गांधीवादी पत्रकार अजीत बाबू!

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हरिवंशजिन श्रेष्ठ पत्रकारों ने रास्ता दिखाया, स्नेह दिया और हर अंधेरे में ताकत दी, उनमें से एक-एक कर गुजर रहे हैं. शिरोमणि पत्रकार अजीत भट्टाचार्य का निधन एक ऐसे ही प्रकाश स्तंभ का बुझना है. प्रभाष जी के अप्रत्याशित और अचानक निधन के बाद अजीत बाबू का जाना, एक दौर का अवसान है.

वह दौर जिसने पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम माना. अपने समय, देश और काल की परिस्थितियों में हस्तक्षेप का माध्यम बनाया. अपने पारदर्शी और प्रामाणिक कामकाज से हालात में बदलाव की कोशिश की. तब हम विद्यार्थी थे. सन 1976-77 की बात है. जेपी (इवरीमैन और प्रजानीति) साप्ताहिक प्रकाशन शुरू कर रहे थे.बदलाव की ताकतों और आंदोलन की बात कहने के लिए.तब पढ़ा कि मुंबई टाइम्स ऑफ इंडिया से वरिष्ठ पत्रकार अजीत बाबू नौकरी छोड़ कर इसके संपादन में लगेंगे.

उनके प्रति, उनसे मिले बगैर पहली श्रद्धा की यह शुरुआत थी. विद्रोह और बगावत का रास्ता चुनना, कितना कठिन होता है, यह बाद में जाना. पर तब इतना ही समझ सका कि श्रेष्ठ अंगरेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, जो वेतन और सुविधाओं की दृष्टि से भी सबसे बेहतर, प्रामाणिक और श्रेष्ठ संस्थान था, छोड़ कर एक आदमी कैसे अनिश्चित डगर पर पांव रखता है.

पत्रकारिता वैसे भी जोखिम भरा पेशा है.तब और था. नौकरी के स्थायित्व और वेतन, सुख-सुविधाओं की दृष्टि से सबसे उपेक्षित.फिर भी टाइम्स ऑफ इंडिया की नौकरी तब सर्व श्रेष्ठ मानी जाती थी. सुरक्षित भी.उसे छोड़ कर अपनी आत्मा की आवाज सुनना और उस पर चलना कठिन था.वह राह अजीत बाबू ने चुनी.इससे भी बड़ा जोखिम का काम था, तत्कालीन सर्वसत्तावादी और एकछत्र सत्ता आतंक के खिलाफ खड़ा होना. इंदिरा गांधी और संजय गांधी के उदय का दौर था.अजीत बाबू का जो पहला लेख पढ़ा था,आज बरबस वह याद आया. 12 जून 1975 को (शायद) इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाइकोर्ट का फ़ैसला आया.

उस दिन तीन महत्वपूर्ण घटनाएं एक साथ हुई थीं, जिन्होंने देश की राजनीति पर असर डाला. अजीत बाबू ने उस लेख में लिखा था कि उस दिन वह जेपी के साथ गर्म और तपती धूप-लू में आरा (शायद) की यात्रा पर थे. एक पत्रकार कैसे अपने कन्विक्शन (आस्था) को तरजीह देता है, सब कुछ छोड़ कर, इस राह के वह अगुवा लोगों में थे.संयोग से कुछेक वर्ष बाद ही टाइम्स ऑफ इंडिया मुंबई में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में (हिंदी) चुना गया. वहां बड़े-बड़े पत्रकार-संपादक पढ़ाने आते थे.

एक दिन अपने कोर्स डायरेक्टर पतंजलि सेठी से अनुरोध किया कि क्या वह अजीत बाबू को हम छात्रों से बातचीत के लिए आमंत्रित करेंगे?यह थी हम युवा पत्रकारों पर अजीत बाबू की छाप. फिर उनसे लंबा संपर्क बना, उनके साथ कई यात्राएं की. शिविर में रहे. वह, प्रभाष जी और न्यायमूर्ति पीवी सावंत (अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट के जज और प्रेस कौंसिल के पूर्व चेयरमैन) कई बार प्रभात खबर के निमंत्रण पर रांची आये. जेपी के गांव में हमने उन्हें जेपी मेमोरियल लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया.

वे गांव आये, असुविधाओं के बीच रहे, गांधीवादी पत्रकार, नितांत सादा रहन-सहन, खान-पान, पर अत्यंत सजग और सावधान दृष्टि. जेपी की प्रामाणिक जीवनी लिखनेवालों में से वे एक थे. शेख अब्दुल्ला और कश्मीर पर अत्यंत प्रामाणिक काम उन्होंने किया था. उनकी शिक्षा-दीक्षा, विद्यार्थी जीवन की शुरुआत तत्कालीन पश्चिम भारत (अब पाकिस्तान) में हुई.वह जब प्रेस इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया के डायरेक्टर बनें, तो ग्रासरूट की पत्रकारिता प्रशिक्षित और मजबूत बनाने का अभियान चलाया.

