ब्‍लैकमेलर तो वीर, बरखा और प्रभु जैसे लोग हैं

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: इंटरव्‍यू - जगदीश नारायण शुक्‍ला (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ) : जगदीश नारायण शुक्ला अपने ही ढंग के आदमी हैं और कुछ विचित्र किस्म के पत्रकार भी. जो सोचते हैं सो करते हैं, जो सही लगता है, वह लिखते और छापते हैं, दिन भर सरकार और व्यवस्था से लोहा लेते रहते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में कभी थकान नहीं महसूस करते. सफ़ेद लहराते बाल और दुबले-पतले शरीर वाले शुक्ला जी वास्तव में अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं. निर्भीक पत्रकारिता की धारणा, जो पहले हम लोगों के मन में रहा करती थी, ये उसके जीते-जागते प्रतीक हैं. सबसे विचित्र बात ये है कि उम्र के साथ भी उनकी आक्रामकता और उनके तेवरों में कोई कमी नहीं आई है. शुक्ला जी का हिंदी दैनिक ''निष्पक्ष प्रतिदिन'' लखनऊ में धमाके करता रहता है. हाल ही में उन्होंने इसे सांध्य से सुबह का बनाया.

जगदीश नारायण शुक्ला से पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक नूतन ठाकुर ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है कुछ अंश-

-आपने पत्रकारिता की शुरुआत कहां से की?

--मैंने अपनी पत्रकारिता 1970 में सीतापुर से शुरू की. मैंने लगभग इसी समय सीतापुर से साप्ताहिक अखबार शांतिदूत शुरू किया. इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि उस समय ग्रामीण क्षेत्रों की खबरें अखबारों में लगभग नहीं के बराबर प्रकाशित होती थीं. मैंने इसी उद्देश्य से यह अखबार शुरू किया. इससे पहले मैंने अवधेश अवस्थी के साथ भी कुछ समय तक काम किया था. वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और राष्ट्र सन्देश नाम से एक साप्ताहिक अखबार निकाला करते थे. मैंने कुछ दिन उनके साथ काम किया- फिर उन्होंने कहा कि तुम नौजवान हो, कुछ अपना काम करो, अपना अखबार निकालो. उन्हीं की प्रेरणा से मैंने अपना साप्ताहिक निकालना शुरू किया.

-कुछ उन दिनों की बात बताएंगे?

--शुरुआत में हम अपने आप से अखबार प्रेस में छपवा कर के खुद ही लोगों को देने जाते थे,  कम्पोजिंग खुद करते फिर छपवाया करते. इमरजेंसी में मेरा अखबार बंद कर दिया गया और मुझे जेल भेज दिया गया. डेढ़ साल जेल में रहा. इमरजेंसी खत्म होने के बाद जेल से बाहर आ गया. फिर जनता पार्टी की सरकार बनी पर अफसर तो कुल मिला कर वही थे इसीलिए मदद नहीं हो पायी. मैं भी इससे तंग आ कर 1979 में दुबारा लखनऊ शिफ्ट हो गया. लेकिन इससे पहले मेरी पढाई-लिखी लखनऊ में ही हुई थी. अबकी लखनऊ में आ कर सरकारी नौकरी शुरु की पर उस समय तक भ्रष्टाचार का रूप शुरू हो गया.

-उस समय का भ्रष्टाचार आज की तुलना में कैसा पाते हैं?

--आज की तुलना में तो बहुत कम था. लेकिन शुरु हो गया था- इसके खिलाफ मैं आगे बढ़ा. मैं सिविल डिफेंस विभाग में था. लेकिन जब मैं इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ आगे बढ़ा तो मेरे खिलाफ भी भयानक षडयंत्र शुरू हो गया और मजबूरन मुझे हटना पड़ गया. वे होम गार्डों के मस्टर रोल फर्जी बनाते थे. उस समय दैनिक भत्ता पचहत्तर पैसे मिलता था और ये उसमे भी कुछ फर्जी बनाते थे. मैंने उसका प्रतिवाद करना शुरू किया. लिखा-पढ़ी मैंने शुरू कर दी. उस समय एक एडीएम हुआ करते थे- मिस्टर सच्चिदानंद पांडे, बाद में आईएएस अफसर भी हुए पर उस वक्त जगदीशएडीएम थे. और एक डिस्ट्रिक्ट लेवल अफसर हुआ करते थे- छत्रपाल सिंह. ये कई अधिकारी थे जो इस मामले में फंसे और इन के खिलाफ मुकदमे भी चले- फर्जी मस्टर रोल बनाने के. ये सब दुश्मन हो गए और इन्हीं के मारे मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं रहेगा, नौकरी छोड़ दी और अपनी खेती-बाड़ी गाँव जा कर करने लगा था. इसी बीच एक बार फिर अखबारों से जुड़ना शुरू हो गया था और एक बार फिर मैं लखनऊ में था. मैंने लगभग इसी समय लखनऊ में डेढ़ साल तक एक साप्ताहिक निकाला और फिर 30 जनवरी 1982 को निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन शुरू किया और तब से हमारा अखबार निरंतर चलता रहा. सरकारें जो भी आयीं- कांग्रेस सरकार के खिलाफ लिखा, मुलायम सिंह के खिलाफ लिखा, कल्याण सिंह, मायावती जब भी मुझे जो बात मालूम हुई मैंने जरूर उसके खिलाफ खुल कर लिखा. राजनाथ सिंह आये, उस सरकार से भी झगडा हुआ. इस तरह मामला इतना बढ़ गया कि 2002 में मुझे अखबार बंद करना पड़ गया. और 2007 अप्रैल तक बंद रखा. फिर 2007 में ही अखबार दुबारा शुरू किया. जो लिखने की बात थी वो मैंने लिखा. वैसे कहने को तो लोग कहते हैं कि अखबारों को सही लिखना चाहिए पर सच तो यही है कि ये जितने पूंजीपतियों के अखबार हैं वे अपना धंधा और अपना हित बढाने के चक्कर में लगे रहते हैं. छोटे अखबार जो हैं, वे बेचारे कुछ लिखते-पढते हैं पर उन्हें तरह-तरह की तकलीफे उठानी पड़ती हैं.

