लगता था, क्रांति अगले बस स्टाप पर खड़ी है

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उदय सिन्हा से बातचीत करते यशवंत सिंह.

इंटरव्यू : उदय सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार और 'सहारा टाइम' के एडिटर) : भाग (2) : बड़ा संपादक तो मालिक का दुलारा होता है, जाना तो छोटे को ही पड़ेगा :  बड़े संपादक को यूपी और बिहार के लोगों से जबरदस्त चिढ़ : सुधीर अग्रवाल के संपादकीय जुनून का कायल हूं : सहाराश्री से मैंने हमेशा पाजिटिव सोचना और करना सीखा :  चंदन मित्रा के रहते मैं पायनियर का संपादक नहीं बन सकता था : आप स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने के लि‍ए स्‍वतंत्र नहीं है : आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्‍ट फूड ज्‍वाइंट जैसा हो गया है : आज के टीवी जर्नलिस्ट एंटरटेनर ज्यादा हैं :

-आपने पायनि‍यर क्यों और कब छोड़ा?

--देखिए, किसी भी एक वजह से कोई व्‍यक्‍ति‍ कभी संस्‍थान को नहीं छोड़ता। लेकिन एक समय के बाद नौकरी चलाते जाना इशू नहीं होता। इशू होता है ग्रोथ का। ग्रोथ सिर्फ पद और पैसे से नहीं बल्कि ग्रोथ अपने आपका। अपने अंदर के जर्नलिस्ट का। और, एक इच्छा होती है कि यहां तक तो आ गए, अब कुछ और हासिल करें। पायनियर, लखनऊ के लगभग आठ साल तक के संपादकत्व के बाद मेरा तबादला पायनियर, दिल्ली में बतौर कार्यकारी संपादक हुआ। दिल्ली आया तो दिल्ली वाली इच्छाएं भी जाग्रत हुईं। मसलन, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विदेश मंत्री, गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण मंत्रियों के साथ की जाने वाली यात्राओं के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। यह जानने की इच्छा होने लगी कि हैदराबाद हाउस में दूसरे राष्ट्र से आए राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों के सम्मान में दिया जाने वाला भोज (बैंक्वेट) का स्वरूप कैसा होता होगा, कौन कहां बैठता होगा, कैसे इसकी शुरुआत होती होगी और कैसे समापन। मेरे खयाल से दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच सरकुलेट होने वाली जगह है यह।

मैं यह भी सोचता था कि पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को राष्ट्रपति का एट होम कैसे होता होगा। किस स्तर के लोग वहां बुलाए जाते होंगे। इत्यादि-इत्यादि। जब ये इच्छाएं पैदा हुईं तो अपने अखबार में बेचैनी भी पैदा होने लगी। क्योंकि, इन तमाम जगहों पर, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ की जाने वाली तमाम यात्राओं में संपादक जी का नाम ही सर्वोपरि होता था। यानि, जब तक मैं पायनियर का संपादक नहीं हूं, तब तक मैं यह सब नहीं पा सकता था। और पायनियर का संपादक मैं हो नहीं सकता था क्योंकि पायनियर का मालिकाना हक श्री चंदन मित्रा जी के पास था। दूसरी बात जो कहीं न कहीं डिस्टर्ब करती थी वह थी पायनियर का साफ-साफ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में खड़ा होना। उन्‍हीं दिनों संपादक जी (चंदन मित्रा) भाजपा के सहयोग से राज्‍यसभा में आए थे और भारतीय जनता पार्टी की खबरों की हमारे अखबार (दी पायनियर) में प्रमुखता थी। अब ये एक सैद्धान्‍ति‍क मसला था कि यदि‍ कोई व्‍यक्‍ति‍ राज्‍यसभा में आ गया तो उसे अखबार का संपादक होना चाहि‍ए या नहीं। वो राष्‍ट्रपति‍ द्वारा नामित सदस्य थे इसलिए विपक्ष के साथ राष्‍ट्रपति‍ को ज्ञापन देने से उन्हें बचना चाहिए था। दूसरे अखबारों में काम करने वाले मेरे मित्र और जेएनयू का मेरा मित्र मंडल इस पर मुझे काफी छेड़ता था। मेरे एक मित्र सतीश मिश्रा जो मुझसे वरिष्ठ थे और लखनऊ के थे, उन्होंने तो प्रेस क्लब में मुझसे मिलने पर यहां तक कह दिया कि ‘अगर वहां (दी पायनियर) हो तो मुझसे बात मत करना’।

