भिखारी ठाकुर के एक साथी की दास्तान

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''हंसी-हंसी पनवा खिअइले बेइमनवा कि अपने विदेशवा बसेले हो राम.''  किसी जमाने में मशहूर भोजपुरी नाटक 'विदेशिया' के विरह-वेदना भरे इस गाने को सुन निगाहें बरबस ही उस वृद्ध भिखमंगे की तरफ ठहर जाती है. उम्र की ढ़लान पर भले ही उसकी जुबान लड़खड़ा रही हो, लेकिन तेवर वहीं पुराना! सहसा जेहन में यह सवाल भी उठता है कि कौन है यह शख्स जो भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की इस रचना को आलाप रहा है.

पूछने पर नाम बताता है, सीताराम पासवान. मूलत: बिहार के पूर्वी चम्पारण जिला अंतर्गत कनछेदवा पंचायत के पड़रिया निवासी 60 वर्षीय सीताराम का अतीत जितना रोमांचक है. वर्तमान उतना ही दु:खद. वक्त के थपेड़े से अंगूठा छाप सीताराम की स्मृति भी धुंधली हो चली है. वह बताता है कि बचपन से गाने-नाचने का शौक था. 12 वर्ष की उम्र में बेतिया के एक गांव में नौनिहाल गया हुआ था. वहीं पर भिखारी ठाकुर का लौंडा नाच देखा (गौरतलब है कि बिहार व यूपी के प्रसिद्ध लौंडा नाच की शुरुआत भिखारी ठाकुर ने ही की थी. गबरघिचोर, बेटीबेचवा, विदेशिया की गिनती इनके लोकप्रिय नाटकों में होती है, जिनपर फिल्में भी बनी है).

नाच मंडली में काम करने की इच्छा के चलते श्री ठाकुर के साथ छपरा जिले स्थित उनके गांव कुतुबपुर कोठी चला गया. उनके साथ नाचने व गाने के रियाज साथ जगह-जगह नाच प्रोग्राम में भी शामिल होने लगा. इसी दौरान उनके साथ बनारस, गाजीपुर, आजमगढ़, आरा, पटना, बक्सर, आसनसोल, हावड़ा, कोलकाता के साथ ही नेपाल व मॉरिशस भी गया. सीताराम बताता है कि क्या दौर था वह!  हावड़ा, कोलकाता या आसनसोल रेलवे स्टेशन पर जब हमारी महफिल सजती तो देखने के लिए बिहारियों की भीड़ उमड़ पड़ती. बिना माइक के ही गुरु जी की आलाप सुन दर्शकों के रोएं खड़े हो जाते. रुदन-क्रंदन करते हुए गायन व अभिनय से सभी की आंखें भर आती थी. फिर, लोगों की तालियों व सीटियों की गूंज से अजब शमां बंध जाती...और ईनाम के तौर पर सिक्कों की बारिश होने लगती थी.

करीब नौ वर्षों तक सीताराम भिखारी ठाकुर की नाच मंडली में रहा. फिर वह श्री ठाकुर के निधन के पश्चात अपने गांव लौट आया. हालांकि बाद में छपरा से नाच मंडली के सदस्य वापस चलने का प्रस्ताव लेकर आए लेकिन मां-बात की मौत हो जाने के कारण वह नहीं गया. यहीं स्थानीय नाच पार्टी से जुड़कर अपना भरण-पोषण करने लगा. खैर, जवानी तो नाचते-गाते कट गयी लेकिन बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं होने से गाते हुए भीख मांगकर गुजारा करना ही नियति बन गई है. थोड़ी-बहुत जमीन थी वह भी पट्टीदारों ने हथिया ली. मतदाता सूची में नाम नहीं होने से इंदिरा आवास व वृद्धा पेंशन का लाभ भी नहीं मिल सका है. आज के भोजपुरी फिल्मों व गानों में फैली अश्लीलता से सीताराम काफी आहत है. वह भावुक हो कहता है, "बड़ी बाउर जमाना आ गइल बबुआ. अइसन-अइसन गाना आ फिल्म आव$ ताड़े कि बेटी-बहिन के संगे ना देख-सुन सकल जाला. बाकिर हमनी के समय में ई सब गंदगी ना रहे. "  बहरहाल गुमनामी के बेरहम सुरंग में भटक रहे सीताराम पर किसी भोजपुरी कला मंच या संगठन की नजरें इनायत हो और इसका कायाकल्प हो जाए. जीवन के अंतिम समय में इस फक्कड़ कलाकार के लिए बड़े सम्मान की बात होगी.

लेखक श्रीकांत सौरभ पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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