गाली देने के लिए गाली बकने की जरूरत नहीं होती : कमाल खान

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 कमाल खान: इंटरव्यू : कमाल खान (वरिष्ठ पत्रकार, एनडीटीवी) : मुझे पार्टियों में जाना, किसी के आगे-पीछे करना, बिलावजह डिनर पर जाना अच्छा नहीं लगता : पुरस्कार मिलते रहते हैं पर मैं यही मानता हूँ कि हर आदमी को अपना काम चुपचाप लो प्रोफाइल हो कर करते रहना चाहिए : मैंने एक मुख्यमंत्री की कुछ जनविरोधी बातों पर एक बार कहा था-“ तुझसे पहले एक शख्स जो यहाँ तख्तनशीं था, उसको भी अपने खुदा होने का उतना ही यकीं था” :


कमाल खान पत्रकार हैं. और रूचि कुमार भी. नाम से ही जाहिर हो जाता है कि दोनों दो धर्मों के मानने वाले हैं. हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में धर्म का बड़ा ताना-बाना है, बहुत सारी पेचीदगियां हैं. कुल मिला कर धर्म में इतनी ताकत है कि किसी को भी किसी से लड़ा दे. फिर हमारे देश में तो इस तरह की लड़ाइयां दिखती ही रहती हैं. दंगे, आतंकवाद, अलगाववाद, बंटवारा इन सब की जड़ में धर्म ही तो है. ऐसे में कमाल और रूचि जैसे लोग कुछ गड़बड़ से दिखते हैं क्योंकि इन लोगों के मामले में यह धर्म रूपी धारदार हथियार काफी कुंद सा हो जाता है. कठमुल्लाओं और कट्टरपंथियों की कौन कहे, पारंपरिक सोच वाले तमाम लोगों को भी ऐसे लोगों से बड़ी परेशानी का अनुभव होने लगता है. अरे, ये कोई बात हुई? आप मुसलमान हैं, वो हिंदू है. पहले सरेआम प्रेम किया, फिर खुलेआम शादी कर ली. फिर शान से एक दूसरे के साथ आराम से रह रहे हैं. यह तो हद है. समाज भी कोई चीज़ है, दुनिया का भी कोई रिवाज़ है. या फिर बस जो मन में आया वही कर लिया? ऐसे तो चल चुकी दुनिया!

लेकिन कमाल और रूचि की गलतियां यहीं खत्म नहीं होतीं. वे और तरह से भी समाज के कई हिस्सों में गोलमाल कर रहे हैं. पत्रकार हैं, और वह भी आज के नहीं. बीस-बीस सालों का अनुभव है दोनों का, उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के चोटी के पत्रकारों में उनकी गिनती है. दो बार राष्ट्रपति से पुरस्कृत हो चुके हैं कमाल और पिछले दो सालों में पांच पुरस्कारों से. रूचि ने दुनिया के सबसे बड़े टीवी समूह सीएनएन से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन से जुड़े वृत्तचित्र तक पर काम किया है. पर इतने गलत लोग हैं ये कि अभिमान ही नहीं करते, ना नखरा, ना अदाएं और ना किसी से बदसलूकी. आप से बात करेंगे तो सर-सर कह के, जबकि सैकड़ों आईएएस अफसर और उत्तर प्रदेश का हर बड़ा नेता इनकी एक आवाज पर भागे चले आयें.

पर इन्हें है कि बस अपने काम से मतलब- पत्रकारिता से जुड़े तमाम अन्य कार्यों से जैसे कोई वास्ता ही नहीं. अरे ट्रांसफर, पोस्टिंग कराते नहीं हो, कोई पैरवी करते नहीं हो, अपने पावर को दिखाते नहीं हो, यहाँ-वहाँ लॉबीगिरी करते नहीं हो, नेताओं के यहाँ डिनर पर जाते नहीं, तीन-पांच करना नहीं. तो फिर भैया, काहे को पति-पत्नी मिल कर दो महत्वपूर्ण स्थान रोके पड़े हो. किसी भले आदमी को मौका दो, जो अपना भी कुछ कल्याण कर सके और अपने आस-पास वालों का भी. इसी परम बौडम शख्स से मैंने (अमिताभ ठाकुर) एक लंबी बातचीत की जिसके अंश आप के सम्मुख प्रस्तुत हैं-

प्र- कुछ अपने बारे में बताएं?