यह सब तो मन में चल ही रहा था, फिर मुझे लगा कि यहां बहुत ग्रोथ नहीं है। उसी समय एक दिन दैनिक भास्कर के प्रबंध निदेशक श्री सुधीर अग्रवाल का फोन आया। वे मुझसे मिलना चाहते थे। जाहिर है कि अगर मालिकान मिलना चाहते हैं तो वे मन बना चुके होते हैं। खैर, मैंने इस बाबत श्री चंदन मित्रा से बात की कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस ग्रोथ की बात तुम हमेशा करते हो, मुझे लगता है कि वह ग्रोथ तुम्हें वहां मिलेगा। तुम्हें वहां चले जाना चाहिए। मुझे भी लगा कि मैं पायनियर में कार्यकारी संपादक हूं और मेरे लिए करने के लिए  कुछ खास नहीं है क्योंकि कार्यकारी संपादक के निर्णय कुछ ही ‍स्‍थिति‍यों में प्रभावी होते हैं। अखबार की दिशा तय करने में उसकी कोई भूमि‍का नहीं होती। सो, मैंने भास्कर से मिले प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यह दूसरी बात है कि दी पायनियर छोड़ने के बाद भी छह महीने तक प्रिंट लाइन में मेरा नाम जाता रहा। संभवतः ऐसा करके श्री चंदन मित्रा ने मेरे प्रति अपने विश्वास और अनुराग को पब्लिकली अभिव्यक्त किया।  2004 के मई माह में बतौर कार्यकारी संपादक दैनिक भास्कर में कार्य प्रारंभ किया। आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि भास्‍कर ज्‍वाइन करने के दस दिन पहले ही दी पायनि‍यर का भोपाल संस्‍करण लांच हुआ था।

-दैनिक भास्‍कर के आपके कार्यकाल में खास चीजें क्या हुईं?

--भास्‍कर में मेरे कार्यकाल के दौरान अखबार की बेहतरीन ब्रांडिंग हुई। भास्कर को एक बड़े मीडिया हाउस के रूप में आई एंड बी मंत्रालय ने स्वीकार किया। मेरे भास्कर ज्वाइन करने के पहले भास्कर का पीआईबी का कोटा चार का हुआ करता था, जो मेरे जमाने में बढ़कर चालीस का हुआ। भास्कर के पास महत्वपूर्ण व्यक्तियों के तमाम देशी-विदेशी दौरों के निमंत्रण आने लगे। उस दौरान भास्कर को  देश के सबसे बड़े हिंदी अखबार के रूप में दिल्ली की दुनिया में स्थापित करना ही मेरा उद्देश्य था। इस दुनिया में चाणक्यपुरी भी शामिल था जहां महत्वपूर्ण देशों के दूतावास हैं। अमेरिकन एंबेसी में भास्कर की ब्रांडिंग इतनी अच्छी हुई कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के भारत दौरे के ठीक पहले उनके इंटरव्यू के लिए दैनिक भास्कर निमंत्रित हुआ। निमंत्रण भले ही अखबार को था, लेकिन यह अखबार के व्यक्ति विशेष के लिए था। अखबार चाहकर भी मेरी जगह किसी और व्यक्ति को जार्ज बुश के इंटरव्यू के लिए वाशिंगटन डीसी नहीं भेज सकता था। सो मैं वाशिंगटन गया और ह्वाइट हाउस में तत्कालीन राष्ट्रपति का साक्षात्कार किया।

