रामोजी राव संग काम करना स्पीरिचुवल प्लीजर

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NK Singhइंटरव्यू : एनके सिंह (वरिष्ठ पत्रकार) : ईटीवी की व्यूवरशिप बहुत है पर टीआरपी नहीं, ऐसा फाल्टी टीआरपी सिस्टम के कारण : ईटीवी से अलग होना मेरा खुद का फैसला, नाराजगी बिलकुल नहीं है : मैं बहुत डिसीप्लीन्ड आदमी हूं :

: मेरे साथ काम करने वालों पर बेहतर करने का दबाव होता है : बीईए के गठन के बाद न्यूज चैनल्स के एडिटर्स किसी भी मुद्दे पर पंद्रह मिनट के भीतर फैसले ले लेते हैं : आप टीआरपी मीटर्स को रुरल एरियाज की तरफ ले जाएंगे तो न्यूज चैनलों का कैरेक्टर अपने आप बदल जाएगा : पत्रकारिता में आने वालों की तीन-चार साल तक ट्रेनिंग होनी चाहिए : 

इलेक्ट्रानिक मीडिया के पढ़े-लिखे और गंभीर किस्म के संपादकों में शुमार किए जाते हैं वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह. पिछले दिनों वे ईटीवी के पोलिटकल एडिटर व ग्रुप एडिटोरियल हेड के पद से स्वतः हट गए. उन्होंने लंबी छुट्टी के लिए अनुरोध किया. मीडिया सर्किल में इसे उनका इस्तीफा देना मान लिया गया, और ऐसा है भी क्योंकि एनके सिंह खुद मानते हैं कि उन्होंने अपने को ईटीवी से अलग कर लिया है. ईटीवी से मुक्त होने के बाद एनके सिंह आजकल नए सिरे से अध्ययन व लेखन में जुट गए हैं. साथ ही वो सभी काम निपटा रहे हैं, जिसे मीडिया के हेक्टिक शेड्यूल के कारण पेंडिंग किए हुए थे. एनके सिंह के आवास पर उनके जीवन व न्यूज चैनलों की दशा-दिशा के बारे में विस्तार से बातचीत की भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने. पेश है बातचीत के अंश-

-पहले आप अपने शुरुआती जीवन के बारे में बताएं. कैसे जर्नलिज्म में आए?

-बहुत संक्षिप्त परिचय है मेरा. बिहार के सिवान जिले का रहने वाला हूं. पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई. लखनऊ से इंग्लिश लिट्रेचर में बीए किया और फिलासिफी में एमए. लखनऊ में पिताजी नेशनल हेराल्ड में काम करते थे. घर का माहौल पढ़ने-लिखने का रहा सो पढ़ाई करते हुए लिखना शुरू कर दिया था. मेरा लिखा नार्दर्न इंडिया पत्रिका में छपा. टीवी के युवाओं पर आधारित कार्यक्रमों में शामिल हुआ. तभी लगा कि मीडिया में आना चाहिए. लखनऊ में कुछ महीने नवजीवन अखबार में रहा. फिर नेशनल हेराल्ड में गया. नेशनल हेराल्ड में पांच वर्षों तक काम किया. दी पायनियर में दस साल रहा. पायनियर के लिए लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद और कानपुर में काम किया. दस वर्षों तक पायनियर में काम करने के बाद ईनाडु ग्रुप के न्यूज टाइम के साथ जुड़ गया. बाद में जब इस ग्रुप का न्यूज चैनल लांच हुआ तो इसमें चला आया. ग्रुप एडिटोरियल हेड और पोलिटिकल एडिटर के बतौर काम किया. ईनाडु समूह के साथ करीब 15-16 साल तक रहा. बहुत ज्यादा नौकरियां छोड़ी नहीं.

-आपके ईटीवी छोड़ने का कारण क्या रहा?

