टीआरपी पर विधवा विलाप ठीक नहीं : सुप्रिय

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सुप्रिय प्रसाद

इंटरव्यू : सुप्रिय प्रसाद (न्यूज डायरेक्टर, न्यूज 24) : पार्ट 2 : जिद छोड़िए, खबरों की बदलती दुनिया को समझिए : कई गड़बड़ियां मुझसे भी हुई हैं, इसे मैं स्वीकार करता हूं : कुछ लोगों को अब भी लगता है कि खबरें वैसे ही दिखाई जानी चाहिए जैसी पंद्रह बीस साल पहले दिखाई जाती थीं : चाहे टीआरपी का दबाव हो या न हो, सरकारी कोड़ा हो या न हो, समय के साथ खबरें तो बदलेंगी ही : किसी एक चैनल की गड़बड़ी से पूरे मीडिया को गैर-जिम्मेदार नहीं बताया जा सकता : जिन लोगों ने मेरे साथ काम किया है, वे आज भी मेरे साथ काम करना चाहते हैं : सुबह घर से निकलता हूं तो दिन भर का रनडाउन दिमाग में तय करके जाता हूं : हमारे चैनल का डिस्ट्रब्यूशन और मार्केटिंग कुछ हद तक उस तरीके से नहीं हो पाया जैसे दूसरों का है : न्यूज कंटेन्ट के मामले में राजीव शुक्ला जी का कोई दखल नहीं है : 24 घंटे के न्यूज चैनल का कामयाब प्रोड्यूसर तो मुझे उदय शंकर जी ने बनाया : टीवी पूरी तरह से एक टीम वर्क है और टीम वर्क में सभी को साथ काम करना होता है :

-आपको न्यूज चैनल की दुनिया में 'टीआरपी गुरु' कहा जाता है. इस समय टीआरपी को लेकर काफी हो हल्ला मचा हुआ है. क्या आपको लगता है कि टीआरपी का सिस्टम सही है?

-मुझे नहीं लगता कि टीआरपी को लेकर इतना विधवा विलाप करने की जरूरत है। हां, इसे और बेहतर बनाया जाए तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन बाजार में एक पैमाना या मापदंड तो होना ही चाहिए जिससे पता चल सके कि कौन कहां टिकता है? टीआरपी हो या कुछ भी हो, एक सिस्टम तो होगा मेजरमेंट का। उसके बिना कोई मुकाबला या उसके बिना कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं बन सकती है। मुझे मुकाबला अच्छा लगता है और मुझे हमेशा ये लगता है कि लक्ष्य तय हो तो मंजिल पाने में आसानी होती है। अगर ये पता हो कि फलां चैनल इतने जीआरपी से नंबर वन बन सकता है तो हम भी उसी आधार पर अपनी नीति बना सकते है और उस जगह पहुंच भी सकते हैं लेकिन अगर टीआरपी न हो तो जो जहां पहले से बना हुआ है वो बना रहेगा, नये चैनल तो हमेशा फिसड्डी रह जाएंगे। और फिर पुराने मापदंड और पुरानी सोच के आधार पर विज्ञापनदाता पुराने लोगों को ही पैसे देते रहेंगे। फिर न तो कोई नया चैनल बन पाएगा न कोई दूसरा आगे बढ़ पाएगा।

-टीआरपी का जो सिस्टम है यह जायज है? और क्या इसमें सुधार की गुंजाइश है?

-हां बिल्कुल जायज है। इसमें या किसी चीज में, सुधार की गुंजाइश तो हमेशा ही होती है।

-लेकिन अब जो सारे संपादकों ने कहना शुरू कर दिया है कि टीआरपी गलत है, टीआरपी के दबाव से, इसकी भूख से हमें बचाइए तो क्या आप इन बातों से सहमत हैं?

-नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता कि सारे संपादक टीआरपी के खिलाफ हैं। हां, वो इसमें सुधार जरूर चाहते हैं। चाहते हैं कि मेजरमेंट सिस्टम पूरे देश में लगे और इसमें ज्यादा से ज्यादा शहर भी शामिल किए जाएं। लेकिन फिर मैं वही कहूंगा, टीआरपी या कोई भी मेजरमेंट सिस्टम हो, इसका एक पैमाना होना चाहिए, जिससे यह मापा जाए। और इसकी व्यूवरशिप सामने आनी चाहिए कि किस प्रोग्राम को कितना देखा जा रहा है। रही बात कि टीआरपी छह महीने में आए या फिर एक साल में, इस पर विचार किया जा सकता है।

-टीवी चैनलों पर आरोप है कि खबरों का चयन टीआरपी को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।

-आप कोई भी न्यूज चैनल उठा लीजिए जहां टीआरपी की इतनी बात होती है, कोई ऐसी खबर बता दीजिए जिसे न्यूज चैनलों ने नहीं दिखाया हो। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि संसद पर हमला हुआ था और लोग टीआरपी के चक्कर में पड़े थे या 26/11 की घटना हुई थी और लोग टीआरपी के चक्कर में पड़े थे। ऐसा भी कभी नहीं हुआ कि पार्लियामेंट में विश्वासमत पर प्रस्ताव चल रहा हो और चैनल वाले गुदगुदी दिखा रहे थे। ये सब टीवी के नाम पर, टीआरपी के नाम पर एक हौव्वा बना दिया गया है। मुझे लगता है कि लोग समय के साथ सब चीजों में बदलाव को स्वीकारने को तैयार हैं लेकिन न्यूज में बदलाव उन्हें कबूल नहीं। खासतौर पर कुछ बुद्धिजीवियों और सरकार को तो न्यूज चैनल्स में सिर्फ खामियां ही नजर आती हैं और लोगों को लगता है कि सिर्फ टीआरपी के लिए चैनल चलाये जा रहे हैं। लेकिन हमें ये मानना चाहिए कि समय के साथ खबरों को लेकर लोगों के नजरिये में भी बदलाव आया है और उन्हें उनके मतलब की खबर चाहिए। अब ये जरूरी नहीं कि अमर सिंह के इस्तीफे या रामगोपाल यादव के पलटवार की खबर ही हेडलाइंस में चलती रहे और उस पर ही डिबेट होता रहे। अब अगर लोगों को रूचि ये जानने में ज्यादा है कि क्रिकेट सेलेक्शेन बोर्ड की बैठक में क्या हुआ या कौन जीतेगा बिग बास तो फिर आप खबर के नाम पर उन्हें कैबिनेट बैठक के नतीजे बताने पर क्यों आमादा है? आप क्यों चाहते हैं कि रोज उन्हें चिदंबरम की सांत्वना सुनाएं कि देश को कोई खतरा नहीं है। चुनाव नतीजे हों या फिर बजट, जो उन्हें अपने मतलब का लगता है, वो जरूर देखते हैं और उसकी टीआरपी जरूर आती है। लेकिन आप क्यों चाहते हैं कि महाराष्ट्र का चुनाव हो या झारखंड का, पूरा देश उसे ही देखता रहे। लोगों पर आप जबरन अपनी खबर थोप नहीं सकते और जब लोग इसे ना देखें तो फिर टीआरपी को कोसने से कोई फायदा नहीं। अब आप अखबारों को ही देंखे तो पहले पन्ने से वो सारी क्लासिकल खबरें गायब नजर आएंगी और उनकी जगह अब आम आदमी की जरूरत की खबरों ने ले ली है। रही बात टीवी पर चलने वाली अजब गजब खबरों की, तो हम ये बता दें कि उनमें से ज्यादातर खबरें अखबार में उस दिन छपी होती हैं, चाहे वो ऐलियन हो या महामशीन। हां, टीवी में उसकी प्रस्तुति के तरीके पर आप एतराज जता सकते है लेकिन वो कोरी बकवास नहीं होती।

आईआईएमसी में पिछले साल हुए एक कार्यक्रम में सुप्रिय प्रसाद

-टीआरपी से कोई नुकसान भी होता है?