जार्ज बुश से बातचीत करते उदय सिन्हा. फाइल फोटो

तब अदभुत लग रहा था सब; बिहार के आरा से वाशिंगटन के ह्वाइट हाउस तक की यात्रा। जार्ज बुश का यह साक्षात्कार अगले दिन दैनिक भास्कर के सभी ढाई दर्जन संस्करणों, भास्कर के गुजराती अखबार दिव्य भास्कर के सभी संस्करणों और अंग्रेजी अखबार डीएनए के पहले पेज की एकमात्र खबर थी। पर मुझे थोड़ा अफसोस यह हुआ कि यह इंटरव्यू मेरी कर्मभूमि बिहार और उत्तर प्रदेश में नहीं प्रकाशित हुआ, इसलिए क्योंकि इन जगहों पर भास्कर नहीं छपता था, अब भी नहीं छपता है। इसके अलावा तब निर्वतमान प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने दैनिक भास्कर को इंटरव्यू के लिए समय दिया। प्रधानमंत्री जी का यह अंतिम साक्षात्कार भी भास्कर के सभी संस्करणों मे प्रथम पृष्ट पर छपा।

उदय सिन्हा द्वारा जार्ज बुश का लिया गया इंटरव्यू दैनिक भास्कर के पहले पन्ने की पहली खबर बनी.

अमेरिका ही नहीं, भास्कर के कार्यकाल के दौरान मैंने सभी महत्वपूर्ण देशों की यात्रा की और कई ऐतिहासिक मोमेंट्स का साक्षी रहा। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की नटवर सिंह जी के साथ की गई यात्रा काफी एनरिचिंग रही। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत का योगदान और पाकिस्तान के साथ कानफिडेंस बिल्डिंग मेजर्स (सीबीएम) के आरंभिक दौर का साक्षी रहा। कई नेताओं को करीब से समझने और जानने का मौका मिला। जैसे इसी दौरान मैंने यह जाना कि भूतपूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह जी भयंकर पढ़ाकू हैं। दिल्ली से कजाकिस्तान की एक यात्रा के दौरान मैंने देखा कि उन्होंने कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना उतरने के पहले  चंगेज खां पर एक पुस्तक खत्म कर ली थी। यह भी देखा कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले राष्ट्रपति महोदय के एट होम की गेस्ट लिस्ट में शामिल होने के लिए कितनी अफरा-तफरी मची रहती है। हैदराबाद हाउस में होने वाले बैंक्वेट डिनर में शामिल होने के लिए लोग कितनी लाबिंग करते हैं।

मैंने यहां ढाई साल काम किया। यहां और ज्यादा काम करने की गुंजाइश इसलिए नहीं थी कि मेरे वाशिंगटन जाने से मुंह फुलाए एक बड़े संपादक मेरी जान के पीछे पड़े थे। वे कई बार मुझे यह सुना चुके थे कि मेरे द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए जार्ज बुश के इंटरव्यू का हिन्दी अनुवाद उन्होंने किया था। मै चाह कर भी उन्हें यह नहीं समझा पाया कि मैंने अंग्रजी में इंटरव्यू इसलिए फाइल किया क्योंकि मेरे लैपटाप में हिन्दी के फान्ट नहीं थे, और वाशिंगटन डीसी में ऐसा कोई साइबर कैफे भी नहीं था जहां से हिन्दी में काम किया जा सके। बार-बार मुझे यह कहकर संभवत: यह बताना चाह रहे थे कि अगर वे अमेरिका जाते तो उनकी कापी हिन्दी में आती। लाख प्रयास के बावजूद वे मेरे साथ सहज नहीं हो पाते। उन्होंने मुझे परेशान करने के लिए हर संभव प्रयास किए। मैंने भी सोचा कि बड़ा संपादक तो मालिक का दुलारा होता है। जाना तो छोटे संपादक को ही पड़ेगा। उनके बाडी लैंग्वेज को ध्यान में रखते हुए मानसिक रूप से मैंने भास्कर छोड़ने का मन बना लिया।

