्ट टाइम्स’ के संपादक के रूप में उल्फा के आंदोलन और उत्तर-पूर्व के जीवन को नजदीक से देखा। वे ‘स्वतंत्र भारत’ के संपादक रहे। ‘दी पायनियर’ के एडिटर बने। ‘दैनिक भास्कर’ के साथ काम किया।

उनके पास किस्से हैं। उनके पास दृष्टि है। उनके पास अनुभव है। उनके पास भाषा है। उनके पास योजनाएं हैं।

उदय सिन्हा के साथ उनके घर पर चाय पीते भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह

दर्जन भर हिंदी-अंग्रेजी अखबारों-पत्रिकाओं में प्रमुख पदों पर काम कर चुके उदय सिन्हा इन दिनों दिल्ली में सहारा समूह की अंग्रेजी मैग्जीन ‘सहारा टाइम’ के एडिटर हैं। सहृदय और सहज स्वभाव वाले उदय के साथ भड़ास4मीडिया  के एडिटर यशवंत सिंह  ने बीते दिनों उनके घर पर पत्रकारिता और निजी जीवन के बारे में लंबी बातचीत की।

पेश है इस रोचक बातचीत के अंश-


-आपने जर्न‍लि‍ज्‍म की शुरुआत कब और कैसे की?

--1982 में जेएनयू से समाजशास्‍त्र से एमए करने के बाद जर्न‍लिज्‍म की तरफ रुझान हुआ। 1975-78 में जेपी आंदोलन की वजह से बिहार पढाई के मामले में काफी डिस्‍टर्ब हुआ करता था। इस वजह से सारी यूनिवर्सिटीज दो साल लेट थीं। उस समय मैने जेएनयू में एडमि‍शन के लिए एग्‍जाम ‍दिया था। जेएनयू में तब केवल दिल्‍ली में ही सेंटर हुआ करता था। एग्‍जाम पास करने के बाद मेरा समाजशास्‍त्र और राजनीति शास्‍त्र में सेलेक्‍शन हुआ था। मैंने समाजशास्त्र चुना। जेएनयू में मैं 1978 से 1982 तक रहा जिसमें एक एमए का सेमेस्‍टर भी ड्राप हुआ था। जेएनयू में आने के बाद वहां के खुले माहौल में राजनी‍ति की लत लग गई सो एसएफआई (स्टूडेंट फेडरेशन आफ इंडिया ) में सक्रि‍य हो गया। जेएनयू की एसएफआई कमे‍टी का भी सदस्‍य रहा। चूंकि मैं कभी किसी राजनीतिक पार्टी का मेंबर नहीं रहा इसलि‍ए राजनीति में कदम बढाने की हिम्मत नहीं की।

-आपने किस अखबार से पत्रकारि‍ता आरंभ की?

--उस समय पत्रकारों का सबसे बड़ा सहारा दिल्‍ली प्रेस हुआ करता था। मैंने उसे ज्‍वाइन किया। चूंकि‍ मैं प्रारंभ से ही बाइलिंग्‍वल था, इसलि‍ए ‘कारवां’ नाम की अंग्रेजी मैग्‍जीन में सेलेक्‍शन हुआ। इसके साथ साथ ‘वूमेन्स एरा’ नाम की पत्रि‍का में भी आर्टिकल देने लगा। कारवां में मैने 6-7 महीने काम किया। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘रीडर्स डाइजेस्‍ट’ के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट’ में सेलेक्‍शन होने के बाद वहां चला आया। उस समय रीडर्स डाइजेस्ट के संपादक खुशवंत सिंह के पुत्र राहुल सिंह थे, और सर्वोत्तम के अर‍विंद कुमार। यहां मैंने मशहूर थिएटर एक्टिविस्ट ललि‍त सहगलजी के साथ काम करना शुरू किया। इनफैक्ट, नाटकों और फिल्म्स के प्रति मेरे रुझान की शुरुआत यहीं से हुई। सर्वोत्‍तम रीडर डाइजेस्‍ट में तकरीबन सवा दो साल काम किया। मासिक पत्रि‍का होने के कारण काम करने में मजा नहीं आता था। दूसरी परेशानी ये थी कि इस पत्रिका में इंडियन कन्‍टेंट न के बराबर हुआ करता था। अब महीने दर महीने 'लाफ्टर इज बेस्ड मेडिसीन' और 'आस्ट्रेलियाई ट्राइबल्स' पर कितना लिखा जाए और कितना पढ़ा जाए, लेकिन एक बात उनकी काबिल-ए-तारीफ थी, वह थी रिसर्च में उनकी आस्था। अगर डाइजेस्ट ने कहा कि दिल्ली से मेरठ 60 किमी की दूरी पर है, तो यकीन मानिए,  इस 60 किमी को फिजिकली वेरीफाई किया गया होगा। हम लोगों के लिए मजा बस इसी रिसर्च में था।

-इसके बाद आपने क्‍या किया?

