मेलबर्न में आजकल : काले-गोरे का भेद तो है!

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साफ सुथरी हवा, पानी, मौज मस्ती के बेहिसाब साधन घूमने- फिरने की बेहिसाब जगह, प्रदूषण नाम की चीज नहीं, मिलावट और भ्रटाचार का नामोनिशान नहीं, मंत्री और अफसरों की बेईमानी के किस्से नहीं. यह सब मेलबर्न की धरती पर दिखाई दे रहा है --हर क्षण, लेकिन एक जहर ऐसा है जो घुला हुआ है इस शानदार धरती की गोरी चमड़ी में.

रंगभेद नाम का यह जहर मेरे अंदर दहशत पैदा कर चुका है. सन २००९ में ऐसा नहीं था जब मैं दिसम्बर माह में मेलबर्न की सड़कों पर बेखौफ-बेझिझक पैदल या ट्राम में घूमता था. पिछले साल इन्हीं सड़कों पर घटी नस्ली घटनायओं ने सोचने पर मजबूर किया है कि रहने के लिए दुनिया के शानदार शहरों में शुमार ही नहीं बल्कि अव्‍वल आने वाले मेलबर्न शहर में यूरोप की तरह रंगभेद के गुबार क्यों उठे? क्या यह बात सही है? मेरा उत्तर हाँ है और इसी कारण मैं अपने एक माह के मेलबर्न प्रवास में समुचित सावधानी बरत रहा हूँ. बात यह भी सही है कि सरकार को ये अशोभनीय घटनाएं हमेशा चिंतित करती रहीं और सरकार की सख्‍ती के बाद सब कुछ सामान्य हुआ है.

गोरों के अंदर मौजूद चमड़ी भेद मुझ जैसे इंसान को ही नहीं यहाँ की सरकार और अन्य स्वतन्त्र संस्थाओं को भी चिंतित किये है. मेलबर्न रेडियो स्टेशन जिसे एसबीएस के नाम से जाना जाता है,  ने एक सर्वे कराया है कि यहाँ वास्तव में रंगभेद है या नहीं? आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी भी इस विषय पर काम कर रही है.  यहीं पर मिली एक जानकारी के मुताबिक एक गोरे छात्र को १० स्थानों पर आवेदन करने पर नौकरी मिल जाती है जब कि एशियन को नौकरी के लिए १६ स्थानों पर आवेदन करना पड़ता है.

पिछले साल भारतीय समुदाय के लोगों के साथ यहाँ जो कुछ हुआ हम सब चिंतित हुए, यहाँ की सरकार भी. यहाँ बसे भारतीयों में फिर से खुली हवा में सांस लेने की हिम्मत जगी है. प्‍वाइंट कुक जहां मुझे एक मiह रहना है,  में कई भारतीय मिले जो यहाँ की नागरिकता के लिए आवेदन करने की सोच रहे हैं. मेरे जैसे उम्रदराज के लिए यहाँ बसने का सोच मन को नहीं भाता पर जिंदगी की शुरुआत करने वाले नौजवान के लिए यहाँ बसने का विचार बुरा नहीं. यहाँ एक बार आने पर बेहतर जीवन जीने और धनोपार्जन कर बैंक बैलेंस बढ़ाने की संभावनाएं है.

दो-तीन दशक तक यहाँ रहने के बाद एनआरई बन कर यह लोग जब देश आते हैं तो इनकी क्लास (उच्च वर्ग) बदली मानी जाती है.भारत जहाँ जनसँख्या विस्फोटक है,  वहां के नौजवान यदि पुरुषार्थ से पृथ्‍वी के किसी कोने में अपना परचम लहराते हैं तो राष्‍ट्रवादियों को नाक भौं नहीं सिकोड़ने चाहिए. और रही बात रंगभेद और फिर होने वाले नस्ली हमलों की, तो इन्हें पूरी तरह समाप्‍त करना किसी सरकार के बूते की बात नहीं. इतिहास बताता है कि सन १७७८ में यूरोपियनों ने आस्ट्रेलिया की धरती पर कदम रखा, तब से वे इस रंगभेद की बुराई से ग्रसित हैं. हमले भले ही थम जाए रंगभेद की भावना दिलों से मिटाना संभव नहीं.

अपने देश में हमलों की खबरों ने यहाँ आने वालों में दहशत इतनी भर दी है कि यंहा की सरकार के आंकड़ों के मुताबिक (पिछले ६ माह के) भारत से आने वालों में २० फीसदी की गिरावट आई है. इस देश में २३० देशों के लोग बसे हैं. भारतीयों की संख्या लाखों में है. कोई भी हमले इतनी बड़ी फौज को पलायन करने पर मजबूर नहीं कर सकती. हम भारतीयों को यहाँ से पलायन करके नहीं बल्कि यहाँ जमे रहकर रंगभेद के खिलाफ वातावरण बनाना होगा तभी हम अपने देश का नाम रोशन कर सकते हैं. गाँधी, बुद्ध और महावीर आदि का सन्देश प्रचारित कर. इंसानियत का यह सन्देश हमारे देश की असली ताकत है.

लेखक अशोक बंसल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा इन दिनों आस्‍ट्रेलिया में प्रवास कर रहे हैं.


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