बड़े संपादक महोदय हमेशा एक मूक संदेश देते रहते-'जंगल में एक ही शेर रहता है, यह मेरा इलाका है इसलिए उदय जी आप यहा से रास्ता नापिए।' बड़े संपादक महोदय कि एक और खासियत थी। वह थी बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों से उनकी जबरदस्त चिढ़। उन्होंने संस्थान में एक मुहिम भी चलाई थी कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को वहां नौकरी न दी जाए। लेकिन ऐसा संभव नहीं था। ये तो सब चल ही रहा था, ओवरआल मुझे यह लगने लगा था कि  भास्‍कर समूह के मालिकों को दिल्‍ली संस्करण के प्रति ज्यादा रुचि नहीं थी। तो इस तरह मैंने भास्कर में ढाई साल (मई 2004 से अक्‍टूबर 2006 तक) काम करने के बाद वहां से मुक्त हुआ और सहारा समूह ज्वाइन कर लिया। भास्कर के प्रबंध निदेशक सुधीर अग्रवाल जी की संपदाकीय सोच बहुत अच्छी थी। सबसे अच्छी बात थी कि वे अखबार के पहले पृष्ट से लेकर अंतिम पृष्ट तक समान भाव से रुचि लेते थे। मैं आज भी उनके संपादकीय जुनून का कायल हूं।

-सहारा समूह का सदस्य कैसे बने?

--दरअसल जब मैं भास्कर में था तो उन्ही दिनों सहारा समूह के अभिभावक सहाराश्री जी से मुलाकात हुई। चूंकि मैं इसके पहले लखनऊ में आठ वर्षों तक पायनियर में काम कर चुका था, इसलिए इस समूह से मेरा भावनात्मक लगाव भी था। सहाराश्री जी ने बहुत लाड़ से कहा कि लखनऊ वापस आ जाओ। इस सस्नेह आमंत्रण  में जाने क्या दम था कि मैंने तुरंत हामी में सिर हिला दिया। मन ही मैंने इसे आदेश माना। ऐसा शायद सहाराश्री जी के चुंबकीय व्यक्तित्व की वजह से हुआ। इस प्रकार मै इस सबसे बड़े परिवार का सदस्य बन गया। पहले मैंने लखनऊ में चेयरमैन ऑफिस में ज्‍वाइन किया। कुछ दिन वहां रहने के बाद मुझे डेपुटेशन पर नोएडा आफिस भेजा गया जहां सहारा समूह की पत्रिका सहारा टाइम के स्‍वरूप को बदलने का जिम्मा दिया गया।

मैंने सहारा टाइम को अखबारी साइज से मैग्जीन साइज में स्वरूप बदला और अभी तक मैं इसका संपादक सह प्रोजेक्ट हेड के तौर पर अपना योगदान दे रहा हूं। सहाराश्री जी से मैंने एक बात सीखी है और वह है उनकी हमेशा सकारात्मक सोच। मैंने उनसे पाजिटिव सोचना और करना सीखा है। पत्रकारीय जीवन की यह  मेरे लिए एक उपलब्धि है। हर पत्रकार तब तक असफल है, वह चाहे करियर का मामला हो या जीवन जीने का, जब तक वह अपनी दृष्टि और सोच में पाजिटिव नहीं होता। जब हम पाजिटिव होते हैं तो हमारे अंदर की ढेर सारी दबी-छुपी ऊर्जा भी चैनलाइज होने लगती है और हम ऐसे असंभव काम भी संभव कर दिखाते हैं जो शायद पाजिटिव थिंकिंग के अभाव में हम करने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। जिंदगी में आप हमेशा सीखते रहते हैं पर पाजिटिव सोचने, जीने और करने की सीख बहुत कम लोग सिखा पाते हैं। यह सीख मुझे सहाराश्री जी से मिली। संभवतः इसी सोच के कारण उन्होंने इतना बड़ा समूह खड़ा कर दिया। अगर उद्यमशीलता, सकारात्मक सोच और मानवीय प्रवंधन पर कोई बात हो तो सहाराश्री जी पर चर्चा के बगैर वह बात पूरी नहीं हो सकती।

-जब आपने पत्रकारिता प्रारंभ की उस समय एक अलग माहौल हुआ करता था, आज एक अलग। इन 26 सालों का विश्‍लेषण कैसे करेंगे?