--1984 में मैं राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहलाय परिषद (एनसीएसएम) में कलकत्ता आया और भारत सरकार का नौकर हो गया। यहां मेरी जिम्मेदारी उनके विज्ञान पत्रिकाओं और लीफलेट का संपादन करना था। उसी दौरान भारत सरकार ने फे‍स्‍टिवल ऑफ इंडिया के तहत अमेरिका और फ्रांस में प्रदर्शनी लगाने  पर सोचा। इस फेस्टिवल के लिए भारत के 2500 वर्षों के विज्ञान और तकनीकी के इतिहास पर प्रदर्शनी लगाई जानी थी। इसमें मूलतः रिसर्च वर्क था और परिषद के विभिन्न इंजीनियरों के साथ कोआर्डिनेशन और कांसेप्ट शेयरिंग का काम था। यहां यह बता दूं कि राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के जिम्मे भारत के विभिन्न शहरों में लोगों के बीच साइंटिफिक टेंपर विकसित करने के लिए विज्ञान संग्रहालयों की स्थापना और संचालन का काम था। इसके तहत दिल्ली का राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, बंबई का नेहरू विज्ञान केंद्र, कलकत्ता का बिड़ला विज्ञान केंद्र, बेंगलोर का विश्वसरैया विज्ञान केंद्र इत्यादि महत्वपूर्ण उदय सिन्हाविज्ञान केंद्रों की स्थापना की गई। इन्हीं विज्ञान केंद्रों के इंजीनियर्स ने फेस्टिवल आफ इंडिया के लिए विज्ञान और तकनीकी पर विभिन्न पैनल विकसित किए। मेरा काम उनके बीच विभिन्न पौराणिक टेक्स्ट्स को पढ़कर उसके कंटेंट को सहज रूप में प्रस्तुत करना था। मैंने इस काम को बेहद गंभीरता से लिया। इस प्रोजेक्‍ट के समाप्‍त होने के बाद वहां करीब डेढ़ साल और काम किया।  धीरे-धीरे विज्ञान केंद्र की नौकरी पुरानी सरकारी पीली फाइलों और हरे नोटशीट वाले ढर्रे पर उतर आई।

1986 की शुरुआत में ही इसे छोड़कर मैंने अंग्रेजी के प्रसिद्ध अखबार दी हिंदू को चेन्नई जाकर ज्वाइन कर लिया। तब हिंदू के दिल्ली आने की बात थी और वहां का संपादकीय प्रबंधन उत्तर भारत में अपने ब्यूरो को मजबूत करना चाहता था। तब हिंदू एक ट्रेडीशनल और कंजर्वेटिव अखबार था। द हिंदू में मैंने बतौर रोविंग करेस्‍पांडेंट ज्‍वाइन किया। बाद में लखनऊ चला आया। हालांकि लखनऊ में हिंदू के विशेष संवाददाता काफी सक्रिय पत्रकार थे। लेकिन रोविंग करेस्पांडेंट की भूमिका घूम-घूम कर रिपोर्ट फाइल करने की थी। मुझे उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त बिहार और मध्य प्रदेश से राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर रिपोर्ट फाइल करने की जिम्मेदारी दी गई थी। वहां मजा तो बहुत आया लेकिन उस समय एक साधारण रिपोर्टर को हिंदू में बाइलाइन देने की परंपरा नहीं थी। बाइलाइन सिर्फ बड़े लोगों को ही मिलती थी। यानि, हिंदू में काम करना किसी न्यूज एजेंसी में काम करने के बराबर था। अपने करियर के शुरुआती दिनों में अगर अखबार में आपने अपना छपा हुआ नाम नहीं देखा तो क्या देखा। बाइलाइन को लेकर मेरे अंदर एक कुंठा पनप रही थी। बैकग्राउंड चूंकि जेएनयू और लेफ्ट पालिटिक्स का था, इसलिए स्थाई भाव व्यक्तित्व का स्थाई भाव नहीं था। तब उम्र भी कम थी। जज्बा और जोश बहुत ज्यादा था। आगे बढ़कर खेलने की ललक थी।