उ- मैं मूल रूप से लखनऊ का ही रहने वाला हूँ. पुराने लखनऊ में हमारा मकान है. मैंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से इंग्लिश में एमए किया था और उसके बाद रशियन भाषा में एडवांस डिप्लोमा. इसके बाद मेरा इरादा रूस जाने का था. लगभग पूरी तैयारी हो गयी थी कि अचानक माँ की तबियत काफी खराब हो गयी. माँ की बीमारी की वजह से रूस नहीं जा पाया और फिर इस क्षेत्र में चला आया.

प्र- पत्रकारिता में कैसे आये?

उ- जैसा कि मैंने कहा, मेरी शुरू में रूचि अन्य क्षेत्रों में थी पर जब इंडिया में रह गया तो धीरे-धीरे पत्रकारिता में दिल लगाने लगा. मैंने वर्ष 1990 में नव भारत टाइम्स के लखनऊ कार्यालय से अपना काम शुरू किया. यह अखबार तीन साल बाद 1993 में बंद हो गया. उस समय विनोद शुक्ल ने मुझे अपने अखबार में काम करने का अवसर दिया लेकिन मैंने कुछ दिनों बाद वहाँ से रिजाइन कर दिया. फिर दिसम्बर 1994 में मैं एनडीटीवी में चला आया और उसके बाद यह मेरे दूसरे घर की तरह ही हो गया. तब से पिछले अट्ठारह सालों से मैं एनडीटीवी में ही हूँ.

उस समय एनडीटीवी का अपना चैनल नहीं था. शायद आपको स्मरण हो कि उस समय डीडी टू यानि डीडी मेट्रो पर अंग्रेजी में एक न्यूज़ बुलेटिन आती थी 20 मिनट की. यह प्रोग्राम स्वयं प्रणव रॉय प्रस्तुत करते थे. मैं उसी समय से प्रणव रॉय सर के साथ जुड़ा तो आज तक यह साथ कायम है.

प्र- कुछ रूचि जी के बारे में बताएं?

उ- रूचि भी मेरी तरह लखनऊ की हैं. ये लोग मूल रूप से माथुर कायस्थ हैं और एक बहुत बड़े परिवार को बिलोंग करते हैं. इनके परिवार का सीधा सम्बन्ध वाराणसी के बड़े कायस्थ परिवारों और पूर्व उपराष्ट्रपति कृष्णकांत जी के परिवार से भी था. इनकी दादी ने उस जमाने में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पी एचडी किया था. पर उस समय इनकी दादी के पिता ने उन्हें इंग्लैंड जाने की अनुमति मात्र इसी शर्त पर दी थी कि वे वेस्टर्न कल्चर में नहीं ढलेंगी और किसी फिरंगी से शादी नहीं करेंगी. वे बहुत ही लंबे समय तक सिंधिया कॉलेज की प्रिंसिपल भी रहीं.

रूचि के पिता तो और भी विलक्षण व्यक्ति थे. वे आचार्य नरेन्द्र देव के सेक्रेटरी रहे. वे लोग पैसे वाले लोग थे, झारखंड में उनकी बौक्साईट की दो बहुत बड़ी माइंस थीं. पर वे मूलतः सोशलिस्ट विचारधारा के थे, इसीलिए माइंस को पैसा कमाने का नही बल्कि देश की और मजदूरों की सेवा करने का माध्यम समझते थे. इस कदर मजदूरों के हितैषी थे कि वे खुद उन्ही लोगों के गाँव में रहते थे. चाहे कहीं भी हों, ठीक सात तारीख को वे अपने माइंस में पहुँच जाते. उनका कहना था कि मजदूरों को समय से वेतन नहीं मिलने पर उन्हें कठिनाई होगी. आज भी वे रिक्शे पर चलते हैं, खादी का कपडा पहनते हैं और हमेशा कहते हैं कि बेटा यदि रिक्शे पर बैठना हो तो बूढ़े रिक्शे वाले के रिक्शे पर बैठो क्योंकि उसे सवारियां कम मिलती हैं.

