दहेज उत्‍पीड़न कानून का दुरुपयोग करने वालों को मिले सजा

E-mail Print PDF

डा. नूतनबिना लड़की की मर्जी के किये गये विवाह का क्या दुष्परिणाम हो सकता है इस बात का अंदाजा मेरठ में हुए एक विवाह और उसके बाद उत्पन्न हुई स्थिति को देख कर लगाया जा सकता है. घटना कुछ इस प्रकार है कि नेहा नाम की एक लड़की जिसकी शादी उसके पिता ने उसकी मर्जी के विरुद्ध नितीश नाम के युवक के साथ तय की थी.

शादी के दिन घर छोड़ कर उस लड़के के साथ चली गई, जिसे वह पसंद करती थी. फिर अपनी इज्जत बचाने की खातिर नेहा के पिता ने अपनी छोटी बेटी आरती की शादी नीतिश के साथ कर दी. ससुराल आकर आरती ने यह बताया कि वह विनीत नाम के लड़के से प्यार करती है और उससे मंदिर में शादी कर चुकी है. इस बात को जानने के बाद नितीश ने आरती को विनीत को सौप देने का फैसला किया और पुलिस अधिकारियों से मिलने के बाद उसे अपनी बहन बना लिया और आरती ने भी उसे राखी बाँध कर अपना भाई मान लिया. पर बाद में इसी मामले में आरती और उसके परिजनो ने नितीश और उसके परिवार वालो पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए मुकद्दमा दर्ज करने की मांग की.

उनका आरोप था कि शादी में उन्होंने 12 लाख रूपये खर्च किये थे लेकिन शादी के बाद नितीश और उसके परिवारवालों ने एक सेंट्रो कार की मांग की और मांग पूरी नहीं करने पर आरती को प्रताड़ित किया गया. पूरे प्रकरण में आरती का कहना है कि नीतिश ही उसका पति है और पहले जो कुछ भी उसने कहा था वह दबाव में आकर कहा था. वही नितीश का कहना है कि उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि आरती जो कुछ भी कह रही है वह झूठ है. और आरती के पिता द्वारा ऐसा सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि वह उनके परजिनों को दहेज उत्पीड़न कानून में फंसा कर उनसे पैसे वसूल कर सके.

अब इस मामले की जांच चल रही है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ. पर इतना अवश्य है कि अगर आरती और उसके परिजन झूठ बोल रहे हैं तो उन्हें इसकी सख्त सजा मिलनी चाहिए.  इस तरह के मामलो की वजह से ही महिलाओं पर हो रहे आत्याचार को देखते हुए उनके के हितों की रक्षा के लिए बनाये गये दहेज उत्पीडन और घरेलू हिंसा अधिनियम जैसे कानूनों पर न सिर्फ सवाल उठने लगे है,  बल्कि इसके दुरूपयोग की शिकायतें भी आम हो गई हैं. शायद यही वजह है कि आज कई सारे पुरुष संगठन भी इस बात के लिए एक जुट हो रहे है कि इन कानूनों की आड़ लेकर पत्नियों द्वारा किये जाने वाले उत्पीड़न से उनकी रक्षा की जाए. उनका यही कहना है कि इन कानूनों का सहारा तभी लिया जाता है जब विवाह के निभने की सम्भावना बहुत ही कम बची रहती है. विवाह टूटने का कारण चाहे जो भी हो पर अक्सर उसमे आरोप दहेज प्रताड़ना के ही लगते हैं. जो सरासर गलत और पुरुषों के साथ अन्याय है.

वैसे अगर देखा जाए तो आज भी आमतौर से हमारे समाज में लड़के और लड़की का विवाह उसके माता पिता के द्वारा ही किया जाता है. और विवाह तय करते समय लड़के-लड़की की पसंद नापसंद या उनकी इच्छा पर कम ही ध्यान दिया जाता है खासकर लड़की की इच्छा पर तो बहुत ही कम. विवाह सम्बन्ध जोड़ते समय जहां लड़की के पिता द्वारा लड़के के परिवार और उसकी आर्थिक स्थिति को ही केंद्रबिंदु में रखा जाता है, वहीं लड़के के पिता का सारा जोर इसी बात पर रहता है कि लड़की के पिता द्वारा विवाह में कितना खर्च किया जाएगा. पर समस्या तब उत्पन्न होती है जब लड़के या लड़की के सहमत न होने के बावजूद भी जबरन उनका विवाह उनकी मर्जी के विरुद्ध कर दिया जाता है.

ऐसे ममलों में माता-पिता का यही मानना होता है कि आज चाहे भले ही उनके बच्चे उनके द्वारा तय किये गये विवाह सम्बन्ध से सहमत न हों पर एक बार विवाह बंधन में बंधने के बाद न सिर्फ इस विवाह को स्वीकार कर लेंगे बल्कि एक खुशहाल वैवाहिक जीवन भी व्यतीत करेंगे. वे इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़के लड़की की इच्छा के विरुद्ध जाकर किये गये विवाह का अंजाम क्या होगा. और फिर जब विवाह के टूटने की नौबत आती है तो अक्सर लड़की के पिता द्वारा दहेज की मांग को ले प्रताड़ित करने की शिकायत की जाती है, जिसके फलस्वरूप न सिर्फ लड़का बल्कि उसका पूरा पारिवार कानून के चपेटे में आ जाता है.

इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि दहेज उत्पीडन कानून के दुरूपयोग के जो आरोप लगाये जाते है वह पूरी तरह से गलत हों. पर इसका यह भी अर्थ नहीं है कि दहेज प्रताडना सम्बन्धी सभी शिकायतें फर्जी और गलत हों. इसलिए मै तो यही कहूँगी कि महिलाओं को सरकार द्वारा दिया गया यह एक ऐसा हथियार है जो उनके हितों की रक्षा के लिए उन्हें दिया गया है और अगर किसी भी तरह से वे इनका दुरूपयोग करती हैं तो उन्हें भी इसकी सजा मिलनी चाहिए.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं.


AddThis