अमेरिका पहुंचते ही नूतन ठाकुर कई मुश्किलों से घिरीं

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जब मैं भारतीय समय के अनुसार एक अप्रैल की रात्रि के करीब दस बजे नयी दिल्ली हवाई अड्डे से अमेरिका के लिए चली थी तो मन में एक साथ कई तरह की भावनाएं घुमड़ रही थीं. मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि मैं अकेले अमेरिका जाउंगी. बल्कि सच कहा जाए तो मैं हिंदुस्तान में भी बहुत कम जगहों पर अपने पति अमिताभ जी और बच्चों के बगैर गयी होउंगी.

लेकिन यह तो सीधे एक बार में ही अमेरिका! बाप रे बाप. पता नहीं क्या होगा, कैसे होगा, क्या करना होगा. ये दुनिया भर की बातें मेरे दिमाग में आ रही थीं. लेकिन जो कहते हैं ना कि जब ओखल में सर रख ही दिया तो मूसल से क्या डरना. रास्ते में कुछ देर तो जगी रही पर थोड़ी देर बाद नींद आ गयी. फिर जगी तो भी बस वैसा ही लग रहा था जैसा सोते समय. हाँ, सोते समय भी अँधेरा था और अब नींद खुलने पर भी अँधेरा ही था. जगह कहाँ है, किस तरफ जा रहे हैं, कब तक पहुंचेंगे... इसका लेश मात्र भी ज्ञान नहीं था. बस इतना जानती थी कि एक लंबी यात्रा के बाद अमेरिका के पूर्वी तट पर बसे न्यू आर्क नामक स्थान पर हम उतरेंगे, जो न्यूयोर्क के पास ही कहीं है. बताया गया था कि रात के लगभग साढ़े चार बजे हवाई जहाज न्यू आर्क लिबर्टी इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर लैंड करेगा. मैंने अपने साथ अमेरिका में काम कर सकने वाला एक मोबाइल फोन ले लिया था और अपने कंप्यूटर के लिए भी अमेरिका में काम करने वाला डाटाकार्ड लिया था. लेकिन अभी वह काम करता नहीं दिख रहा था.

कुछ देर बाद अनाउंसमेंट होना शुरू हुआ कि न्यू आर्क एअरपोर्ट आने वाला है. जहाज़ के एअरपोर्ट पर पहुँचने पर हम लोग नीचे उतरे और अपने सामन का इन्तज़ार करने लगे. एकदम अनजानी-सी जगह, एकदम अनजाने लोग. लेकिन मुझे यहाँ ज्यादा देर तक नहीं रुकना था. थोड़ी ही देर बाद मेरी फ्लाईट वाशिंगटन शहर के लिए थी. मैं अपने सामान के साथ निकली और दो घंटे बाद वाशिंगटन जाने वाली फ्लाईट की खोजबीन करने लगी. कुछ मेहनत के बाद मैंने अपने जहाज़ के बारे में जानकारी हासिल कर ली. कुछ और समय बीतने पर मैं अपने नए जहाज़ में थी, आज के अपने गंतव्य के आखिरी ठिकाने की ओर.

और इसके बाद ही मेरी कई सारी मुसीबतें भी शरू हुईं. सबसे पहली और सबसे बड़ी मुसीबत तो तब आई जब मैं वाशिंगटन हवाई अड्डे पर उतरी. वहाँ जब लगेज चेक करने गयी तो मालूम पड़ा कि मेरे सामान ही नहीं हैं. काफी खोजबीन की गयी पर सामान मिले नहीं. मैं तो एकदम से घबरा गयी, मेरे तमाम कपड़े, कंप्यूटर, अन्य सामान अचानक से गायब हो गए दिख रहे थे. मैंने अपने साथ कोई ज्यादा पैसा रखा नहीं था. चूँकि पूरा टूर अमेरिकी सरकार द्वारा स्पोंसर था इसीलिए अधिक पैसा रखने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि पैसे की कोई जरूरत ही नहीं थी. साठ डॉलर अमेरिकी एम्बेसी से मिले थे और करीब पांच सौ डॉलर मैंने अपने लिए कुछ खास जरूरतों के हिसाब से रख लिया था. लेकिन लग रहा था कि वे सारे पैसे अभी ही खर्च करने पड़ेंगे. मेरे पास उपाय भी क्या दिख रहा था- सामान गायब, मैं एकदम अकेली, एक बिलकुल नए और अनजाने शहर में. मुझे तो काटो खून नहीं. घबराहट तो हो ही गयी थी.