-देखिए. मैं साफ कर देना चाहूंगा कि ईनाडु ग्रुप के ओनर रामोजी राव का मैं बहुत सम्मान करता हूं. इंडिया में मीडिया ओनर्स की बात हो तो उनके जैसा बड़ा वैल्यू वाला कम ही लोग देखने को मिलते हैं. रामोजी राव के साथ काम करना इस्पीरिचुवल प्लीजर होता है. मैंने जब उनसे ईटीवी से विदा लेने के लिए कहा तो उन्होंने रिजेक्ट कर दिया. लेकिन मेरा मानना है कि कहीं कोई बदलाव किया जा रहा हो तो जो भी नया आ रहा है उसे काम करने-कराने की पूरी छूट मिलनी चाहिए. ऐसे में हम जैसे वरिष्ठ का अलग हो जाना ही उचित होता है.

दूसरी बात यह कि ईटीवी बहुत देखा जाता है. इसकी व्यूवरशिप बहुत है. लेकिन व्यूवरशिप के मुकाबले टीआरपी नहीं होती. ऐसा फाल्टी टीआरपी सिस्टम के कारण है क्योंकि टीआरपी मीटर्स बड़े शहरों में होते हैं और हमारी रीच रूरल एरियाज में बहुत है. इलेक्शन के समय हर नेता ईटीवी को खोजता है. इलेक्शन खत्म होने पर वह दिल्ली बेस्ड चैनल्स पर आ जाता है. टीआरपी न आने से फाइनेंस प्रभावित होता है. प्राफिट नहीं मिलता. ऐसे में कोई कितने दिन चलाएगा. इसीलिए अगर कोई चेंज किया जा रहा है तो उसे फुल फ्रीडम दें. कोई आ रहा है तो यह अच्छी बात है कि वह पूरी तरह से काम करे.

नाराजगी बिलकुल नहीं है, यह साफ कर देना चाहता हूं. यह मेरा खुद का फैसला है. रामोजी राव जिस वैल्यू के साथ काम करते हैं, वह अदभुत है. मैं उनका दिल्ली में मेन रिपोर्टर रहा. सोलह साल में उन्होंने कभी नहीं कहा कि इस न्यूज को ऐसे कवर करो.

मेरा मानना है कि रीजनल चैनल्स के सामने एक संकट है. अगर टीआरपी को निचले स्तर पर नहीं ले जाया गया तो चैनल चलाना मुश्किल होगा. ईटीवी का सेटअप यहां बहुत दिनों से एक ही स्थिति में था. बदलाव हो रहे हैं तो फुल फ्रीडम देना चाहिए, इसी सिद्धांत के तहत मैं अलग हुआ. ये मेरा डिसीजन है.

-सुना है कि आप के अधीन दिल्ली में काम करने वाले कुछ लोग आपसे असंतुष्ट भी हैं?

-देखिए, मैं बहुत डिसीप्लीन्ड आदमी हूं. सुबह छह बजे उठ कर टहलने निकल जाता हूं और आफिस साढ़े आठ बजे तक पहुंच जाता हूं. ऐसे में मेरे साथ काम करने वालों पर एक दबाव तो रहता ही है अच्छा करने के लिए. मैं हार्डकोर रिपोटर्र हूं. मैं बेहतर और सर्वोत्तम करने की कोशिश करता हूं. मेरे साथ काम करने वाला अगर फैक्ट्स में कैजुअल है, अपने काम में लापरवाह है तो जाहिर है उसे ट्रेंड करने की कोशिश होती है. इससे संभव है कुछ लोग नाराज हों. पर मैं कहना चाहूंगा कि ज्यादा बड़ी संख्या उनकी है जो इस ट्रेनिंग को पसंद करते हैं.

जो लोग दूसरे संस्थानों में अच्छे पदों पर गए हैं वे कहते हैं कि सर आपकी ट्रेनिंग से बहुत कुछ सीखने को मिला. दो-चार लोग अगर कहीं असंतुष्ट हैं तो यह सामान्य बात है. इसे नाराजगी नहीं कहते. जो बड़ा वर्ग है, जो बेस्ट देना चाहता है, और बेस्ट देने की प्रक्रिया को सीखना-समझना चाहता है, वो मुखर नहीं है क्योंकि वह अपना काम करता है. इसलिए वो तबका दिखता नहीं. वो वर्ग अपैरेंट नहीं है.

