ये जो डिप्रेशन है...

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: तीन टिप्पणियां : यशवंत भाई सबसे पहले तो फ़्लैट बुक करने के लिये बधाई. वह अत्यंत आवश्यक था. दिल्ली जैसे शहर में आपके जैसे तेवर वाले को पता नहीं कब मकान मालिक कह दे कि निकलो मेरे घर से. इसलिये यह अच्छा कदम है. दूसरी बात कि जब परिवार है तो कुछ जिम्मेवारी तो निभानी पड़ेगी, अन्यथा शादी-ब्याह ही नहीं करते. अब रह गई बात डिप्रेशन की तो मुझे लगता है इस शब्द को ही अभी तक लोग नहीं समझ पाये हैं.

डिप्रेशन से तात्पर्य है वह अवस्था जब कुछ भी करने की चाह खत्म हो जाये. जीवन में सिर्फ़ निराशा दिखे. आप पूरी तरह पेसीमिस्ट बन जायें यानी आधा पानी के ग्लास को आधा भरा हुआ कि बजाय आधा खाली है.. कहने लगें. कम से कम यह बात आपके साथ नहीं है. डिप्रेशन में आप दूसरे की तकलीफ़ से दुखी नहीं होते हैं बल्कि भयभीत होते हैं और उसकी तुलना अपनी स्थिति से करने लगते हैं. दुनिया में जो लकीर से हटकर चलते हैं या करते हैं, वे द्वंद में जीते हैं. कभी गहरी निराशा में और कभी आशाओं के आसमान पर. बदलाव के लिये कुछ करना चाहते हैं लेकिन राह न दिखने पर निराशा से भर जाते हैं, ये अवस्था कुछ समय के लिये ही रहती है.

इससे उबरकर लोग पुन: राह की तलाश करना शुरू कर देते हैं. एक बात और है, शराब का अत्यधिक सेवन भी आत्मविश्वास में कमी लाता है. कुछ हद तक आपका कहना सही है कि डिप्रेशन दो विपरित मन:स्थितियों के बीच का ट्रांजिशन फ़ेज है. खैर, आपको कुछ कहने की जरूरत नहीं है. आप खुद समझदार हैं तथा दूसरों को भी राह दिखाने या अच्छा-बुरा क्या है, बताने की क्षमता रखते हैं. वैसे लोग जो संवेदनशील होते हैं तथा निजता से उपर उठकर सोचते हैं या कार्य करते हैं, उन्हें इन परिस्थितियों का हमेशा सामना करना पड़ता है. हो सकता है, आप कुछ और बनने की राह में हों लेकिन समझ नहीं पा रहे हों.

खैर डिप्रेशन जैसी कोई बात आपके साथ नहीं है. कभी मिलूंगा तो बताउंगा डिप्रेशन क्या होता है. गलत केस में फंसाये जाने के बाद, जेल से आने के बाद तकरीबन तीन-चार महीने तक मैंने मौत के नजदीक वाला जीवन जिया था. बिस्तर से नीचे जमीन पर छटपटाता था, घंटों रोता था. लगता था क्या होगा मेरा. सब तो मेरे खिलाफ़ हैं. मेरे बाद परिवार का क्या होगा. लेकिन विश्वास करें, उसके बाद इतना ताकतवर हो चुका हूं मानसिक स्तर पर की ठेंगे पर रखता हूं उस गलत केस को. खैर, यह मेरा निजी अनुभव था. डिप्रेशन के मुद्दे पर और लोगों से भी कहा जाना चाहिए कि वे अपने अपने अनुभव लिखें, कब वे बहुत डिप्रेसन में थे, तब कैसी मनःस्थिति थी और कैसे उबरते हैं इससे. ये शायद ऐसा विषय है जिससे हर शहरी या हर पढ़ा लिखा अक्सर टकराता है और कुछ न कुछ महसूस करता है.

मदन कुमार तिवारी, वरिष्ठ वकील और जर्नलिस्ट, गया (बिहार)


यशवंत जी, आपने डिप्रेशन पर जो अपना मनोविश्लेषण प्रस्तुत किया वह कईं अर्थों मे न केवल अदभुत है बल्कि व्यापक भी है. मेरे जैसा मनोविज्ञान का थोड़ा बहुत जानकार भी अक्सर आप जैसी मन:स्थिति से गुजरता है लेकिन जीवन शायद इसी का नाम है कि धीरे-धीरे से सब कुछ अपनी गति से उपग्रह की भांति अपनी कक्षा में स्थापित हो जाता है.

बहरहाल, मैं तो यही कहूंगा कि आपका संवेदनशील मन वैराग्य के मार्ग की तरफ बढ रहा है लेकिन अभी आपकी उस रंगमंच पर ज्यादा जरूरत है जो वंचितों और आम आदमी के वजूद की जिरह के लिए आपने बनाया है. आप और भड़ास अब एक वेबपोर्टल ही नहीं हैं बल्कि एक आन्दोलन हैं जिससें मेरे जैसे बहुत से देहाती लोग प्ररेणा पाते हैं तथा तथाकथित अभिजात्य और कुलीन वर्ग की आंखों से आंखें मिलाने का हौसला पैदा करते हैं. ये वक्त भी गुज़र जायेगा...

डा. अजीत तोमर, असिस्टें प्रोफेसर, मनोविज्ञान, हरिद्वार


यशजी, लेख पढ़ लिया है. लेकिन इसका मतलब नार्मल से दो पैग ज्यादा नहीं होना चाहिए. वो दो बहनें जिस बीमारी की शिकार हुई हैं, वो बीमारी हमारे आसपास फैली हुई है. संवेदनहीनता. अहम. निरंकुशता. मानवता है मन में इसीलिए डिप्रेशन है. पशु डिप्रेस नहीं होते.

कुशल प्रताप सिंह, शिक्षक, बरेली

ये टिप्पणियां जिस आलेख पर आई हैं, उसे पढ़ने के लिए क्लिक करें- एक डिप्रेशनधारी तन-मन की एक्सरे रिपोर्ट


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