लेखिका तवलीन सिंह गांव-देहात विरोधी हैं?

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अमर उजाला ने 26-07-11 'सरोकार' नाम के कॉलम में "शहरों के खिलाफ साजिश क्यों" के नाम से तवलीन सिंह का एक लेख प्रकाशित किया है। इसमें इस देश की राजनीति और जनता के बड़े हिस्से को भोंडे तरीके से देखा गया है। तवलीन सिंह शहरों की पहचान और विरासत को खत्म करने का जिक्र करती हैं। कारण के तौर पर लिखती हैं कि सब खत्म कर दिया हमारे समाजवादी शासकों ने, जिन्हें परवाह थी, सिर्फ देहातों की,क्योंकि देहाती मतदाताओं के बल पर जीते जाते थे चुनाव।

तवलीन सिंह यह लाइन बताती है कि वह न तो समाजवाद को समझती हैं और न ही शहरों की पहचान नष्ट होने के कारणों को। असल में उनके लेख की चिंता का विषय यह है भी नहीं। वे वास्तव में विकास से उस सौदर्य शास्त्र को लागू होते देखना चाहती हैं,जहां सब कुछ बड़ा ही सुंदर हो। कम से कम मुख्य राजमार्ग या उन सड़कों पर जहां से इन जैसे लोगों का गुजरना हो। इसलिए वे अपनी बात उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के शासनकाल के बदलाव को आंकने से शुरू करती हैं और अपनी बात को वाया शहरीकरण दिखने-दिखाने तक खींच ले जाती हैं। हां,इस बीच अपनी बात को छिपाने के लिए वह जनपक्षधर बातों को शामिल करती है। शहरों की सड़कों पर गरीब,मैले बच्चों की उपेक्षा का आरोप समाजवादी शासकों पर लगाती हैं।

तवलीन सिंह बड़ी गलतफहमी की शिकार हैं। उन्हें लगता है कि देश का शहरीकरण पश्चिमी सौंदर्यबोध पर विकसित नहीं हो रहा है। लेकिन वे इस बात को देख नहीं पा रही है कि आज दिल्ली या बड़े शहरों में सौंदर्यीकरण पर बड़ा पैसा आबंटित किया जाता है। वे जिन पहचानों को नष्ट करने की बात कर रही हैं असल में वे आर्थिक नीतियों में आये बदलाव से नष्ट हुई हैं। जहां लोगों के हिस्से छीना गया काम बड़ी कंपनियों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन गया है। इसके लिए समाजवादी नहीं बल्कि गैर समाजवादी शासक जिम्मेदार हैं। जिनके सोचने की पूरी विचारधारा विश्व बैंक के दबाव में बनती बिगड़ती है।

तवलीन सिंह इस बात पर काफी विश्वस्त होती हैं कि देश में शहरीकरण बढ़ रहा है। तथ्यतः सही है। लेकिन इस देश की बुनावट के लिहाज से गलत है। क्योंकि यहां कृषि पर एक बड़ी आबादी निर्भर करती है। तमाम सर्वेक्षणों में यह बात सामने आयी है कि कृषि अभी भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। ऐसी स्थिति में अगर शहरीकरण आता है कि तो केवल और केवल बेरोजगारी ही पैदा होगी। बेरोजगारी सौंदर्यबोध से दूर जाकर अपना संघर्ष करती है।

तवलीन सिंह ने गरीब विरोधी,ग्रामीण विरोधी रूख लिया है। जिसे अमर उजाला ने जगह देकर हिंदी मीडिया का पहला उदाहरण पेश किया है। यह पहली बहस है जिसमें शहरीकरण की कमियों के लिए समाजवादियों को दोषी ठहराया गया है या फिर उस राजनीति को अपमानित किया गया है जो गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के हित की बात करती है।

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS) द्वारा जारी.


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