-नुकसान ये होता है कि टीआरपी नकारेपन का कारण बनता जा रहा है। अब प्रोड्यूसर को आसानी है गई है कि वह हर चीज पर टीआरपी जोड़ दे। प्रोड्यूसर बोल दे कि इस प्रोग्राम से टीआरपी की गुंजाइश है, इससे नहीं। इस तरह वह कंटेंट पर एक्सपेरीमेंट करने में दिमाग कम लगाता है, टीआरपी के आधार पर एक माइंडसेट डेवलप कर लेता है। फिर उसी खोल, दायरे, सोच के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। टीआरपी बटौरू कंटेन्ट के नाम पर उन्हें बहुत सारे प्रोग्राम्स के क्लिप्स भी यहां-वहां मिल जाते हैं। तो वे रॉ क्लिप्स डाल देते हैं। मान लीजिए कि उन्हें कॉमेडी की क्लिप्स मिल गई तो उन्होंने उसे उठाया और उसमें दूसरा प्रोग्राम डाल दिया। इस तरह उन्हें कोई खास काम नहीं करना पड़ा। टीआरपी की सीमारेखा सामने रखकर काम करने वाले प्रोड्यूसर की जो ग्रूमिंग है, वह सही प्रकार से नहीं हो रही है। वह अपने आप को ठीक तरीके से तैयार नहीं कर पा रहे हैं।

--आपने आजतक में रहते हुए कई न्यूज चैनलों के टीआरपी बटोरू कार्यक्रमों को धूल चटाया. कुछ किस्से सुनाइए.

-देखिए, टीआरपी के लिए कई गड़बड़ियां मुझसे भी हुई हैं, इसे मैं स्वीकार करता हूं। कुछ गंदगी मुझसे भी फैली है, यह कुबूल करता हूं। जैसे, नाग-नागिन के कार्यक्रम मैंने भी दिखाए। 'यमराज से मिले गजराज' नामक प्रोग्राम बनवाया। बिना ड्राइवर वाली कार की स्टोरी आजतक पर चलवाई थी। इस स्टोरी के चलाए जाने के पीछे कहानी यह रही कि उस समय आजतक और स्टार न्यूज में जबरदस्त कम्पटीशन चलता था। स्टार न्यूज पर 'तहलका' की तरफ से 'बेनकाब' नामक एक प्रोग्राम शुरू होने वाला था। इसका प्रोमो दिखाया जा रहा था। स्टार न्यूज के इस कार्यक्रम की सुबह से ही बड़ी चर्चा हो रही थी। तब 'बेनकाब' की काट के लिए हमने 'बिना ड्राइवर वाली कार' की स्टोरी चला दी। पूरे देश में हड़कंप मच गया। लोग एक दूसरे को फोन करके आज तक देखने के लिए कह रहे थे। एक आदमी, जो काफी लंबा था, वह ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठकर कार नियंत्रित कर रहा था। इसके बाद एक स्टोरी चलाई थी बुलन्दशहर की। यहां एक गांव है जहां बच्चे को नाग के डर से एक मचान पर रखा गया था। हमने अपनी ओबी वैन वहां भेज दी और गांव के लोगों को इकट्ठा करके एक लाइव प्रोग्राम चला दिया। यह प्रोग्राम हमने नौ बजे से शुरू कर दिया और उसको पूरे एक घंटा चलाया। इस तरह टीआरपी के मामले में हम स्टार न्यूज के तहलका को पछाड़ने में कामयाब हो गए। तब अजीत अंजुम जी ने एक लेख भी लिखा था  कि तहलका को नागिन ने डस लिया। ऐसे ही एक जब एनडीटीवी ने दो करोड़ रुपये देकर महेंद्र सिंह धोनी को साइन किया और धोनी का पहला प्रोग्राम प्रसारित करने वाले थे वे लोग तो हम लोग इसकी काट के लिए 'धोनी दे दनादन' करके एक प्रोग्राम चला दिया। जब एनडीटीवी पर धोनी का इंटरव्यू चल रहा था तो हमने उसी समय 'धोनी दे दनादन' गाना और धोनी के गुण, स्टाइल पर केंद्रित प्रोग्राम चलवा दिया। यह गाना केवल दो हजार रुपये में बन गया था। इस तरह धोनी के इंटरव्यू से ज्यादा हमारे गाने की टीआरपी आई।

--ये न्यूज और टीआरपी को लेकर जो बातें हो रही हैं तो इसमें क्या लगता है कि पुराने जमाने के हिसाब से चीजें नहीं रहीं और न्यूज की जो परिभाषा है तो क्या वह भी अब बदल गई है? आपको लगता नहीं कि टीवी पर इंटरटेनमेंट की खबरें ज्यादा दिखाई जाती हैं?