--हम लोग पत्रकारि‍ता में समाज को बदलने के आदर्शवाद को लेकर आए थे। इसके लिए घर में विरोध भी झेलना पड़ा था। जिस समय हम लोग पत्रकारिता में आए उस समय के पत्रकार सिस्‍टम के विरोध में थे। उन्‍हें तत्‍कालीन व्‍यवस्‍था में खोट नजर आता था और ऐसा लगता था कि इसमें चेंज होना चाहिए। सिस्‍टम के विरोध में होने के कारण सिस्‍टम का हिस्‍सा नहीं बन सकते थे।

उन दिनों हम लोगों में एक अजीब किस्म के रोमांटिसिज्म ने जन्म लिया। लगने लगा कि समाज का यह ढांचा ठीक नहीं है। हम 'हम होंगे कामयाब...' गाते और क्रान्ति के सपने पालते। लगता जैसे 'क्रांति' अगले बस स्टाप पर हमारा इंतजार कर रही हो। हमे सिर्फ वहां तक पहुंचना है और क्रांति को अमलीजामा पहना देना है। पर पत्रकारि‍ता में आने के 6-7 साल के अंदर ही मेरा यह भ्रम टूट गया।

-जेएनयू में क्‍या सपना लेकर आए थे?

--पिताजी चाहते थे कि मैं एक सरकारी अधिकारी बनूं जबकि‍ मेरा ‍शिक्षक बनने का सपना था। लेकिन जेएनयू का ऐकैडमिक स्वरूप, वहां की जनतांत्रिक पद्धतियां और बहस-मुबाहिसे के माहौल ने कब मुझे छात्र राजनीति की ओर आकर्षित कर लिया, यह पता भी नहीं चल पाया। जब जगा तो पत्रकारिता में छह वर्ष पूरे हो चुके थे और शायद पत्रकारिता के अलावा और कुछ करने की इच्छा बची नहीं थी।

-जर्नलि‍ज्‍म की तरफ कैसे रुझान हुआ?

--जेएनयू में जिस तरह का छात्र जीवन मैंने जिया उसमें दूसरे किस्‍म के आदर्शवाद ने जन्‍म ले लिया। धीरे-धीरे कई ऐसी बातें हुईं जिनसे एक आंदोलन का बैकग्राउंड तैयार होने लगा। उस समय डीटीसी बसों का किराया बढ़ा दिया गया था। जेएनयू में भी ये मामला आया और छात्रों ने न केवल आंदोलन किया बल्‍कि‍ इस मामले को आगे भी बढ़ाया। उस समय केआर नारायणन यूनिवर्सि‍टी के वाइस चांसलर हुआ करते थे। यूनिवर्सि‍टी ने हॉस्‍टल मेस में खाना देना बंद कर दिया, तब हम लोग बाहर जाकर कनाट प्‍लेस में भीख मांगकर मेस चलाते थे। सीनियर साथी जूनियरों को पढ़ाते थे। ये एक आंदोलन की आधारशि‍ला थी। इस आंदोलन के दौरान लोगों के मन में बदलाव का काम हुआ।

पत्रकारिता में आने के कई साल बाद लगने लगा कि समाज बदलना तो संभव नहीं, तो अब एजेंडा में ये आ गया कि आपका लिखा हुआ ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग पढें। इसे हमारे देश की पत्रकारिता का सौभाग्‍य कहें या दुर्भाग्‍य कि यहां पत्रकारिता की सबसे ज्‍यादा खपत करने वाली संस्‍था सरकार है। सरकार ही सारे समाचारपत्रों का सूत्र है। और सरकार ही सारे सामाचारपत्रों के सर्वाइव करने का साधन है। कुल मिलाकर आप स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने के लि‍ए स्‍वतंत्र नहीं है। ये बात मेरी समझ में बहुत पहले आ चुकी थी।

-आज के दौर की पत्रकारिता के बारे में क्‍या सोचते हैं?

--आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्‍ट फूड ज्‍वायंट जैसा हो गया है। धैर्य ‍बिलकुल भी नहीं है। आज के बच्‍चों को ज्‍वाइन करने के तीसरे दिन ही पीएम की बीट चाहिए, क्राइम बीट चाहिए। इसका कारण है कि आजकल बच्‍चों की न तो सैद्धान्‍ति‍क ट्रेनिंग होती है और न ही मानसि‍क। बल्कि नट-वोल्‍ट को फिट करने की ट्रेनिंग होती है। भाषा और पढ़ाई से ज्यादा अब जरूरत इस बात की है कि आपको क्वार्क एक्सप्रेस, फोटो शाप, वीडियो एडिटिंग, वाइस ओवर, लेआउट इत्यादि आता है या नहीं। पत्रकारिता से जन-सरोकार कम होता जा रहा है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होगा। अल्टीमेटली, कंटेंट ही रूल करेगा। पत्रकारिता के कई फास्ट फूड ज्वायंट फिलहाल बंदी के कगार पर हैं। चलेगा वही जो टिकेगा और टिकेगा वही जो इस देश की आम जनता और अपने पाठक की बात करेगा।

-आप हमेशा ‍प्रिंट में ही रहे, कभी टेलीविजन में जाने का प्रयास नहीं किया?