मैं काम करने का कैजुवल एप्रोच पसंद नहीं करता. अगर आप एग्रीकल्चर पर काम कर रहे हैं तो आपको के पास इसके ट्रेंड, फैक्ट्स, डाटा आदि सब होने चाहिए. आपको बताऊं. एक सज्जन आए. उन्होंने कहा कि मैं लिखता पढ़ता हूं. मैंने पूछा आपने हाल में क्या लिखा है. बोले- लिखा है कि मायावती के साथ रहेगा यूपी का मुसलमान. मैंने पूछा कि यूपी में मुसलमान कितने परसेंट है. वे बोले- शायद तीस परसेंट होंगे. मैंने उनसे कहा कि आप इतनी बड़ी एनालिसिस कर रहे हैं लेकिन आप डाटा को लेकर आश्वस्त नहीं हैं तो कैसे माना जाए आपका लिखा सही है. अगर डाटा गलत है तो आपकी एनालिसिस गलत हो सकती है.

डाटा, फैक्ट्स अगर जर्नलिज्म में नहीं है तो आपका लिखा सतही हो जाएगा. इसीलिए मैं अपने रिपोर्टरों से हमेशा उम्मीद करता हूं कि वे एलीमेंट्री चीजें जानें. फैक्ट्स को पकड़ना-तलाशना सीखें. अगर आपसे बेहतर काम कराया जाता है और आप इसे डिक्टेटरशिप मानें तो इसे क्या कहा जा सकता है. डिक्टेटरशिप एक परसेप्शन है. वही लड़का जब सब कुछ सीखकर बाहर जाता है और उसे अच्छी जाब मिलती है तो वह अपनी ट्रेनिंग पर गर्व करता है. मैं यह नहीं कह रहा कि मैं बहुत टफ हूं पर जिस पेशे में हम लोग हैं वहां अगर क्वालिटी देने की बात है तो आपको प्लांड होना पड़ेगा. मेजारिटी के लोग कहते हैं कि आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

-आगे आपकी क्या योजना है?

सही कहूं तो अभी तक मैंने सोचा नहीं है. बिलकुल नहीं सोचा है कि आगे क्या करना है. आर्टिकल वगैरह लिखता रहता हूं, सो, लिखता रहूंगा. तमाम मुद्दे हैं लिखने-पढ़ने के लिए. बाकी, देखते हैं आगे. मेरी उपादेयता मीडिया वर्ल्ड व समाज में हो तो इससे बड़ी खुशी नहीं होगी. मैंने जो काम किया-कराया, उसको लेकर मुझे सैटीसफेक्शन है. हिंदी पट्टी के गांवों, एग्रीकल्चर व विकास को लेकर रिपोर्टर्स ने अच्छी स्टोरी की. ये रिपोर्ट व रिपोर्टर किसी भी चैनल से बेटर हैं.

-आप ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के महासचिव भी हैं. इस बाडी ने न्यूज चैनल्स को बेहतर बनाने के लिए क्या किया?

-बीईए के गठन के बाद न्यूज चैनल्स के एडिटर्स किसी भी मुद्दे पर पंद्रह मिनट के भीतर फैसले ले लेते हैं और तय कर लेते हैं कि इस खबर के साथ क्या सुलूक करना है. उदाहरण के तौर पर शिव सेना के लोग न्यूज चैनल्स को फोन करते हैं कि कल फलां जगह पर हिंसा होगी, प्रदर्शन होगा. तो इस पूर्व नियोजित हिंसा को न्यूज चैनल दिखाएं या न दिखाएं, इसको लेकर बीईए के एडिटर्स पंद्रह मिनट में आपस में संवाद कर फैसला ले लेते हैं कि इस कार्यक्रम को चैनल पर नहीं दिखाना है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम लोग नहीं चाहते कि कोई भी पार्टी पूर्व नियोजित हिंसा को अंजाम दे और उससे पब्लिसिटी पाकर प्रोत्साहित हो. ऐसी हिंसा से समाज व देश में नफरत का मौहाल बनता है. जो लोग डेलिबरेटिली नकारात्मक काम करना चाहते हैं, उन्हें रोकने की शुरुआत न्यूज चैनल्स ने कर दी है और इसमें सबसे बड़ी भूमिका बीईए की है. एडिटर्स ने सेल्फ रेगुलेशन के लिए एक रास्ता बनाया है. प्रजातंत्र में हम सोच भी नहीं सकते कि मीडिया को सरकार रेगुलेट करे. अमेरिकी राष्ट्रपति रहे जाफरसन ने कहा था कि अगर उन्हें मीडिया और सरकार में से कोई एक चुनना हो तो वे मीडिया को प्रेफर करेंगे. तब प्रिंट हुआ करता था. यही बात टीवी के लिए भी है. हमने जो एसोसिएशन बनाया उसका परपज यही है कि हम खुद चीजों को दिशा दें. हम खुद रेगुलेट करेंगे. रेगुलेशन गर्वनमेंट के थ्रू नहीं आने देंगे.  