आईआईएमसी में अपने बैच के साथियों के साथ सुप्रिय प्रसाद.

-ये आरोप गलत है टीवी पर इंटरटेनमेंट न्यूज ज्यादा आ रही है। करीब दस साल पहले एक अंग्रेजी अखबार ने पहले पन्ने पर जब बहुत ही प्रमुखता से ये छापा कि ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ सीरियल का मिहिर सीरियल में मरने वाला है तो अखबार देखकर बुद्धिजीवी टाइप लोग चौंक पड़े। लेकिन बाद में पता चला कि उसके लिए पूरे देश में दुआ हो रही है और हर घर में आजकल उसी की चर्चा है तो फिर लोगों ने उसे खबर मान लिया। उसी तरह 2001 में जब क्रिकेट में भारत ने आस्ट्रेलिया को हराया और हमने उसे जब पहली खबर बनाकर पेश किया तो हमारे चैनल में ही हमारे कई साथी हैरान हो गये और उस पर एतराज जताने लगे कि ये पहली हेडलाइंस नहीं बन सकती, लेकिन आज ये आम बात है। ये ऐसे उदाहरण हैं जो हमें ये बताते हैं कि समय के साथ खबरें बदलती रहती हैं औऱ हम बता दें, ये बदली भी हैं और लगातार बदल भी रही हैं। और उसी का नतीजा है कि जब हमें लगता है कि रूचिका को न्याय नहीं मिला तो अब हम सीधे कहते है कि रूचिका को इंसाफ दो। पहले ये लाइन लेने की हिम्मत कोई संपादक आसानी से नहीं जुटा सकता था। किस ब्रांड को फायदा होगा या नुकसान, ये सोचे बिना हम आज आधा-आधा घंटा ऑटो एक्सपो दिखाते हैं जबकि पहले गाड़ी के एक ब्रांड का नाम लिखने से पहले सीईओ से इजाजत लेनी पड़ती थी। समय के साथ न सिर्फ खबरें बदली हैं बल्कि उसके पेश करने का अंदाज भी बदला है।  

-लेकिन सरकार कंटेंट कानून लाने पर विचार कर रही है।

-कुछ लोगों को, खास तौर पर राजनेताओं को अभी भी लगता है कि खबरें वैसे ही दिखाई जानी चाहिए जैसी पंद्रह बीस साल पहले दिखाई जाती थीं। खास तौर पर कंटेंट कोड बनाने की धमकी देने वाली सरकार को मान लेना चाहिए कि वो कितना भी बड़ा कानून क्यों न बना ले, अब खबरें उनके मनमाफिक नहीं चल पायेंगी। न तो सरकार और न ही कोई टीवी चैनल मालिक अब खबर के नाम पर अपनी बात लोगों पर थोप पाएंगे और न ही संपादक बनकर कोई अपना ज्ञान दर्शक को सुनने पर मजबूर कर पाएगा। वो आपके मतलब की नहीं अपने मतलब की ही खबर सुनेंगे या देखेंगे, टीआरपी रहे या नहीं, टैम रहे या नहीं। जरूरत है बदलते वक्त के साथ खबरों को बदलने की और उनके लिए अपने आप को तैयार करने की। विरोध करने वालों को जिद छोड़कर ये समझना चाहिए कि लिफाफे की जगह ई-मेल ने, पोस्टकार्ड की जगह फेसबुक ने ले ली है, लोग अब ट्विट करते हैं, फास्ट फूड खाते हैं, ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं, मॉल में डेट करते हैं, अपने बच्चे को इंडियन आइडल, सुरों का संग्राम में भेजते हैं, अपनी पसंद का विजेता बनाने के लिए 6-6 रुपये का एसएमएस करते हैं, बिग बास के विजेता का अपने शहर में पूरे दिल से स्वागत करते हैं, धोनी-सचिन-शाहरूख को अपना आदर्श मानते हैं, मल्टीनेशनल में काम करने का सपना रखते हैं, अमेरिका, पेरिस, लंदन में छुट्टियां मनाना चाहते हैं तो फिर वो दिन-भर घिसी-पिटी खबरें क्यों देखेंगे, वो भी तब, जबकि वो केबल वाले को न्यूज चैनल देखने के लिए हर महीने पैसा देते हैं। चाहे टीआरपी का दबाव हो या न हो, सरकारी कोड़ा हो या न हो, समय के साथ खबरें तो बदलेंगी ही।

