क्या पत्रकारों को कानून तोड़ने का हक है?

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डा. नूतन किसी भी व्यक्ति की निजी जिंदगी और उसके क्रिया-कलापों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए उस व्यक्ति का फोन टेप करने की बात कोई नई नहीं है. पर यह बात भी उतनी ही सच है कि हरेक व्यक्ति की अपनी एक निजी जिंदगी होती है,  जिसे वह सबके सामने नहीं लाना चाहता. ऐसे में चोरी-छुपे फोन हैक कर किसी की बातें सुनना और फिर उसे सार्वजानिक कर देना न सिर्फ उस व्यक्ति के निजता के अधिकारों का हनन है बल्कि अपराध भी है.

इसी बात को ध्यान में रख कर लगभग सभी देशों में फोन टेपिंग को ले कर नियम बनाये गये है. आमतौर से किसी व्यक्ति के फोन को टेप करने का अधिकार सरकारी जांच एजेंसियों के पास होता है. वह भी सिर्फ उन्हीं मामलों में जिस में किसी व्यक्ति के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की आशंका हो या फिर किसी मामले में साक्ष्य जुटाने के लिए ऐसा करना आवश्यक हो.

पर महज सनसनी फ़ैलाने और नामी-गिरामी हस्तियों की निजी बातों को सार्वजानिक कर अपने अखबार या चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाये तो क्या इसे सही माना जाएगा. अक्सर विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार पर यह आरोप लगाया जाता है उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनका फोन टैप किया जा रहा है. पर इंग्‍लैंड में फोन टैपिंग के जिस मामले को ले कर हंगामा मचा हुआ है, उस में फोन टेप करने का आरोप किसी नेता या सरकार पर नहीं बल्कि पत्रकारों पर लगाया गया है. पूरा मामला न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के पत्रकारों द्वारा वहाँ के सेलेब्रिटियों के फोन हैक कर उनकी बातचीत को सार्वजानिक करने से सम्बंधित है. जिसकी वजह से लगभग 168 साल पुराने इस साप्ताहिक अखबार को बंद करने की नौबत आ गई है.

इस हंगामे की पृष्ठभूमि की शुरुआत उस समय हुई जब 2007 में न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के उस समय के रायल एडिटर क्लाइव गुडमैन और उसके निजी जांचकर्ता को शाही सलाहकारों के मोबाइल फोन को हैक करने के मामले में जेल की सजा हुई. उसके बाद हुई कई सारी पुलिस इनक्वायरी और कोर्ट केस में यह बात निकल कर आई कि इन शाही सलाहकारों के आलावा काफी बड़े पैमाने पर कई सारे पुलिसवालों, राजनीतिज्ञों, सेलेब्रिटियों और अपराध के शिकार लोगों के मोबाइल फोनों को भी गैरकानूनी तरीके से हैक किया गया था. वह भी महज अपनी खबरों को चटपटी बनाने और सनसनी फ़ैलाने के उद्देश्य से. इसके बाद लगभग ढाई सालों तक पूरा मामला दबा रहा और जुलाई 2009 में दुबारा इसकी बात तब उठी जब गार्डियन अखबार ने यह खबर प्रकाशित की कि न्यूज़ आफ वर्ल्ड के पत्रकार लगभग 3000 सेलेब्रिटिज, राजनीतिज्ञ और खिलाडियों के फोन को हैक करने के मामले में संलिप्त थे. पर इस मामले में पुलिस और प्रेस कम्पलेंट कमीशन को फोन हैक करने के कोई नये सबूत नहीं मिले. लेकिन यह मामला तब जोर पकड़ने लगा जब आम जनता के बीच यह बात उभर कर आई कि अपराध के शिकार व्यक्ति और उनका परिवार जिनमे 7/7 के बम ब्लास्ट के शिकार लोगों के परिवारों के साथ-साथ हत्या की शिकार मिल्ली डॉउलर, होली वेल्स और जेसिका चिप मैन के माता-पिता का भी फोन टेप किया जा रहा था.

इस मामले की बढ़ती हुई गंभीरता को देखते हुए वहाँ के प्रधानमंत्री ने कहा है कि हैकिंग के मामले की पूरी जांच की जायेगी और मेट्रोपोलिटन पुलिस के चीफ ने शपथ ली है कि जो भी पुलिस वाले न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के प्रकाशक न्यूज़ इंटरनेशनल से पैसे ले रहे हैं उन्हें अनुशासित किया जाएगा. इसके आलावा न्यूज़ इंटरनेशनल के रूपर्ट मार्डोक ने फोन हैकिंग के कई सारे मामलों में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए माफ़ी तो मांगी ही है,  साथ ही जिनका फोन हैंक किया गया था उन्हें क्षतिपूर्ति देने के लिए एक फंड भी बनाया है. इस सम्बन्ध में न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के पूर्व एडिटर का यही कहना था कि उन्हें इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं मालूम है पर उन्होंने अपने रिपोर्टरों को काम करने की पूरी आजादी दी हुई थी और साथ में यह भी आदेश दिया था कि जब तक कि कोई मामला पूरी तरह से जनहित का न हो वे खबरों को पाने के लिए किसी भी प्रकार के गलत तरीके का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

पर यह पूरा घटनाक्रम हमारे लिए जो सवाल खड़े करता है वह यह कि ख़बरों को आम जन तक पहुँचाने की होड़ में हमारे द्वारा नियमों के विपरीत जा कर काम करने को किस हद तक उचित ठहराया जा सकता है. पत्रकारिता के नाम पर हमें किसी दूसरे व्यक्ति के निजी जीवन में ताक-झांक और टिका-टिप्पणी करने की आजादी किस हद तक होनी चाहिए. स्वतंत्रता के नाम पर मीडिया को किस हद तक छूट मिलनी चाहिए. क्या तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर और सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत करने को किसी भी तरह से जायज ठहराया जा सकता है.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं.


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