वहाँ एअरपोर्ट पर अधिकारियो से पूछूं तो वे भी हतप्रभ और परेशान. उनका कहना था कि अमेरिका में ऐसा नहीं होता. पर मैं तो देख रही थी अमेरिका में मेरे साथ उतरते ही ऐसा हुआ है. मैं कुछ कह भी नहीं सकती थी पर चुप रहना भी मुश्किल था. एअरपोर्ट के लोग मेरा सामान खोजने में लगे थे और इसी बीच घर से अमिताभ जी और मेरे सास-ससुर के फोन आ रहे थे. जाहिर है वे लोग भी मेरे लिए उत्सुक होंगे, शायद परेशान भी. मुझे इन फोनों के आने से अलग से कोफ़्त हो रही थी, कुछ लाज सी भी आ रही थी कि वे लोग क्या कहेंगे- जाते ही सामान भुला दिया. साथ ही बहुत परेशान भी हो जायेंगे. मैंने अमिताभ जी का फोन दो-तीन बार काटा पर जब वे लगातार फोन करते ही रहे तो मैंने कह दिया कि अभी बाद में बात होगी. अमिताभ जी को बहुत अच्छा नहीं लगा होगा क्योंकि आवाज में अच्छी-खासी तल्खी थी. पर मैं क्या करती- परेशानी ही इस तरह की थी. फिर अमिताभ जी के पिता का बोकारो से फोन आया. ससुर थे लिहाजा उन्हें इस तरह कह भी नहीं सकती थी, तुरंत यह बात उड़ जाती कि अमेरिका जाते ही इसके रंग-ढंग बदल गए हैं. एक-आध मिनट बात किया और फिर कोई बहाना बना कर बाद में बात करने की बात कह दी.

जब काफी देर तक सामान नहीं मिला तो एयरपोर्ट के लोगों ने कहा कि आप होटल चलें, हम सामान खोजने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. बड़ी चिंतातुर दशा में होटल पहुंची. लगातार सोच में डूबी रही. मेरठ से फिर फोन आया पर एक मिनट बात करके काट दिया. अंत में शाम में जाकर सामान मिल सका. जब वहाँ के आदमी ने आ कर सामान दिया तो एकदम से ऐसा लगा कि पूरी दुनिया मिल गयी हो. अचानक से सारा संताप और चिंताएं मिट गयीं.

लेकिन अभी यह समस्या खत्म हुई थी कि एक नयी समस्या ने घेर रखा है. यहाँ कंप्यूटर और बैटरी चार्जर आदि के प्लग दूसरे ही किस्म के हैं. हमारे यहाँ गोल प्लग होते हैं जो गोल छेद में रखे जाते हैं जबकि यहाँ होटल में देखा कि वे कटे हुए पतले किस्म के छेद हैं, जिनके लिए अलग किस्म के प्लग की आवश्यकता है. मुसीबत यह हो गयी है इस प्रकार के प्लग की कैसे व्यवस्था की जाए. अब यहाँ अच्छी-खासी रात हो गयी है, कल दिन में इसका इंतज़ाम करुँगी.

तीसरी समस्या यह है कि जो मोबाइल फोन मुझे हम लोगों के दिल्ली के मित्र पवन भारद्वाज जी ने दिया है वह ऐसा है कि उसे स्विच ऑफ ही नहीं किया जा रहा. मैंने पूरी कोशिश कर ली है पर मोबाइल स्विच ऑफ नहीं कर पा रही हूँ. दिन में बताया गया कि यहाँ मीटिंग वगैरह में मोबाइल स्विच ऑफ करके रखना जरूरी है. अब इसका क्या उपाय किया जाए.

इस समय तो सोने जा रही हूँ पर सामान मिलने के बाद भी चिंताएं बनी हुई हैं. फेसबुक और लिंक्डइन जैसे सोशल साईट के जरिये अपने वाशिंगटन डीसी के आस पास के साथियों से संपर्क करके इन समस्याओं को दूर करने का निवेदन किया है. कल खुद भी प्रयास करुँगी. देखें, इन शुरूआती समस्याओं से कैसे निदान पाती हूँ.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम

अमेरिका में संपर्क का नंबर है +1 3025692955


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