दी हिंदू में 1987 के आरंभ तक रहा। इसी समय रांची के कांग्रेसी राजनीतिज्ञ ज्ञानरंजन अपने हिंदी अखबार प्रभात खबर का अंग्रेजी संस्करण निकालना चाहते थे। चूंकि ज्ञानरंजन मेरे रिश्तेदार थे, इसलिए वहां बात पट गई और मैं अंग्रेजी प्रभात खबर निकालने रांची आ गया। लांच होने वाले इस नए अंग्रेजी प्रभात खबर के साथ तरह-तरह के एक्‍सपेरीमेंट किए गए। डीटीपी मशीन लगाने के लिए न तो समय था, न ही पैसे। सो, इलेक्‍ट्रानिक टाइपराइटर पर इस अखबार को निकालने की परि‍कल्‍पना की गई। टाइपराइटर का फांट साइज चूंकि बड़ा था, इसलिए विचार हुआ कि गैलीज की पेस्टिंग 20 प्रतिशत ज्यादा बड़े साइज वाले न्यूजप्रिंट पर किया जाए फिर बाद में इसे कैमरा पर 20 प्रतिशत रिड्यूस करके तब प्रचलित अंग्रेजी के फांट साइज के आसपास कर लिया जाए। इस प्रकार 1988 के अगस्त माह में मैं संपादक हो गया और रांची से तमाम मशक्कत के बाद आठ पृष्ठों का अंग्रेजी अखबार निकालना शुरू किया। आरंभिक दिनों में इस अखबार में प्रूफ रीडर से लेकर एडिटर तक की जि‍म्‍मेदारी निभाने का काम किया। अंग्रेजी प्रभात खबर का अनुभव मेरे पत्रकारिता के जीवन का सबसे चैलें‍जिंग अनुभव रहा जहां फूल, अक्षत और नैवेद्य के बगैर मैंने पूजा संपन्न किया।

-इसमें सबसे ज्‍यादा चैलें‍जिंग क्‍या रहा?

--उस समय रांची से अंग्रेजी में दैनिक पत्रकारिता की शुरुआत हो रही थी क्योंकि इस शहर में अंग्रेजी का कोई दैनिक अखबार नहीं हुआ करता था । चैलेंजिंग इसलि‍ए क्‍योंकि उस समय रांची शहर में कोई ट्रेंड सब एडिटर भी नहीं मिला करता था। मैंने सेंट जेवि‍यर्स कॉलेज और रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग के अंग्रेजी के कुछ प्राध्‍यापकों को अपने साथ जोड़ा। उसमें से कुछ तो आज भी पत्रकारिता से जुड़े हैं और रांची के स्थापित पत्रकार हैं। लेकिन यह काफी नहीं था। अखबार को चलाने के लिए कम से कम दस वर्किंग हैंड की जरूरत थी। मैंने यह पता लगाया कि शहर में अंग्रेजी ऑनर्स से स्नातक से किए ऐसे कितने छात्र हैं जो बेकार बैठे हैं। मैंने ऐसे स्नातकों को अखबार के साथ जोड़ा और आठ-दस लोगों की एक टीम तैयार कर ली। खुद एक अटैची में तीन जोड़ी कपड़े लेकर आफि‍स में ही डेरा डाल दिया। दिन में टाइपराइटर नुमा डीटीपी पर काम करता और रात को वहीं मेज पर न्यूजप्रिंट बिछाकर सो जाता।

अखबार तो निकलने लगा पर अब एक और संकट की बारी थी। उस समय कोई सरकुलेशन एजेंट इस अखबार के लिए सिक्योरिटी मनी देने को तैयार नहीं था क्‍योंकि सबको शक था कि अखबार चले न चले। लेकिन हमारी जिद थी कि रांची में अंग्रेजी अखबार बंटवाएंगे भी और पढ़वाएंगे भी। सो, मैंने सरकुलेशन के ‍लिए एक रिस्‍क ‍लिया। शहर के ‍भिखमंगों की एक टीम खड़ी की। बस स्‍टाप, रेलवे स्‍टेशन और तमाम ऐसी जगहों जहां लोगों का आना-जाना होता था, वहां भिखारियों की छोटी-छोटी वर्कशाप की और उन्हें यह समझाया कि अखबार बेचकर पैसा कमाओ और भिखारी कहलाने से निजात पाओ।