-आपको लगता नहीं कि टीआरपी के लिए चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता के चलते कई बार टीवी चैनल गैर-जिम्मेदार भूमिका निभाते हैं। गलत खबरें चल जाती हैं, जैसे हाल ही में एक तेलुगु चैनल ने रिलायंस के खिलाफ फर्जी खबर चला दी।

सुप्रिय प्रसाद से बातचीत करते यशवंत सिंह

-मैं मानता हूं कि तेलुगू चैनल ने जो खबर चलाई वो गलत किया। और इसकी वजह से न्यूज चैनल्स की साख को दाग जरूर लगा है इसीलिए हम सभी टीवी संपादकों ने फौरन इसकी निंदा भी की। लेकिन इसके लिए पूरी व्यवस्था को कसूरवार कैसे ठहराया जा सकता। अगर एक सांसद के हत्यारे बनने से संसद की गरिमा खत्म नहीं होती, अगर एक भ्रष्ट जज से न्यायपालिका पर हमारी आस्था कम नहीं होती तो एक तेलूगु चैनल की गड़बड़ी से पूरे मीडिया को गैर-जिम्मेदार नहीं बताया जा सकता। ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि मीडिया में सब दूध के धुले ही आयेंगे। न पहले थे और न आगे रहेंगे, जरूरत है ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और इसके लिए सरकार के पास हर पावर है।

-न्यूज24 में आप अपनी पूरी टीम के साथ आए और आप पर यह आरोप लगा कि सिर्फ आज तक के ही कई लोगों को आप तोड़कर ले गए। क्या आजतक को आप डैमेज करना चाहते थे?

-नहीं ऐसा करना तो दूर, ऐसा सोचने का भी सवाल नहीं उठता। आज तक से मेरा काफी पुराना रिश्ता है और आज भी मेरे वहां के लोगों से अच्छे संबंध हैं। मेरे दिमाग में कभी ऐसी कोई बात नहीं आ सकती कि मेरे कारण आजतक को कोई नुकसान पहुंचे। और जिस चीज को आप बनाते हैं उसे अपने हाथों से कैसे तोड़ सकते हैं? आजतक मेरे सामने बना है, मैं उसकी नींव से जुड़ा़ रहा हूं। जब मैंने बीएजी फिल्म्स ज्वाइन किया तो उस वक्त न्यूज24 की प्लानिंग शुरू ही हुई थी और नए चैनल में लोगों की जरूरत थी।

-लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोग सिर्फ आज तक से ही आपके साथ काम करने आए?

-ऐसा नहीं था, सभी चैनलों से लोग न्यूज24 में काम करने के लिए आ रहे थे। चूंकि मैंने लम्बे समय तक आजतक में काम किया है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर वहां के लोग सबसे ज्यादा मेरे साथ आना चाहते थे। मुझे इस बात की खुशी है कि जिन लोगों ने मेरे साथ काम किया है, वे आज भी मेरे साथ काम करना चाहते हैं।

-सुप्रिय प्रसाद के समय में आज तक टॉप पर था और जब आप न्यूज24 में चले आए तो उम्मीद की जा रही थी कि यह चैनल भी टॉप तक पहुंचेगा, लेकिन अभी तक यह चैनल टॉप थ्री में भी जगह नहीं बना पाया है।

-देखिए, इतने चैनलों के बीच में किसी भी नए चैनल को टॉप में पहुंचने में वक्त तो लगेगा ही, लेकिन हमने शुरुआती दो साल में ही ये साबित कर दिया कि हम फास्टेस्ट ग्रोइंग न्यूज चैनल हैं। हमने दो साल में संतोषजनक कामयाबी हासिल की है और कई पुराने चैनलों को पछाड़ा है। आप ये भी देख सकते हैं कि हमारे साथ शुरू हुए कई नए चैनल अभी तक कोई पहचान तक नहीं बना पाए हैं, जबकि न्यूज24 ने कई बड़े मौकों पर अपनी कवरेज से लोगों को प्रभावित किया है। मैं ये मानता हूं कि कंटेन्ट के मामले में हम आज भी किसी से कम नहीं हैं। न्यूज 24 इकलौता ऐसा न्यूज चैनल है जिसे आप सुबह से रात तक देखने के बाद दूसरे दिन यह कम्प्लेन नहीं करेंगे कि आपको फलां खबर नहीं मिली। ज्यादातर हिंदी चैनल बिजनेस पर रोजाना प्रोग्राम नहीं दिखाते, जबकि हमारे चैनल में बिजनेस का प्रोग्राम है।

-लेकिन आपने यहां दूसरे चैनलों से अलग क्या किया?