-अपना अखबार निकालना और वह भी बिना पूंजी के, आपको कैसा अनुभव हुआ?

--मैंने जब साप्ताहिक निकाला तो मेरे खिलाफ लगभग 30 या 35 मुकदमे चलाये गए. और हिंदी दैनिक अखबार जब से शुरू हुआ है तब से सहारा ने ही लगभग 25 मुकदमे मानहानि के किये हुए हैं. और कई अफसरों ने चलाये कि साहब इन पर मानहानि चले. जबकि खबरें सही हैं पर मुक़दमा डाल देते हैं क्योंकि इसको ले कर कोई ठोस कानून तो है नहीं. अब मुक़दमा डाल दिया, आप लड़ते रहिये.

-क्या आपको ऐसा लगता है कि जो नए अखबार शुरू होते हैं या जैसा आपने शुरू किया, बड़े अखबार नहीं चाहते हैं कि ये आगे आयें?

--ये बात बिलकुल सही है. अव्वल तो ये चाहते नहीं कि कोई नया आये और उनकी कोशिश ये होती है कि इन को हर तरह से दबा दिया जाए और अपना काम चले. अभी आपने जो बात दिल्ली की सुनी है कि दिल्ली में जो सो-कॉल्ड जर्नलिस्ट हैं, वो बरखा दत्त हों या वीर संघवी  हों, ये लोग पैसा केवल कमाने का धंधा करते हैं. आपके जो प्रभु चावला हैं उनके लड़के की सीबीआई जांच हो रही है, उनके खिलाफ भी तमाम आरोप हैं. ये एक जरिया बना हुआ है और पैसा कमाने का उपाय है. ब्लैकमेलिंग का काम जो वास्तव में कर रहे हैं, वे बड़े अखबार के और बड़े संस्थान के लोग हैं. प्रचार ये होता है कि छोटे अखबार वाले तो ब्लैकमेलर हैं. छोटे अखबार वाले किसको ब्लैकमेल करेंगे भाई? ये ब्लैकमेलर तो साबित हुए हैं बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर संघवी. इनके बारे में कोई कुछ नहीं कहता. हाँ, ये लड़ाई तो चल ही रही है.

-आपकी पत्रकारिता जो रहती है, आपका अखबार 'निष्पक्ष प्रतिदिन' आक्रामक तेवर लिए रहता है तो उससे परेशानी भी आती है?

--परेशानी बराबर आती है- मतलब धमकियां आती हैं, तमाम चीज़ें होती हैं पर इस मामले में मेरे जो गुरु थे पंडित अवधेश अवस्थी,  जिनके सानिध्य में मैंने अखबार शुरु किया था, उनका कहना था कि यदि अखबार निकालिए तो अखबार होना चाहिए, पढ़ के लगे कि कोई अखबार है. अखबार में आप सही लिखिए- राग-द्वेष से हट कर. और इसीलिए मैंने अपने अखबार में एक स्लोगन दिया है- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर. जो कहा गया था न कि कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर. अब हम उसी परिपाटी पर चल रहे हैं और उसी पर चलते रहेंगे. बाकी आप देख रहे हैं कि हमारे अखबार का उत्तर प्रदेश शासन ने विज्ञापन बंद कर रखा है पिछले दो साल से. क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते. सभी चीज़ें हैं, सभी नियमों के अंतर्गत हमारा अखबार है पर उन अखबारों को विज्ञापन मिल जाता है जो ब्लैकलिस्टेड हैं और छापते ही नहीं, महीने में एक बार केवल ऑफिस कॉपी बन जाती है और अपने को अखबार वाला बता कर अफसरों के साथ लगे हुए हैं.