एक बार झारखण्ड में उनके पास नक्सलाईट पहुंचे. उन्हें उम्मीद थी कि पैसे वाला है, कुछ बढ़िया पैसा मिल जाएगा. पर वहाँ देखा तो केवल खादी के कपडे और दुनिया भर की किताबें. वे लोग आश्चर्यचकित रह गए, फिर इनसे काफी देर बात करने के बाद इनके पाँव छू कर वहाँ से आये.

ऐसे परिवार का पूरा संस्कार रूचि को भी मिला.

प्र- रूचि जी के पत्रकारिता सम्बंधित कैरियर के बारे में कुछ?

उ- रूचि ने टाइम्स ऑफ इंडिया के एक संस्थान टीआरएस द्वारा उस समय संचालित मीडिया एंड मास कम्युनिकेशन के एक आल इंडिया कम्पीटिशन में भाग लिया था जिसमे पूरे देश से मात्र 11 लोग चयनित हुए थे. टाइम्स ऑफ इंडिया वाले इन चयनित लोगों को ट्रेनिंग के बाद अपने यहाँ ही नौकरी भी देते थे. रूचि ने टाइम्स ऑफ इंडिया के जयपुर कार्यालय में ट्रेनिंग लिया और उसके बाद वे लखनऊ आ गयीं.

वहाँ कुछ साल रहने के बाद वे टीवी में चली आयीं और 1993 में विनोद दुआ द्वारा डीडी के लिए बनाए जा रहे एक बहुत चर्चित प्रोग्राम ‘परख’ के लिए यूपी का काम देखा. इसके बाद वे कई सालों तक फ्रीलांस काम करती रहीं. इस दौरान इनको एक से बढ़ कर एक महत्वपूर्ण दायित्व निभाने का मौका मिला. उस दौरान गिरीश कर्नाड टीवी के लिए स्वराजनामा बना रहे थे, रूचि ने इसके लिए पूरे यूपी की जिम्मेदारी ली. फिर मेनका गाँधी की वाइल्ड लाइफ से जुड़े एक कार्यक्रम हेड्स एंड टेल्स के लिए काम किया जिसमे दुधवा पार्क, कॉर्बेट पार्क जैसे कई जगहों पर सैकड़ों स्टोरी की. प्रीतिश नंदी ने अटल बिहारी वाजपेयी पर एक डोक्युमेंटरी बनायी थी जो उनके पहली बार पीएम बनने पर टीवी पर दिखाई भी गयी थी. इसमें भी यूपी का कम रूचि ने ही किया था.  इसके अलावा आर्ट एंड कल्चर नामक एक प्रोग्राम के लिए काम किया था जो सी एन एन तक पर प्रदर्शित हुआ. इसके लिए वे बद्रीनाथ से लेकर केदारनाथ तक ना जाने कितनी बार गयीं. अब कई सालों से इंडिया टीवी में हैं.

प्र- आप दोनों की शादी के बारे में?

उ- हमारी मुलाक़ात टाइम्स ऑफ इंडिया में हुई जब मैं नव भारत टाइम्स और वह टाइम्स में थीं. मुलाक़ात के बाद मिलने जुलने का सिलसिला चलता रहा और करीब दो साल बाद हमारी शादी हुई.

प्र- शादी में कोई दिक्कत, परेशानी?