-हमने कई एक्सपेरीमेंट किए। पहली बार फर्स्ट हॉफ में हमने स्पोर्ट्स के प्रोग्राम चलाए। हमने पहली बार प्राइम टाइम में क्रिकेट का प्रोग्राम 'ये इंडिया का क्रिकेट है' के नाम से शुरू किया। हमने किसी दूसरे न्यूज चैनल की कॉपी नहीं की, बल्कि एकदम अलग रास्ता चुना। सुप्रिय प्रसाद हम लोग यहां मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम के साथ मीटिंग में अपनी बात रखते हैं। उस डिस्कशन में नई चीजें रखी जाती हैं। जो कुछ अप्रूव होता है, तय होता है, वह चलता है। मैं मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम के बारे में जिक्र करना चाहूंगा कि टीवी के उनके लंबे अनुभव और उनकी आक्रामक शैली के कारण चैनल ने अपनी अलग पहचान बनाई है। शिवसेना मामले में हाल ही में अजीत जी के दो डिस्कशन तो ऐसे थे, जिनकी रेटिंग सभी चैनलों से आगे थी। 

-तो फिर रेस में आप कहां पिछड़ रहे हैं?

-मैं इसे कोई रेस नहीं मानता..। हमारे मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम के नेतृत्व में न्यूज24 समय के साथ खुद लोकप्रिय होता जा रहा है। अभी पिछले हफ्ते ही टाइम स्पेंट (टीवी पर एक दर्शक द्वारा देखा जाने वाला समय) के मामले में हम एनडीटीवी से ज्यादा थे। लेकिन टीवी चैनलों के लिए सबसे बड़ी समस्या डिस्ट्रीब्यूशन की है। हमारे चैनल का डिस्ट्रब्यूशन और मार्केटिंग कुछ हद तक उस तरीके से नहीं हो पाया जैसे दूसरों का है। टीआरपी के मामले में हम इसलिए भी पीछे हैं क्योंकि अभी हमारी उतनी रीच नहीं है और हमारे डिस्ट्रीब्यूशन में भी थोड़ी परेशानी है। हम लोग इस मामले को एड्रेस कर रहे हैं और जल्द ही हमें बेहतर नतीजों की उम्मीद है।

-कहा जा रहा है कि 'न्यूज 24' से सारे अच्छे लोग छोड़-छोड़कर जा रहे हैं?

-न्यूज चैनलों में तो लोगों का आना जाना लगा रहता है। ऐसी कोई बात नहीं कि अच्छे लोग छोड़कर जा रहे हैं। मैं मानता हूं कि न्यूज 24 में सभी अच्छे लोग हैं, काफी प्रतिभाशाली, मेहनती और ऊर्जावान लोग हैं। आप ही बताइए राहुल महाजन, अरुण पांडे, रमेश तिवारी, अंजना कश्यप, सईद अंसारी, शादाब, मनीष, आरसी, विकास, शशि शेखर, बजरंग, मनीष कपूर, देवांशु, शंभू, अशोक कौशिक... कितना नाम लूं..। कोई भी ऐसा नहीं है, जो उन्नीस है। इसलिए ये सब फालतू की बात है कि अच्छे लोग छोड़कर जा रहे हैं।

-कहा जाता है कि टेलीविजन में बहुत तनाव है, और लोगों की उम्र बहुत कम होती है। तो इसकी क्या वजह हो सकती है?