मैं यहां कहना चाहूंगा कि टीवी के जो दर्शक हैं, उनकी वैल्यूज भी चेंज हुई है. पिछले साल बजट आया. कई चैनलों ने अच्छे डिस्कशन कराए. पर एक चैनल ने उसी दौरान माइकल जैक्शन का डांस दिखाया. जिन चैनल्स ने डिस्कशन दिखाए, उनकी टीआरपी धड़ाम हो गई. जिसने डांस दिखाया, उसकी टीआरपी आसमान पर पहुंच गई. ये विरोधाभाष है. शाम को मैक्सिमम टीआरपी इंटरटेनमेंट चैनल्स की होती है. लोग न्यूज की बजाय इंटरटेनमेंट चैनल्स की तरफ भागते हैं. ऐसा क्यों होता है? इसलिए क्योंकि ह्यूमन बीइंग चेंज हुआ है. आदमी की क्वालिटी चेंज हो रही है. वैल्यू सिस्टम बदल रहा है. तो इसमें मीडिया की गलती नहीं है. यह उन इंस्टीट्यूशन्स का फेल्योर है जिन्हें वैल्यू सिस्टम ठीक रखना है, समृद्ध करना है. इसमें स्टेट का रोल है. इसमें फेमिली का रोल है, इसमें पैरेंट्स का रोल है. इसमें पढ़ाई-लिखाई का रोल है. इसमें मीडिया का रोल नहीं है. आखिर हम क्यों इंटरटेनमेंट की तरफ जाते हैं? इसलिए कि पब्लिक एक्सेप्टेंश है. हां, फिर भी हमें नहीं दिखाना चाहिए, ये अलग बात है. अल्टरनेटिव माडल देने की हम कोशिश कर रहे हैं. रीयल पब्लिक इशूज को दिखाकर टीआरपी नहीं गेन कर सकते क्योंकि टीआरपी सिस्टम ही फाल्टी है. 116 करोड़ लोगों की पसंद-नापसंद सिर्फ दस हजार टीआरपी मीटर्स लगाकर नहीं मापा जा सकता. वो भी ये मीटर गुप्त रूप से लगाकर रखे गए हैं. इन टीआरपी मीटर्स में 40 फीसदी से ज्यादा छह बड़े शहरों में लगे हुए हैं. इसी कारण बंबई की कोई घटना इंपार्टेंट हो जाती है, सुल्तानपुर-सहारनपुर-बुलंदशहर की घटना पर ध्यान नहीं दिया जाता. टीआरपी के मेथड को चेंज करें. अगर आप टीआरपी मीटर्स को रुरल एरियाज की तरफ ले जाएंगे तो न्यूज चैनलों का कैरेक्टर अपने आप बदल जाएगा. टीआरपी सिस्टम को वाइडर बनाइए. एक्रास द कंट्री ले जाइए, फिर देखिए न्यूज का कैरेक्टर किस तरह बदलता है. तब किसी सेल्फ रेगुलेशन की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. दिक्कत यह है कि टीवी पर रूरल एरिया कवर नहीं होता. ऐसा गलत टीआरपी सिस्टम की वजह से है.

-जो नए लोग जर्नलिज्म में आ रहे है, उनके बारे में आपकी क्या राय है?