हिंदी विदुरा (पत्रकारिता विधा की एक मात्र प्रामाणिक पत्रिका) के हिंदी संस्करण के संपादन का दायित्व मुङो दिया. यह जानते हुए भी कि मैं दिल्ली से दूर हूं. मेरी सीमा है. पर उनका तर्क था कि पत्रकारिता को मांजने, संवारने और बेहतर करने का काम ग्रामीण इलाकों से ही किया जाना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्र ही असली भारत है. देश दिल्ली में नहीं बसता.उनका पैशन था कि ग्रामीण पत्रकार को कैसे श्रेष्ठ ट्रेनिंग दी जाये.इस सिलसिले में वे कई बार  प्रभात खबर आये और पत्रकारों के प्रशिक्षण में भाग लिया.एक बार वह आये, तब बुंडू में एक व्यक्ति नरेगा स्कीम के तहत समय से मजदूरी न मिलने के कारण आत्महत्या कर चुका था.उन्हें खबर की जानकारी मिली. उन्होंने कहा, अगली सुबह मैं अकेले उस गांव में जाना चाहूंगा.

साथ में केवल एक क्षेत्रीय संवाददाता रहेगा. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं जानते थे. फिर भी वह गांव गये, तब उनकी उम्र 75 से ऊपर रही होगी. प्रभात खबर के लोगों को आकर बताया कि ऐसे विषयों की रिपोर्ट कैसे की जानी चाहिए. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं बोल पाते थे, पर उनमें क्षेत्रीय पत्रकारिता के स्तर को सुधारने को लेकर अद्भुत संकल्प था. उधर अंगरेजी अखबारों में उन्होंने नयी बहस शुरू की. पेज तीन की पत्रकारिता पर. इसके बाद एक  अंगरेजी अखबार (दिल्ली से प्रकाशित) ने 1998 से 2002 के बीच पेज तीन की पत्रकारिता पर बीसियों लेख लिखे. उनकी पहल पर.प्रेस कौंसिल के मंच या अन्य समानधर्मा संस्थाओं के साथ मिल कर, वह और प्रभाष जी देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर, पेज तीन की पत्रकारिता और मौजूदा  हालात के बारे में बोलते थे.

पत्रकारों की गोष्ठियों में, सेमिनारों में जाते थे.ग्रामीण पत्रकारों की गोष्ठियां आयोजित करवाते और सार्वजनिक व्याख्यान में भाग लेते थे.आज मामूली अखबार में लाखों रुपयों के तनख्वाह पर काम करनेवाले अनेक पत्रकार हैं.जब अजीत बाबू जैसे लोग पत्रकारिता में सक्रिय थे, तब 10-15 हजार पानेवाले देश में चंद लोग ही थे.आज तो करोड़ों में पानेवाले देश की पत्रकारिता में अनगिनत हैं. वैध तरीके से, तनख्वाह के रूप मे. अवैध या राडिया संस्कृति की राह न अपनानेवाले की भी बड़ी जमात है, जो करोड़ों में कमा रही है.तनख्वाह के रूप में.

पर पत्रकारिता का जो सत्व, पहचान और असर अजीत बाबू के युग में थी, आज उसके पासंग में भी नहीं है.देश के सबसे बड़े अंगरेजी अखबार के संपादक रह कर भी, वह विशिष्ट नहीं बने, सामान्य ही रहे.मामूली खबरें या किसी मॉडल द्वारा क्रिकेट में भारत के विश्वविजयी बनने पर नंगा होकर दौड़ने की बातों को आज अखबारों में बड़ी जगह मिल रही है. तब अजीत बाबू के गुजरने की चर्चा अखबारों में महज कुछ  पंक्तियों में हो, तो इससे कोई आश्चर्य नहीं होता. पर आज ही के अखबार में यह भी खबर है कि अन्ना हजारे जैसे लोग अब अपना जीवन दावं पर लगा रहे हैं.

किन सवालों के लिए? जो देश के बुनियादी मुद्दे हैं.मसलन भ्रष्टाचार.तब एक ऐसे आदमी का गुजर जाना, जो राजस्थान के गांव (तिलौनिया) जाकर सूचना अधिकार आंदोलन के लिए अपने जीवन को भी दावं पर लगा देता था, एक बड़ी क्षति है. उनकी स्मृति को प्रणाम.प्रभात खबर को हमेशा जिन लोगों ने हर संकट में मनोबल बढ़ा कर भिन्न पत्रकारिता करने की सूझ और ऊर्जा दी, उनमें से एक सबसे बड़े स्तंभ अजीत बाबू के न रहने पर प्रभात खबर की उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.

लेखक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है और वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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