-इसमें कमीशन का भी चक्कर होगा?

--फिफ्टी परसेंट. यहाँ कमीशन फिफ्टी परसेंट चल रहा है. मैंने तो एक से कहा कि यदि मुझे कमीशन देना होगा तो अपने गाँव नहीं चला जाऊंगा, मेरे पास तो पर्याप्त जमीन है- मैं खेती करूँगा. जब मैंने यहाँ मकान बनाया तो तीन हज़ार की ज़मीन खरीदी थी 1964 में. ट्यूशन पढाता था, यहीं रहता था- उसी पैसे से ज़मीन खरीदी अब यहाँ धीरे-धीरे बड़ा घर बना लिया. मेरे खिलाफ लोगों ने कहा कि बहुत बड़े नेता बनते हैं, स्वनामधन्य पत्रकार हैं- इनका इन्कम टैक्स देखा जाए, तो मेरे इन्कम टैक्स की जांच करा दी गयी. पिछले बीस साल से जब से डेली अखबार है, मैं बराबर इन्कम टैक्स देता रहा हूँ. टैक्स जो बनता है हमेशा देता हूँ. यहाँ तो ऐसे ऐसे लोग हैं जो टैक्स नहीं देते और चलते हैं पन्द्रह लाख की गाड़ी से.

-क्या इसमें बड़े अखबारों की साजिश होती है?

--यही तो साजिश है. लखनऊ में जो बड़े अखबार हैं उनके ऊपर कीमत लिखा है चार रुपया. और ये अखबार बेचते हैं साठ पैसे में. नाम नहीं लेना चाहता. वे ऐसा इसीलिए करते हैं ताकि छोटे अखबार बिक नहीं पायें.

-उस दौर और आज के दौर में क्या अंतर आया है?

--उस दौर में कई पत्रकार दूसरे ढंग के थे. 1986-87 में मैं सचिवालय की प्रेस कमिटी का चेयरमैन था. उस समय के सीनियर-मोस्ट जर्नलिस्ट थे पीटीआई के मिस्टर नकवी, मिस्टर नय्यर, पंडित एसके त्रिपाठी इंडियन एक्सप्रेस के थे, आकाशवाणी में आरके टंडन थे, विधान सभा अध्यक्ष रह चुके पुरुषोत्तम दास टंडन के लड़के, ये लोग स्कूटर या रिक्शे से चलते थे. आज सभी अखबारों में दो-पहिया वाहन ही दिखेंगे. और इन पत्रकारों की रिहायिश इनकी तनख्वाह से तीन गुणा ज्यादा है. लेकिन आज भी दूसरे तरह के लोग हैं. लखनऊ में ही प्रदीप कपूर हैं जो अब ब्लिट्ज में है, उनके पिता ने कभी उन्हें स्कूटर दिया था, उसी स्कूटर पर वह गरीब चल रहा है- नया नहीं खरीद पाए- जबकी बीवी नौकरी करती है- खुद भी लिखते-पढ़ते हैं और अच्छा पैसा पाते हैं. यहाँ ऐसे भी हैं जो कहीं नहीं हैं पर बीस करोड़ की सम्पति के मालिक हैं. मैं एक ऐसे पत्रकार को जानता हूँ जो अपने घर के बिजली का किराया नहीं देते पर बीस लाख की गाड़ी में चलते हैं. यह सब नैतिक मूल्य में गिरावट का परिणाम है. हर समाज की तरह पत्रकारिता में भी, प्रयास करना चाहिये, सुधार की कोशिश होनी चाहिए, यहाँ कई अच्छे लोग भी हैं.

-क्या इसके पीछे पत्रकार की कम तनख्वाह भी है?

--तनख्वाह से सुधार नहीं होगा, चरित्र में सुधार की जरूरत है. तनख्वाह पहले से बीस गुणा ज्यादा हो गयी है. पहले 200- 250  रुपये मिला करते थे, अब पचीस-तीस-पचास हज़ार की तनख्वाह मिल रही है. जरूरी है अपने सेंस को सुधारे, अपनी ओर उंगली ना उठने दें.

-क्या स्ट्रिंगर की तनख्वाह में कमी इसका कारण है?

--ये कोई कारण नहीं है. जो ठीक हैं वो अपना जीवन बीता लेते हैं- इसी रकम में. यहीं लखनऊ में गिरिधारी लाल पाहवा थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे. वो स्ट्रिंगर थे, कम तनख्वाह थी पर इसी में अपना जीवन जिया करते थे, कोई गलत काम नहीं करते थे. हम लोगों को इस बारे में खुद सोचना पड़ेगा.


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