मुझे खोखली और दिखावे की पत्रकारिता नहीं करनी

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मनीष नमस्कार भड़ास। पहले की तरह कुछ शब्द भड़ास के नाम। सब को पता है लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्‍तम्‍भ माना गया है। जो विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका पर निगरानी के बाद उनके कार्यकलापों को जन- जन तक पहुंचाने का काम करता है। अब यहाँ जरुरत पड़ती दिखी मीडिया की इन्टरनल खबरों की। सब की खबर लेने वालों की भी खबर लेने वाला भी तो कोई होना चाहिए।

वो भी आज की मीडिया। बरखा दत्त, वीर संघवी और प्रभु चावला जैसी मीडिया। ऐसे में यशवंत साहब का एक उम्दा व सराहनीय उपक्रम है भड़ास। आज जो भी उल्टा- सीधा खुलकर लिखता हूँ वो भी अपने बारे, में भड़ास में प्रकाशित होता है। लोग खुलकर अपने विचार देते हैं। मेरा पिछला आर्टिकल "जूतों का लाइव और मेरे जूते की गुमशुदगी" जो मेरे जूतों के चोरी जाने पर केन्द्रित था। मेरे एक मित्र हैं, मित्र क्या बड़े भाई,  मेरे गुरु हैं ब्रजेश शर्मा जी। न्यूज़ 24 (बैग फिल्म) में कुछ साल उनके साथ काम करने का मौका मिला, काफी कुछ सीखा था उनसे मैंने।

ब्रजेश भाई ने कहा की पत्रकारिता में खुद को इतना नीचे गिरा कर चलोगे तो कैसे कर पाओगे। दिल्ली में बैठने का मौका मिला है बाकी तुम्हारी मर्जी। तो ब्रजेश भाई मैं कहना चाहूँगा पत्रकारिता अगर आईना है तो इसे हम खुद क्यों नहीं देख सकते। मैंने जो कुछ लिखा वो हो सकता है आपके दृष्टिकोण से गलत हो,  पर शायद मुझे ये ठीक लगा। एक शांत व स्थिर वातावरण में अन्दर से आवाज़ निकली कि मुझे अपने बारे में लिखना चाहिए। मैंने लिखा। दिल की टीस भड़ास के रूप में भड़ास में प्रकाशित हुई और मुझे लगता है ये मेरे लिए भड़ास द्वारा मेरी सराहना है।

और ब्रजेश भाई ये भी हो सकता है कि जो पत्रकारिता मैं करता हूँ उस में सच्चाई हो। आधुनिक मीडिया के दौर में जब सब कुछ पेड है तो कम से कम मैं समझता हूँ कुछ तो अनपेड होना चाहिए। खोखली और दिखावे की पत्रकारिता भाई मुझे नहीं करनी। पॉवर और ग्लैमर के तड़के वाली इस फील्ड में आज भी कई ऐसे प्रेस वाले हैं,  जिन्हें सुबह प्रेस के लिए भी सोचना पड़ता है,  पर वो भी पत्रकारिता करते है और मजाल है किसी से एक रुपया भी एंठते हों। बहुत कम लोग होते हैं जो पानी के बहाव को चीरकर अपने लिए मुकाम बना पाते हैं। नहीं तो हालात से समझौता या बहाव के साथ बह जाने वाली स्थिति बहुतायत देखी है मैंने।

मनीष दुबे

8130073382

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