नाम से 'ठाकुर' शब्द हटाना जागरण वालों को नहीं पचा

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: नाम-पहचान छुपाकर शिखंडी बन जाना और स्त्रैण तरीके से वार करना शोभा नहीं देता : जागरण में छपी खबर के खिलाफ उचित स्थानों पर प्रार्थना पेश कर दी है : मैंने प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित पत्रकार तरुण तेजपाल और उभरते हुए उद्योगपति एवं सांसद केडी सिंह का सन्दर्भ लेते हुए एक लेख लिखा था जिसमें मैंने यह कहा- “कई बार सत्य बड़ा ही सापेक्ष होता है.” संभवतः यह एक सार्वभौम नियम है क्योंकि मैंने यह बात सौ फीसदी स्वयं पर घटित होते देखा है.

जैसा मैंने बताया था मैंने हाल ही में एक शपथपत्र प्रस्तुत किया कि जाति-प्रथा के सम्पूर्ण अहितकारी और बाधक असर को देखते हुए मैंने यह निर्णय लिया है कि भविष्य में मेरी कोई भी जाति नहीं होगी. साथ ही मैंने अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम को भी हटा कर आगे से सभी आधिकारिक, शासकीय और सामाजिक अभिलेखों, दस्तावेजों, मान्यताओं और सन्दर्भों में भी अपना नाम “अमिताभ ठाकुर” नहीं मात्र “अमिताभ” कर दिया.

मेरे इस कदम पर मुझे कई स्तरों से सराहना मिली और देश और विदेश से मुझे मेल और टेलीफोन आये जिसमें मेरे इस कार्य की प्रशंसा करते हुए इसका पूरे समाज में व्यापक रूप से अनुकरण करने की बात कही गयी. लेकिन मेरे एक पत्रकार साथी इससे कुछ अलग विचार अवश्य रखते होंगे, तभी उन्होंने मेरे इस कार्य और मेरे द्वारा ऐसा किये जाने के पीछे प्रस्तुत आधार को एक सिरे से नकारते हुए अपनी ही एक नयी थिओरी बना ली.

मैं पत्रकार महोदय का नाम नहीं जानता क्योंकि उनका नाम समाचार के साथ नहीं छपा है पर इतना अवश्य जानता हूँ कि वे दिव्यद्रष्टा लोगों की परम्परा में होंगे और संभवतः उनके अंदर दूसरों के मन में छिपी बात पढ़ने की अदभुत क्षमता होगी. मैं ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि जो बात मैंने किसी को नहीं कही, शायद स्वयं भी नहीं सोची वह इन महानुभाव को ज्ञात हो गयी. तभी तो जहां मैं दावा कर रहा था कि मैंने यह कदम इस लिए उठाया है कि देश और समाज के समुचित विकास के लिए यह सर्वथा आवश्यक है कि हम लोग जाति के बंधन को तोड़ते हुए इस सम्बन्ध में तमाम महापुरुषों, यथा भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, संत कबीर से लेकर आधुनिक समय के विचारकों की बातों का अनुसरण करें और जाति के इस प्रकार के बंधन से निजात पायें, वहाँ ये अंतर्ज्ञानी पत्रकार महोदय मेरे पोरों में समा कर मेरी असलियत निकाल ही लेते हैं और यह घोषणा करते हैं-