उ- परेशानी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मेरी माँ ने मेरी शादी के छह माह बाद अचानक मुझसे पुछा कि बेटा रूचि की जाति क्या है, कुछ आस-पास वाले पूछते रहते हैं, मालूम हो तो बता दूंगी. कुल मिला कर दोनों परिवार के लोगों ने इस शादी में भरपूर योगदान और सहयोग दिया और बड़े जतन से हमारी शादी कराई. मेरे पिता थे नहीं, पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी थी. माँ ने कोई आपत्ति की नहीं. रूचि के पिता तो और भी मजेदार थे. उन्होंने हमारी शादी का कार्ड अपने हाथ से लिख कर उसे लैटर प्रेस से निकलवाया क्योंकि उनका कहना था कि लोग बाद में यह नहीं कहने की स्थिति में हों कि उनकी लड़की रूचि ने भाग कर शादी की है.

हमने स्पेशल मैरेज एक्ट में अप्लाई किया-राकेश ओझा उस समय एडीएम थे. और फिर नियत समय पर हमारी शादी हो गयी.

प्र- कुछ अपने बारे में और भी?

उ- देखिये मैं यही जानता हूँ कि मैं बहुत ही साधारण आदमी हूँ. मैं यह मानता हूँ कि मैं पत्रकारिता में अपना काम अपनी पूरी कोशिश भर करता हूँ और पूरी इमानदारी से करता हूँ. इसके बाद मेरी जिंदगी में बहुत कुछ है और मैं अपनी उसी दुनिया में खोया रहता हूँ. कुल मिला कर मैं मूलतः एक पारिवारिक आदमी हूँ जो अपने ड्यूटी के अलावा अपनी बीवी और बच्चों में लगा रहता है. मुझे पार्टियों में जाना, किसी के आगे-पीछे करना, बिलावजह डिनर पर जाना अच्छा नहीं लगता. इसीलिए मैं अपनी तरह की जिंदगी जीता हूँ. हाँ, यदि कोई भी रचनात्मक कार्य होता है तो मैं जरूर करने की कोशिश करता हूँ.

प्र- कुछ हज़रतगंज के सौदर्यीकरण के बारे में बताएं. इसमें आप दोनों के कार्यों की बड़ी सराहना हुई है.

उ- दरअसल मैं और रूचि जब भी विजय शंकर पाण्डेय, एडिशनल कैबिनेट सेक्रेटरी से प्रेस कांफ्रेंस आदि में मिलते तो हर बार हजरतगंज की तमाम समस्याओं के बारे में उन्हें बताते रहते. इसी बीच सरकार के स्तर पर हजरतगंज के सौदर्यीकरण के बारे में कुछ विचार हुआ. इसके बाद हम लोगों ने सतीश चंद्र मिश्रा से भी इसकी चर्चा कई बार की. वे लोग सोचते कि ये दोनों कभी अपने फायदे की बात नहीं करते, हमेशा सार्वजनिक हित की बातें करते रहते हैं. सो उन लोगों ने उन्होने कहा कि हज़रतगंज के सौदर्यीकरण से जुड़े आर्किटेक्ट अपने पुत्र के साथ कमाल खाननासीर मुंजी से एक शानदार प्लान बना कर हम उन्हें दें तो वे इसे उत्तर प्रदेश डेवेलपमेंट काउन्सिल से आगे बढायेंगे. इसके बाद सरकार ने सौ लोगों की एक ‘लखनऊ कनेक्ट’ नाम से इन्फोर्मल संगठन बनाया जिसमे शहर के कई नामी-गिरामी और पुराने लोगों को शामिल किया. इसमें आर्ट, कल्चर, जर्नलिज्म, लिटरेचर, और हर क्षेत्र के लोग शामिल हुए. इन लोगों की मीटिंग हुई पर यह महसूस किया जाने लगा कि सौ लोगों की कमिटी बहुत बड़ी हो जा रही है. इसके बाद एक कोर कमिटी बनी. इसकी कई बैठकें हुई, कुछ सतीश चंद्र मिश्रा के घर पर, कुछ  शरद प्रधान के यहाँ, कुछ सुनीता ऐरन तो कुछ मेरे यहाँ. कई सारी बैठकें यूनिवर्सल बुक डिपो वाले चंदर प्रकाश के यहाँ हुईं. हम लोगों का रोल एक तरह से निशुल्क कंसल्टेंट का रहा. फिर इसमें हजरतगंज ट्रेडर एसोशिएशन भी शामिल की गयी. किशन चंद अम्बानी,  लीला ब्रदर वाले, संदीप कोहली, रस्तोगी जी आदि. सरकार ने कहा कि ट्रेडर की सहभागिता भी हो और जहां बाकी काम सरकार करे वहीँ पुताई ये लोग खुद कराएं ताकि आगे का मेंटेनेन्स भी ये लोग करेंगे. हम लोगों का रोल शायद इसीलिए रहा क्योंकि पत्रकार लोग बड़े लोगों से मिल पाने में सक्षम होते हैं.