मैंने शुरुआत में प्रति अखबार की बिक्री पर पचास नए पैसे देने का निर्णय लिया। अखबार की कीमत मात्र एक रुपये थी। इस प्रकार मैंने प्रति अखबार भिखारीनुमा हाकर को पचास प्रतिशत के मुनाफे का भागीदार बनाया। आरंभ में तो कुछ परेशानी हुई लेकिन महीना जाते-जाते बस स्टाप, रेलवे स्टेशन, मुख्य फिराया लाल चौक, सदर अस्पताल, एचईसी गेट और रांची मेडिकल कालेज अस्पताल मिलाकर अंग्रेजी प्रभात खबर की सेल लगभग पंद्रह सौ कापी तक पहुंच गई। भिखारीनुमा हाकरों के बीच कुछ विवाद होने पर मैंने भिखारियों के बीच के सबसे नौजवान व सक्रिय भिखारी को उनका इंचार्ज बनाया और प्रभार उसी को सौंप दिया। इसमें रिस्क सिर्फ एक बात की ही थी कि मैं जितनी प्रतियां उन्हें सप्लाई करता था, उसके एवज में मैं कोई अग्रिम डिपाजिट नहीं लेता था। इस तरह के सेल्‍स एक्टिविटी की शुरुआत होने के बाद सरकुलेशन विभाग में एक नौजवान मैनेजर को एप्वाइंट किया। भिखारियों को हाकर बनाए जाने की इस परिघटना पर बिड़ला इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालजी (बीआईटी) के प्रबंधन कोर्स के बच्चों ने रिसर्च और प्रोजेक्ट वर्क किए।

बाद में प्रभात खबर को वहां के एक मशहूर उद्यम समूह ऊषा मार्टिन ने खरीद ‍लिया। मैं रांची ज्ञानरंजन के लिए आया था। ज्ञानरंजन के प्रबंधन में नहीं रहने पर मैंने उचित समझा कि अंग्रेजी प्रभात खबर को नमस्कार किया जाए।  मेरे जाने के बाद इस प्रयोग को कोई आगे तक नहीं ले जा पाया और छह महीने के अंदर अखबार बंद हो गया।

-इसके बाद?

--इसके बाद मैं फरवरी 1990 में कलकत्‍ता आया। कलकत्ता में मेरी यह दूसरी पारी थी। इस बार संडे मेल का इंचार्ज बनकर आया। संडे मेल चार मेट्रो सिटीज से अखबारी साइज में एक साथ छपने वाला साप्‍ताहिक अखबार था। अखबारी साइज में छपने वाली दूसरी पत्रिकाएं संडे आब्जर्वर और दिनमान टाइम्स थीं। संडे मेल में अंग्रेजी के संपादक थे टीवीआर शिनाय और हिन्‍दी के संपादक थे कन्‍हैया लाल नंदन। चूंकि मैं बाइलिंग्वल था, इसलिए दोनों अखबारों में मैं धड़ल्ले से छपता था और दोनों संपादकों का चहेता बन गया।

चूंकि इससे पहले भी मैं एक बार कलकत्‍ता रह चुका था और मेरे यहां काफी सारे मि‍त्र बन चुके थे, तो मुझे ऐसा लगता था कि केवल कलकत्‍ता ही ऐसा शहर है जिसके साथ मैं अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से संवाद स्थापित कर सकता था। अब, ऐसा ही कुछ लखनऊ और दिल्ली के बारे में लगने लगा है। मेरे रहते कलकत्ता में संडे मेल का सरकुलेशन 60 हजार से अपनी पत्नी के साथ 'सहारा टाइम' पढ़ते उदय सिन्हाउपर पहुंच गया था। अंग्रेजी संस्करण भी 30 हजार से उपर बिकता था। उस समय बरनाली मित्रा अंग्रेजी संडे मेल की इंचार्ज हुआ करती थीं। इन दिनों वे देश के नवरत्नों में से एक स्टील अथारिटी आफ इंडिया के कारपोरेट कम्युनिकेशन में बड़े पद पर कार्यरत हैं। संडे मेल के साथ अच्‍छा समय बीता। कलकत्ता और बंगाल के समाज को जानने-समझने का मौका मिला। इसी दौरान बांग्लादेश में चुनाव होने का निर्णय हुआ। मैं कलकत्ता से ढाका चुनाव कवर करने के लिए भेजा गया। इस चुनाव को पूरे विश्व में बहुत ज्यादा कवरेज मिला था क्योंकि डिक्टेटरशिप वाले बांग्लादेश में यह पहला लोकतांत्रिक मतदान था। बहुत यादें हैं संडे मेल की। पर आगे बढ़ते हैं। यहां मैं 1993 के आरंभ तक रहा।