-मैं आपको घटना बताऊं. एक लड़की मुझसे मिलने आई. उसने कहीं से कोर्स वगैरह कर रखा था. मैं सभी से मिलता हूं क्योंकि कोई जाब के लिए आया है तो उसे कम से कम मिलने का मौका तो देना ही चाहिए. वह लड़की फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रही थी. उसने बताया कि वह पत्रकार बनना चाहती है. मैंने पूछा क्यों बनना चाहती है तो बोली- मेरी मां मुझे स्क्रीन पर देखना चाहती हैं, इसलिए टीवी जर्नलिस्ट बनना चाहती हूं. मैंने उससे पूछा कि चीफ मिनिस्टर का चुनाव कौन करता है. उसने कहा कि सोनिया गांधी करती हैं. मैंने पूछा कि क्या आप अपने जवाब से बिलकुल संतुष्ट हैं?. तो वह बोली- सारी सारी, प्राइम मिनिस्टर करता है. उसने अपने आपको करेक्ट किया.

उसको नहीं लगा कि उसने कहीं गलती की है. संभव है कल को वो किसी चैनल में चली भी जाए. ट्रेनिंग प्रापर नहीं है. इसीलिए हम बीईए में ट्रेनिंग को भी शामिल कर रहे हैं. रिपोर्टर्स की प्रापर ट्रेनिंग जरूरी है ताकि इशूज को प्रापर पर्सपेक्टवि में वे समझ सकें. अभी तो बीईए के बने चार महीने ही हुए हैं. सेमिनार और ट्रेनिंग हम लोगों के एजेंडे में है. हम पब्लिक को भी कनवींस करेंगे. हम अल्टरनेटिव माडल लेकर आ रहे हैं. अगर हम जनता को एजूकेट करेंगे तो वो बात को समझेगी. हम करेक्टिव प्रासेस अपनाकर टीवी कंटेंट को बेहतर बनाएंगे.

-नए लोगों की ट्रेनिंग में आपको क्या दिक्कत दिखती है?

-देखिए, सोशल कनसर्न मीडिया का पार्ट है. उसे हम कमिटमेंट के साथ कर पाएं, यह जरूरी है. एक वैल्यू के साथ कर सकें तो अच्छा रहेगा. मैंने खुद यही कोशिश की है और आगे भी करता रहूंगा. जर्नलिज्म में इसकी जरूरत है. डाक्टर एक आदमी का इलाज करता है. इलाज करने लायक बनने के लिए वह दस साल तक पढ़ता है. वह एक मेरिट पर आता है. हम सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए पत्रकारिता में आते हैं. तो, उम्मीद की जाती है कि जो आ रहे हैं उनकी प्रापर ट्रेनिंग हुई होगी. पत्रकारिता में आने वालों की तीन-चार साल तक ट्रेनिंग होनी चाहिए. पूरा सब्जेक्ट समझाएं तब उनमें कमिटमेंट आएगा. कल का बच्चा पार्लियामेंट कवर करने लगता है तो उसे तमाम इंस्टीट्यूशन्स के बारे में अंदाजा ही नहीं होता. हमने जिन लड़कों को अपने यहां रिक्रूट किया, उनके प्रापर ट्रेनिंग दी, इसीलिए वे अपना सब्जेक्ट अच्छे से जानते हैं. पढ़ाई बहुत जरूरी है. जर्नलिस्ट बनने के लिए बहुत हाई लेवल का ज्ञान होना चाहिए. एक क्षेत्र में नहीं, तमाम क्षेत्र में होना चाहिए. ज्ञान का कैनवस बड़ा करना चाहिए.

-टीआरपी को लेकर बीईए ने कोई पहल की है?