-देखिए तनाव तो हर धंधे में है। इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता कि यह बहुत तनाव वाला काम है। क्योंकि टेलीविजन सातों दिन चौबीस घंटे चलने वाला काम है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें काम करने वाला हर व्यक्ति तनाव में है। हां, कुछ लोगों को तनाव होता है और कुछ लोग बड़े आराम से रहते हैं। जो लोग शिफ्ट में काम करते हैं, उन्हें कोई तनाव नहीं होता है। हां, प्रेशर उस समय होता है, जब मुम्बई ब्लास्ट जैसी घटना हो जाए। जिसे हर समय लाइव कवर करना होता है, तो उस समय तनाव तो होता ही है।

-न्यूज24 के मालिक राजीव शुक्ला राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए हैं। इसका कोई दबाव तो आपके काम पर नहीं पड़ा?

-कभी नहीं। मैं आपको बता दूं कि न्यूज कंटेन्ट के मामले में राजीव जी का कोई दखल ही नहीं है। हमें तो सिर्फ बीएजी फिल्म्स की एमडी अनुराधा प्रसाद और मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम से ही वास्ता पड़ता है। आपको पता होगा कि अनुराधाजी टीवी मीडिया से बहुत लम्बे समय से जुड़ी हुई हैं और समय-समय पर वो चैनल की योजनाओं पर हम लोगों से जरूर बात करती हैं। वह जब भी कोई स्टोरी देखती हैं, या कोई प्रश्न उन्हें पसन्द नहीं आया तो वह इस बारे में बात जरूर करती हैं। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मुझे कहा गया हो कि ऐसी स्टोरी चलाओ या ऐसी स्टोरी न चलाओ। इस मामले में काम करने की पूरी आजादी है।

-इस मुकाम पर पहुंचने में किन लोगों का आप शुक्रिया करना चाहेंगे?

- मेरे सारे सीनियर्स ने मुझे बड़ी मदद की है, किसी एक का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा।

-फिर भी अगर कुछ लोगों का नाम लेना हो तो...।

-जैसे मैंने पहले भी कहा कि बुनियाद मजबूत करने में एसपी सिंह की बड़ी भूमिका रही है। फिर अजय दा और मृत्युंजय झा ने मुझे काफी मदद की। नकवी जी ने भी मुझे बहुत कुछ सिखाया-बढ़ाया, हमेशा एक गार्जियन की तरह हैं। हां, 24 घंटे के न्यूज चैनल का कामयाब प्रोड्यूसर तो मुझे उदय शंकर जी ने बनाया। उदय जी मुझ पर बहुत भरोसा करते थे, उन्होंने मुझे काम करने की पूरी आजादी दी, इससे मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। शाजी जमान ने भी मुझे आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहुत कम ऐसे संपादक होंगे, जो अपने किसी कर्मचारी के प्रमोशन के लिए मैनेजमेंट से लड़ाई लड़े, लेकिन उदय जी और शाजी, दोनों ने मेरे लिए ये किया। मुझे खुशी इस बात की भी है कि मेरे सारे पुराने बॉसेज का आज भी मुझ पर भरोसा है, वो मुझे आज भी उतना ही पसंद करते हैं।

-आप यंग हैं और आपने बहुत सारी चीजें सीखी हैं, जो नई पीढ़ी आ रही है, क्या उनमें भी सीखने की उतनी ही ललक आप देखते हैं।

-टीवी में किसी व्यक्ति की इंडीविजुअल खूबियों से काम नहीं चल सकता। टीवी पूरी तरह से एक टीम वर्क है और टीम वर्क में सभी को साथ काम करना होता है। इसीलिए इसमें टीम के साथ काम करने की आदत बहुत जरूरी है, जो मैं करता आ रहा हूं। मैं टीम के साथ बड़ा कंफर्टेबली काम कर लेता हूं। आज तक मैंने किसी भी आदमी को नकारा नहीं कहा। मैं खराब से खराब व्यक्ति से भी काम करवा सकता हूं और मुझे लगता है कि जब वह मेरे साथ काम करेगा तो अपने आप काम सीख जाएगा। दूसरी बात यह भी है कि इसमें अपने पेशे के लिए कमिटमेंट बहुत जरूरी है। मैंने न तो कभी अपनी ड्यूटी के टाइम के बारे में सोचा और न ही अपने लिए काम की कोई सीमा तय की कि इतना करूंगा, इतना नहीं।

समाप्त

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सुप्रिय प्रसाद से बातचीत के कुछ अंशों को इस वीडियो पर क्लिक करके भी देखा व सुना जा सकता है....




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