नीरज की हिम्मत और अखबारों की कायरता

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नूतन ठाकुरनिजी विद्यालयों द्वारा कभी स्कूल फ़ीस के नाम पर तो कभी सालाना फ़ीस और किताब-कापियों को उनके ही विद्यालय से खरीदने सम्बन्धी आदेश दिए जाने से हर कोई पीड़ित है. स्कूल बच्चों के मां-पिता के लिए मार्च महीना ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला होता है. निजी विद्यालयों की उगाही को हम सभी बर्दाश्त कर रहे हैं. नीरज जैसे चंद लोग जो मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत जुटाते हैं तो हम सब उनका साथ देने की बजाय चुप्पी साध लेते हैं.

स्कूल में जगह सुरक्षित रखने के नाम की जा रही मनमानी के खिलाफ जब नीरज कुमार सिंह ने आवाज उठाई तो इस मुद्दे पर उनका साथ देने के बजाय लखनऊ के ज्यादातर अखबारों ने जाने किस मज़बूरी के तहत इस पूरे मामले में चुप्पी साध ली. पूरा मामला कुछ इस तरह है. नीरज की बेटी फरीदी नगर, लखनऊ के सिटी इंटरनेशनल स्कूल में कक्षा एक में पढ़ती है. लगभग दो महीने पहले उनकी बेटी ने उन्हें स्कूल की ओर से मिला एक नोटिस दिया. नोटिस देखते ही उन्हें यह अंदाजा हो गया कि  नोटिस का एक मात्र सम्बन्ध स्कूल फ़ीस में बढोतरी या फिर किताब-कापियों की खरीद से है. पर फ़ीस में कितनी बढोतरी हुई है या फिर किस दुकान से किताब-कापियां खरीदनी है इसे जानने के लिए नोटिस देखना भी जरुरी था.

स्कूल की तरफ से जो नोटिस दी गई थी उसमे कहा गया था कि सत्र 2011-2012 के लिए आपके बच्चे की जगह सुरक्षित रह सके इसलिए आप पहली अप्रैल तक वार्षिक शुल्क के रूप में २००० रूपये स्कूल में जमा कर दे. साथ ही दस अप्रैल तक अगले महीने की फ़ीस और यदि कोई धनराशि शेष हो तो उसे भी जमा कर दें. इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि सालाना फ़ीस की प्राप्ति के बाद ही स्कूल अध्ययन सामग्री मुहैया कराएगा. और अध्ययन  सामग्री का मूल्य स्कूल फ़ीस के साथ ही देना होगा. मतलब यह कि किताब-कापियां स्कूल से ही खरीदनी आवश्यक है.

इस सम्बन्ध में जब नीरज ने स्कूल प्रबंधन से संपर्क किया और अपनी आपत्ति प्रकट की कि इस तरह से जगह सुरक्षित रखने के नाम पर पैसे माँगना कहाँ तक उचित है तो स्कूल प्रबंधन द्वारा यह साफ़-साफ़ कह दिया गया कि यदि आप अपने बच्चे को इस स्कूल में आगे पढाना चाहते हैं तो आपको स्कूल की शर्ते माननी ही होंगी अन्यथा आप अपने बच्चे का नाम किसी दूसरे स्कूल में लिखवा लें. जब नीरज ने स्कूल प्रबंधन की इस मनमानी का विरोध करते हुए दो हजार रूपए नहीं जमा किये तो जिस ढंग से उनकी बच्ची के साथ स्कूल में व्यवहार किया गया उसकी कल्पना  भी नहीं की जा सकती. बच्ची को पहले तो क्लास से बाहर निकाल दिया गया.

फिर कुछ दिनों बाद स्कूल परिसर के अंदर घुसने से भी रोक दिया गया. मानो उस बच्ची ने कितना बड़ा कुकृत्य कर दिया हो. जब नीरज ने इस मुद्दे को उठाने के लिए मीडिया का सहारा लेना चाहा तो वह भी उसे निराशा ही हाथ लगी. स्कूल प्रबंधन द्वारा बच्ची के साथ लगातार किये जा रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ जब नीरज ने पुलिस का सहारा लेना चाहा तो वहाँ से भी उसे मदद की जगह यह नसीहत ही मिली कि महज दो हजार रूपये के लिए इतना पंगा क्यों करते हो. और अगर उस स्कूल में पढाने की हैसियत नहीं है तो किसी और स्कूल में नाम लिखा कर छुट्टी पाओ.  आगे चल कर जब नीरज ने मेरे और मेरे पति से संपर्क किया और हमारे द्वारा स्थानीय पुलिस अधिकारियों से वार्ता की गयी तो पुलिस के हस्तक्षेप के बाद स्कूल में बैठने की अनुमति तो उस बच्ची को मिल गई पर इन सारी बातो का उस मासूम बच्ची के दिल पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि स्कूल का नाम सुनते ही वह दहशत में आ जाती है.

इस पूरे घटनाक्रम में इतना सब कुछ होने के बाद भी स्कूल प्रबंधन ने दूसरे तरीके से पैसे ले ही लिए. इस सम्बन्ध में बच्ची के पिता ने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट (एनसीपीसीआर) को भी अपनी शिकायत भेजी थी पर इसका नतीजा सिफर ही रहा. शायद यही वजह है कि तमाम लोग न चाहते हुए भी इन निजी स्कूलों की मनमानी की वजह से शोषित हो रहे हैं.

मैं समझती हूँ कि एक पत्रकार के तौर पर हमें ऐसे सभी मसलों को विशेष महत्व देना होगा क्योंकि ये भले देखने में छोटे मामले लगते हों पर इनका सामाजिक महत्व बहुत अधिक है. मैं इस रूप में सभी पत्रकार साथियों से पुनः अनुरोध करुँगी कि नीरज सिंह की इस संघर्ष गाथा और ऐसे सभी संघर्षों एवं साहसिक कारनामों को एक नव-समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक मानते हुए इन्हें भरपूर तवज्जो तथा स्थान दें.

डॉ नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस, लखनऊ


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