-टीआरपी के फाल्टी सिस्टम को ठीक करने के लिए सब लोग सोच रहे हैं. सरकार भी सोच रही है. पर दिक्कत यह है कि एडवरटाइजर अपने पैरामीटर्स पर अगर किसी से सर्वे करा रहा है तो इसमें सरकार का रोल क्या हो सकता है. मुझे किसी को विज्ञापन देना है और मुझे इसके लिए मीडिया की स्थिति जाननी है तो ये तो मेरी सैटिसफैक्शन है कि मैं किससे स्थिति पता करूं. वैसे, सरकार भी आप्शन दे रही है. वो चहती है कि चीजें स्ट्रीमलाइन हों. इंडस्ट्री भी चाहती है कि सिस्टम ठीक हो. सरकार ने इसके लिए ट्राई से सलाह मांगी है. सलाह का इंतजार है. सस्ता मीटर भी आ रहे हैं जिसे ज्यादा संख्या में लगाया जा सकता है. यह सलाह भी दी जा सकती है कि एडवरटाइजर खुद सस्ते मीटर लगवाएं. गवर्नमेंट के लेवल पर भी यह हो सकता है.

-वर्तमान टीआरपी सिस्टम से चैनल कैसे भटक रहे हैं?

-टीआरपी मीटर बांबे में लगे हैं तो वहां की बस ट्रेन के टाइम से चलने की समस्या टीवी पर सबसे बड़ी समस्या के रूप में दिखाई दे सकते हैं लेकिन गांव में टीआरपी मीटर न होने से खाद, जमीन, गरीबी, अशिक्षा जैसी समस्याएं टीवी पर नहीं देखने को मिलेंगी. यह टीआरपी सिस्टम का फाल्ट है. मीडिया कामर्शियल है. कैपिटल इंटेनशिटी है. प्राफिट का इंट्रेस्ट होगा. बावजूद इसके कोई नहीं चाहता कि वे मीडिया के रोल को छोड़े. उस रोल को मापने का मेजरमेंट तो हो. आप देखिए, ये टीवी की ही ताकत है कि एक स्टिंग से 11 एमपी एक झटके में बाहर निकाल दिए जाते हैं. तो ये क्रेडिट है टीवी मीडिया को. आज टीआरपी के लिए बहुत कुछ होने लगा है. किस बात को दिखाने से टीआरपी आएगी, इस पर ज्यादा विचार होता है. इस प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश बीईए के लोग कर रहे हैं. और, यह प्रवृत्ति रुकेगी, मुझे विश्वास है. मेरा मानना है कि टीआरपी तीन महीने पर होना चाहिए. कम से कम तीन महीने. इससे बहुत बड़ा अंतर दिखेगा कंटेंट में.

-बीईए का आगे का एजेंडा क्या है?

हम लोग दी-तीन फेज प्लान किए हुए हैं. पहले फेज में हम कंटेंट ठीक कर रहे हैं क्योंकि इसे हम इमीडिएट ठीक कर सकते हैं. न्यूज चैनल्स की जिन चीजों से सोसाइटी में प्राब्लम क्रिएट हो, उसे रोक रहे हैं. नेक्स्ट फेज ब्राडकास्टर्स एसोसिशन का है. वे लोग कर रहे हैं. टीआरपी के मेथड के बारे में सोच रहे हैं. एनबीए इसे टेकअप कर रहा है. टीआरपी का मामला दरअसरल मैनेजमेंट का मामला होता है. इसमें एडिटर का भी रोल होता है लेकिन वो सेकेंड्री है. एडिटर मैनेजमेंट को कहता भी है टीआरपी को लेकर. एडिटर तो कंटेंट ठीक कर सकते हैं जो कर रहे हैं. हमने एक मेथोडोलाजी बनाई है. तमाम इशूज पर हम मिलकर डिसीजन लेते हैं. आंध्रा में सुसाइड वाले मसले के विजुवल दिखाने को लेकर हमने तय किया कि नहीं दिखाएंगे, सो नहीं दिखाया. राजशेखर रेड्डी की मौत में मर्डर मिस्ट्री को लेकर जो अनाप-शनाप चीजें फैलाई गईं, उसे हम लोगों ने तय किया कि नहीं चलाएंगे सो नहीं चलाया और हम लोगों ने बयान जारी कर इस तरह की पत्रकारिता को कंडेम भी किया. बीजीपी के एमएलए ने सीडी बांटी जिससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता था, सो, हम लोगों ने वो सीडी न दिखाने का फैसला किया. तो ये कांट्रीव्यूशन है न्यूज चैनल्स के एडिटर्स का. वैसे ये सभी जानते हैं कि किसी भी इंस्टीट्यूशन को ग्रो करने में टाइम तो लगता है.