इसी दौरान उत्तर पूर्व में चल रहे उल्फा आंदोलन में मेरी रुचि जगी। मैं उस आंदोलन को अंदर से समझना चाहता था और असम व उत्तर पूर्व के समाज को करीब से देखना भी चाहता था। यह समझना चाहता था कि क्यों वह समाज हिंदुस्तान से अलग होने पर आमादा है। उस क्षेत्र में मेरी रुचि का कारण जेएनयू में मेरा रूम मेट था जो आसामी था और दिल्ली की सत्ता को खूब गरियाता था। बाद में मेरा यही रूम मेट प्रद्युत बोरदोलोई असम की कांग्रेसी सरकार में मंत्री बना और आज वो मुख्य धारा और दिल्ली के बहुत बड़े हिमायती हैं। उस समय गुवाहाटी से नार्थ इस्‍ट टाइम्‍स, आसाम ट्रि‍ब्यून और सेंटीनल नाम के तीन मुख्य अखबार निकलते थे। एडिटर्स गिल्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष और असम के जाने-माने पत्रकार डीएन बेजबरूआ सेंटीनल के संपादक हुआ करते थे, जिन्हें मैं असम की राजनीति समझने के लिए अपना आदर्श मानता था। जीएल पब्लिकेशन के मालिक जीएल अग्रवाल नार्थ इस्ट टाइम्स निकालते थे। मुझे उस अखबार से संपादक बनने का आफर आया और मैं गुवाहाटी चला गया। किसी अखबारी संस्था को समझने, गढ़ने और उसके साथ बड़े होने का मेरा गुवाहाटी का अनुभव अदभुत रहा।

-आप कलकत्ता में दुबारा गए तो लखनऊ में भी दुबारा वापस आए, कैसे हुआ यह?

--गुवाहाटी में अपने कार्यकाल के दौरान एक दिन सुबह एक फोन आया। फोन सजीव कंवर का था जो संडे मेल के सीईओ थे और उन दिनों दी पायनियर अखबार के सर्वेसर्वा थे। उन्होंने पहला सवाल किया कि क्या मैं गुवाहाटी से लखनऊ जाना चाहता हूं। मैंने पूछा, क्या करने। उन्होंने कहा- स्वतंत्र भारत की संपादकी करने और बाद में दी पायनियर की रेजीडेंट एडीटरी करने। मुझे मालूम था कि स्वतंत्र भारत, लखनऊ के तत्कालीन संपादक घनश्याम पंकज जी थे। मुझे कहीं हलका आभाष हुआ कि स्वतंत्र भारत में सब कुछ भला चंगा नहीं है। फिर भी, मैंने कहां कहा और सजीव कंवर ने दी पायनियर / स्वतंत्र भारत के तत्कालीन मालिक ललित मोहन थापर से मेरा साक्षात्कार तय करा दिया। मैं मई 1995 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली आया और अमृता शेरगिल मार्ग स्थित दिवंगत एलएम थापर के घर पर साक्षात्कार देने पहुंचा। साथ में सजीव कंवर भी थे।