-प्रयास नहीं किया यह कहना ठीक नहीं है। कई टेलीवीजन चैनल में पैनल डिस्कसन के लिए जाने के दौरान टीवी के प्रति आकर्षण तो जबरदस्त हुआ लेकिन हमेशा यह भी लगता रहा कि प्रिंट स्थाई है जबकि टेलीविजन क्षणिक। हो सकता हूं कि मैं गलत होऊं लेकिन लगातार प्रिंट में रहने और कई तरह के सफल प्रयोग करते रहने के नाते प्रिंट के प्रति उम्मीदें और सपने कभी कम नहीं हुए। वैसे, आज यह जरूर लगता है कि समय पर टीवी में चले जाने पर टीवी में जो प्रयोग नहीं हुए, उसे शायद करने का मुझे मौका मिल जाता।

-टीवी में किस तरह के प्रयोग नहीं हुए?

-टीवी में सबसे बड़ा प्रयोग सुबह के समाचार पत्रों के पाठकों को टीवी के दर्शक के रूप में परिवर्तित करना होता। एक बार एक न्यूज चैनल के एक बड़े अधिकारी ने मुझसे पूछा था - ‘What is the biggest challenge for a TV news channel?’ मैंने कहा- ‘The biggest challenge is to convert the morning news paper readers into TV viewers.’ वे सुनकर उछल पड़े। अपने साथ काम करने का निमंत्रण दिया लेकिन मैंने वह प्रस्ताव इसलिए नहीं स्वीकारा क्योंकि तब मैं जहां काम कर रहा था वहां से हटने का कोई जेनुइन कारण नहीं था।

आप सोचकर देखिए यशवंत जी, कि सुबह में चाय के साथ हम सिर्फ अखबार देखना चाहते हैं और शाम को हम दिन भर के काम से मुक्ति के बाद इनफारमेशन के साथ मनोरंजन भी चाहते हैं। इसीलिए इवनिंग टेलीविजन सेगमेंट में प्राइम टाइम का कांसेप्ट आया। और शाम के समाचारों के साथ ड्रामाई होना जरूरत बन गया। लेकिन इस दौरान हम यह भूल गए कि जेनुइन खबरों के साथ भी ड्रामाई हुआ जा सकता है। मृग-मरीचिका सी टीआरपी के चक्कर  में न्यूज चैनल इतने ड्रामाई हो गए हैं कि लोक परक खबरें गायब हो गई। एक आर्गूमेंट यह भी है कि जनता जो देखना चाहती है हम वहीं दिखाते है। अगर ऐसा ही है तो कुछ भी दिखाने का कोई अंत नहीं है।

-तो आज के टीवी जर्नलिस्ट को आप कैसे देखते हैं?  

--मुझे लगता है कि वो एंटरटेनर ज्यादा है। इसलिए पैकेज, ड्रामाई अंदाज, बोलने का लहजा और बाडी लैंग्वेज पर जोर है। टीवी का पत्रकार कहीं न कहीं दुखी इसलिए भी रहता होगा क्योंकि समाचार पढ़ने और बोलने के दौरान वह अपनी बात नहीं कह सकता। अपनी बात कहलवाने के लिए उसे किसी और के सामने आईडी रखना पड़ता है। उस पत्रकार की सार्थकता इसी में है कि वह कैसा प्रश्न पूछता है।

हास्यास्पद तो तब होता है जब मौत की खबर कवर करने वाले जर्नलिस्ट से स्टूडियो का एंकर पूछता है कि वहां क्या माहौल है?

....जारी....


उदय सिन्हा से संपर्क  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या फिर 09953944011 के जरिए किया जा सकता है. 


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