-बेहतर मीडिया कंटेंट और गुड डेमोक्रेसी के बीच कोई रिश्ता है?

बिलकुल है. अशिक्षा और गरीबी अच्छे लोकतंत्र को खत्म करने के लिए काफी हैं. जहां अशिक्षा और गरीबी है वहां सिटीजनशिप की क्वालिटी अच्छी नहीं रहेगी. वो नागरिक रिस्पांस ही नहीं करेगा. आप लाख इशूज थ्रो करें. वो तो सास बहू देखने लगेगा. वहीं, अंग्रेजी चैनल अपने मसाइल को देखने के लिए चिंतित रहता है. अंग्रेजी चैनल का व्यूवर चिंतित रहता है अपने मुद्दों को लेकर क्योंकि वो पढ़ा-लिखा और समृद्ध है. उसके सोच का लेवल बढ़ा हुआ होता है. अगर सिटीजन एजुकेटेड रहे तो डेमोक्रेसी की क्वालिटी बदलती है. जहां एजूकेशन कम होता है वहां पर कैपिटा इनकम भी कम होता है. एजुकेशन का सीधा रिश्ता है प्रास्परटी से. ऐसे में आप कह सकते हैं कि डेमोक्रेसी बेहतर होगी तो मीडिया कंटेंट भी अपने आप बेहतर होगा.

-प्रिंट वाले अपने पाठकों के मुद्दों को लेकर ज्यादा सचेत रहते हैं, ऐसा माना जाता है.

-प्रिंट चौबीस घंटे में एक बार प्रोड्यूस होता है. हमको हर क्षण प्रोड्यूस करना होता है. परदा हमारा एक ही है. हर क्षण देना है. एक घटना हुई तो रिपोर्टर पहुंचता है. उसे वहां सारे तथ्य नहीं पता हैं. वो जो पाता है, उसे बताता है. उसमें तात्कालिता होती है. संभव है उसके बताए में तथ्य न हो. प्रिंट में टाइम है. वो फैक्ट व कंटेंट एनालाइज कर सकते हैं. उनके-हमारे रोल में अंतर है. नोएडा में निठारी कांड हुआ तो हमारे रिपोर्टर रात-रात भर वहां पड़े रहे. पुलिस वाले तक हट गए लेकिन टीवी रिपोर्टर नहीं हटे. इस कांट्रीव्यूशन को कोई देखता नहीं है.

-आप टीवी में काम करते हुए भी पढ़ने-लिखने का वक्त कैसे निकाल पाते हैं?

जिसे पढ़ना होता है, वह वक्त निकाल लेता है. मैं तो आफिस आते-जाते कार में भी पढ़ता रहता हूं. इसके लिए लाइट लगवाई है. मुझे जब लगा कि एक घंटा तो आने में लगता है और यह वेस्ट हो जाता है तो गाड़ी में लाइट लगवाकर एक घंटे तक पढ़ना शुरू किया.

-आजकल एनजीओ के लोग गरीबी-अशिक्षा दूर करने में लगे हैं. क्या इससे कोई सफलता मिलेगी?

देखिए, ये जो एनजीओ कल्चर बढ़ा है, इससे एक तरह से शोषण ही बढ़ रहा है. आईएएस की पत्नियां एनजीओ चला रही हैं. वे सत्ता-शासन से मिल जाती हैं. ये जो एलीट ग्रुप है वह केवल बातें करता है. पावर्टी सीरियस प्राब्लम है. इसे इन लोगों ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में समेट कर रख दिया है. पावर्टी को चिकेन की टांग के साथ एसोसिएट कर रख दिया है. सबसे जरूरी है कि इंस्टीट्यूशन को मजबूत करें. इसी से भला होगा. ट्रेडीशनल इंस्टीट्यूशन्स को मजबूती देने से कई बीमारियां दूर हो जाएंगी.

एनके सिंह से बातचीत के एक अंश को यहां भी देख-सुन सकते हैं, क्लिक करें


एनके सिंह से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या फिर 09717977999 के जरिए किया जा सकता है.


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