मेरा इंटरव्यू सफल रहा और मुझे सिर्फ पंद्रह दिनों का समय उदय सिन्हामिला। कहा गया कि गुवाहाटी से बोरिया-बिस्तर समेटिये और लखनऊ पहुंच जाइए। सो मैं लखनऊ आ गया। तनख्वाह बढ़ गई। साथ में, एक एंबेसडर कार की सेवा भी मिल गई। दो साल तक गुवाहाटी के दूरस्थ इलाके में काम करने के बाद 1995 में मैं लखनऊ वापस आया था। बड़े पद, ज्यादा तनख्वाह और अपने लोगों के बीच भी मैं पूर्वोत्तर भारत को भूल न पाया। खासकर, जिन लोगों ने मेरे साथ शानदार काम किया, उन्हें हिंदी पट्टी के अच्छे पत्रकारों के मुकाबले कुछ मामलों में बेहतर पाया। उनके अंदर भारत वर्ष को लेकर जो समझ थी, वो यथार्थपरक, व्यापक और ज्यादा आब्जेक्टिव थी। तो मैंने तीन असमिया सब एडिटरों को लखनऊ में काम करने के लिए आमंत्रित किया। इनमें एक श्री सैकिया हैं। इनका पूरा नाम मैं भूल रहा हूं। दूसरे राहुल कर्मकार जो इन दिनों गुवाहाटी हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत हैं। और, तीसरे जयदीप मजूमदार जो फिलवक्त कलकत्ता में हैं। ये लोग मेरे साथ नार्थ इस्ट टाइम्स, गुवाहाटी में काम कर चुके थे। ये तीनों आए भी और छाए भी।

-बड़े लोगों के बड़े नखरे होते हैं। थापर साहब का बड़ा नाम सुना है। वे अब इस दुनिया में नहीं है। उनसे आपका आमना-सामना कैसा रहा?

--आपको बता दें, थापर साहब का पूरा नाम ललित मोहन थापर था जिन्हें एलएमटी कहकर संबोधित किया जाता था। उनके व्यक्तित्व का अंदाजा आप सिर्फ एक घटना से लगा सकते हैं वो कितने सहज, संत स्वभाव और उदार थे। जब मैं उनके सामने पहुंचा तो उस वक्त दिन के साढ़े ग्यारह-बारह का समय रहा होगा। एलएमटी नीले सिल्क गाउन में लिविंग रूम में बैठे थे। मुझे वहां ले जाया गया।

उन्होंने मुझसे पूछा- क्या पियोगे।

मैंने देखा, वे खुद दोपहर के खाने के पहले कुछ पी रहे थे। मेरे से पहले कंवर साहब बोले- वोदका।

मैंने कहा- लस्सी।

थापर साहब ने आदेश दे दिया। मैं उस शख्सीयत के सामने इतना घबड़ाया था कि आर्डर सर्व होने के बाद हड़बड़ी में लस्सी भरा ग्लास मेरे हाथों से छूट गया और उनके पर्शियन कारपेट पर दही मुझे मुंह चिढ़ाते हुए रायता जैसा फैल गया।

मेरी हालत क्या रही होगी, इसकी आप सिर्फ कल्पना भर कर सकते हैं। मुझे लग गया- गुरु, अब तो नौकरी गई।

थापर साहब ने क्षण भर के लिए मुझे देखा फिर मुस्कराए। कुछ ड्रामाई अंदाज में उन्होंने पूछा- उदय, तुम्हें मालूम है कि कार्पेट पर अगर दही गिर जाए तो उसे कैसे साफ करेंगे?

मैंने सिर्फ ना में सिर हिलाया और धीरे से बुदबुदाया- मेरे घर पर कार्पेट नहीं है।

एलएमटी ने कहा- मैं तुम्हें सिखाता हूं, कार्पेट पर फैल चुके दही को कैसे साफ किया जाता है।

उन्होंने बावर्ची को सोडा वाटर की एक बोतल लाने को कहा। बोतल हाथ में आते ही उन्होंने उसे विजयी भाव में शैंपेन की बोतल की तरह हिलाया और फिर पिचकारी की तरह कार्पेट पर पसरे दही पर स्प्रे किया। आश्चर्य के साथ मैंने देखा कि दही का निशान काफी कुछ मिट चुका था। दरअसल, यह सब कुछ उन्होंने मुझे सामान्य करने के लिए किया। लेकिन मुझे संतोष इस बात का था कि मैं उनके कार्पेट को खराब करने का दोषी अब नहीं रहा। आज मुझे लगता है कि एलएमटी दिल से कितने बड़े व्यक्ति थे।

मुझे इस बात का फक्र है कि उन्होंने मुझे स्वतंत्र भारत और दी पायनियर, लखनऊ का संपादक नियुक्त किया।

...जारी....


उदय सिन्हा से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या फिर 09953944011 के जरिए किया जा सकता है.

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