प्र- कुछ अपने पुरस्कारों के बारे में बताएं?

उ- देखिये, पुरस्कार मिलते रहते हैं पर मैं यही मानता हूँ कि हर आदमी को अपना काम चुपचाप लो प्रोफाइल हो कर करते रहना चाहिए. अब पिछले दो सालों में मुझे पांच पुरस्कार मिले. एक तो रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला. फिर गणेश शंकर विद्यार्थी अवार्ड मिला. यह अवार्ड पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया के लिए था. पहली बार इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए शुरू हुआ और मुझे भी मिला. ये दोनों पुरस्कार स्वयं राष्ट्रपति के हाथों मिला. इसके अलावा एक न्यूज़ टेलीविजन अवार्ड मिला जो मेरे अलावा अरूण पुरी साहब को मिला. फिर पर्यावरण पर बेस्ट रिपोर्टिंग के लिए अवार्ड मिला. अभी हाल में सार्क कंट्री राइटर अवार्ड मिला, दक्षेश देशों की संस्था सार्क द्वारा. पहले इसमें सिर्फ लेखकों को अवार्ड मिलते थे, अबकी पत्रकारों को भी शुरू किया है. मुझे और उदय प्रकाश को यह पुरस्कार मिला.

प्र- अंत में कुछ जीवन का फलसफा?

उ- मैं चुपचाप अपना काम करता हूँ. मैं मानता हूँ कि एक रोल टीवी के जरिये अदा किया, अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जियेंगे. मैं फॅमिली मैन हूँ, बीवी बच्चों के साथ घूमना फिरना, ना मीडिया सेंटर गए, ना यहाँ वहाँ बिलावजह घुमक्कडी की. अपने काम से काम रखता हूँ.

हाँ, यह है कि मैं अपनी बात पूरी शिद्दत से कहता हूँ, लेकिन मेरा मानना है कि गाली देने के लिए गाली बकने की जरूरत नहीं होती. कई बार मेरी बात सरापा गाली होती है पर मैं बहुत ध्यान रखता हूँ कि मेरी भाषा बहुत ही संयत हो. मैंने एक मुख्यमंत्री की कुछ जनविरोधी बातों पर एक बार कहा था-“ तुझसे पहले एक सख्श जो यहाँ तख्तनशीं था, उसको भी अपने खुदा होने का उतना ही यकीन था”. इसी कारण से कुछ लोग मुझसे नाराज़ रहते हैं. पर मैं तो अपना काम अपने ही ढंग से करता हूँ. और यही हाल रूचि का भी है.

अब देखिये, कुछ दिनों पहले मैं श्रावस्ती गया था मुख्यमंत्री के दौरे को कवर करने के लिए. वहाँ मैं स्थानीय पत्रकारों से बहुत आराम से हंस-बोल रहा था, पुलिस के एक सीओ आये और कहा कि आप तो बड़े खुशमिजाज हैं, टीवी पर तो आप बड़े ही खतरनाक दिखते हैं. मैंने उनसे कहा आप खुद देख लीजिए, मैं कैसा हूँ.

यही है मेरी और रूचि की जिंदगी का उसूल और यही हैं हमारे जीवन जीने के ढंग.

अमिताभ ठाकुरलखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान का यह इंटरव्यू आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने लिया है. इस इंटरव्यू के बारे में अगर कुछ कहना चाहते हैं तो अपनी प्रतिक्रिया नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए लिख-भेज सकते हैं.


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