''खबरों में बने रहने के शौक़ीन एक आईपीएस अफसर का एक नया शगूफा यह है कि उन्होंने अपने नाम के साथ जुड़े जातिसूचक उपनाम को हटाने का ऐलान किया है. उन्होंने सरकार को शपथपत्र दे कर कहा है कि भविष्य में अगर किसी भी अभिलेख में जाति का सन्दर्भ देना हो तो उनकी जाति “कोई नहीं” लिखी जाए. ऐसा करने के पीछे उन्होंने मकसद “जातिविहीन समाज की स्थापना करने की दिशा में एक प्रयास बताया है. खैर यह रही उनकी बात पर पुलिस महकमे में इस निर्णय के नीचे दूसरे कारण बताए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि “साहब” का जाति सूचक उपनाम ख़ासा कन्फ्यूजन पैदा करने वाला था. लोगबाग उन्हें बिहार के एक पूर्व मुख्यमंत्री की बिरादरी का मान लेते थे. तमाम मौकों पर उन्हें सफाई देनी पड़ती थी कि नहीं भैया, मैं उस बिरादरी का नहीं हूँ. उनके उपनाम को ले कर दूसरी मुसीबत यह थी कि उन्ही के नामराशि एक और आईपीएस अफसर हैं जो दूसरे राज्य से ताल्लुख रखते हैं. “मेम साहब” एक गैरसरकारी संस्थान से जुडी हैं. इस संस्था ने उस आईपीएस अधिकारी को पुरस्कार दिया तो अखबार में ख़बरें छप गयीं कि “मेम साहब” ने घर का इनाम घर में ही रख लिया. मेम साहब को सफाई छपवाने में मेहनत करनी पड़ी. भविष्य में इस तरह के झंझट से बचने के लिए भी ऐसा जरूरी हो गया था और तीसरा जो सबसे बड़ा कारण है, वह यह कि “साहब” का उपनाम चुनाव आयोग के अधिकारियों को जुबानी याद है. अगले साल मई में विधानसभा के आम चुनाव के मद्देनज़र इसी साल नवंबर से चुनाव आयोग को प्रशासनिक कार्यों में दखलंदाजी का अधिकार हो जाएगा. उसके दृष्टिगत भी उपनाम हटाया जाना ही श्रेयस्कर है.''

((दैनिक जागरण, लखनऊ के 10 अप्रैल 2011 के अंक में पेज नंबर 13 पर साप्ताहिक स्तंभ ''असल में'' में प्रकाशित))

यदि उक्त पत्रकार महोदय ने अपने नाम के साथ यह खबर लिखी होती अथवा इसे कतिपय साक्ष्यों पर आधारित किया होता तो मैं इसे न सिर्फ स्वीकार करता बल्कि उनकी स्वयं ही प्रशंसा करता. पर अनाम हो कर किसी व्यक्ति के बारे में संभवतः अपने मन के कुछ भड़ास निकाल लेना किसी भी तरह से उचित नहीं जान पड़ता है. संभव है जो बातें वे कह रहे हों वे सब सत्य हों, संभव है इससे भी बढ़ कर घिनौने तथ्य हों जिनके वशीभूत हो कर मैंने अपनी जाति से अलग हो जाने का एक “स्वांग” रचा हो और उस पर नैतिकता का महिमामंडित मुखौटा ओढाने को बहुत सी अच्छी लगने वाली बातें कह दी हों. जब पूरे देश में यही सब रोज दिख रहा है तो अमिताभ किस खेत की मूली और कौन सी नयी पैदावार हैं.

पर मेरा मूल प्रश्न यही है कि जब आप कोई बात कह रहे हैं तो आप सामने आ कर खुल कर यह बात कहें और आवश्यकता पड़ने पर उसे प्रमाणित करें. यह क्या कि शिखंडी की तरह एक प्रतिष्ठित और नामचीन समाचारपत्र रूपी कृष्ण का सहारा लिया, चुपके से स्त्रैण ढंग से वार किया और फिर कहीं जा कर छिप कर अपनी वीरता पर स्वयं ही मन ही मन मंद मुस्कान बिखेर रहे हों. मैंने इस खबर के सम्बन्ध में उचित स्थानों पर अपनी प्रार्थना प्रस्तुत कर दी है क्योंकि ऐसे सभी मामलों में मेरा यह दृढ मत रहता है कि यदि आपके पास कोई परिवाद है तो उसे समुचित ढंग से अवश्य प्रस्तुत करें. मौन और चुप्पी किसी जमाने में आवश्यक रहे होंगे, अब तो समय चीख-चीख कर अपनी बात कहने का है, पर घूँघट की ओट से नहीं.

अमिताभ

पुलिस अधीक्षक

आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा

मेरठ


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