उंगलियों पर गिनेंगे तो भी नहीं मिलेंगे प्रमोद भागवत जैसे पत्रकार

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मेरे एक पत्रकार मित्र थे प्रमोद भागवत। 'महाराष्ट्र टाइम्स' में रिपोर्टर थे। मैं जब 'नवभारत टाइम्स' में काम करने मुम्बई आया, तो उनसे परिचय हुआ। वे ठाणे में रहते थे। मैं उन दिनों मुम्बई को समझने की कोशिश कर रहा था और इस सिलसिले में अक्सर भागवतजी से लम्बी चर्चाएं किया करता। हमारा मत यह था कि सरकार तमाम साधन होने के बावजूद लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम रहती है।

हम अक्सर इसकी वजह ढूंढ़ते। हर बार एक ही वजह पर आकर हमारा विमर्श रुक जाता- भ्रष्टाचार। मगर भागवतजी का एक मत और भी था। वे कहते, 'हम हर बात का दोषारोपण सरकार या सरकारी संस्थाओं पर कर देते हैं। यह नहीं सोचते कि इतनी आबादी के बोझ से सरकार की कार्य पद्धति भी प्रभावित होती है। कहीं न कहीं नागरिकों को भी आगे बढ़कर विकास के काम में हाथ बंटाना चाहिए।' एक बार मैंने उनके इस मत का तीखा प्रतिवाद किया, 'यह कैसे संभव है? जो काम साधन-सम्पन्न सरकार नहीं कर सकती, वह काम साधनहीन जनता कैसे कर सकती है?'

भागवतजी ने मुस्कराकर कहा, 'अगले रविवार को सुबह 6.30 बजे मेरे घर आओ। ठाणे में। तब मैं इसका नमूना दिखाऊंगा कि साधनहीन जनता क्या कर सकती है।' मैं वसई में रहता था। रविवार को सुबह 6.30 बजे ठाणे में भागवतजी के घर पहुंचना मुश्किल होता। इसलिए शनिवार रात को काम करके दफ्तर में ही सो गया। सुबह 4.19 की पहली लोकल सीएसटी (तब वीटी) से पकड़ी। स्लो लोकल थी। सवा छह बजे ही भागवतजी के घर पहुंच गया। वे नीले रंग का गाउन जैसा कुछ पहने हुए थे। मुझे नाइट गाउन लगा।

बिस्कुटों के साथ चाय पीकर वे ठीक साढ़े छह बजे घर से चल दिये। उनके हाथों में एक बड़ी और एक छोटी झाडू थी और थी छाज जैसी कचरा उठाने की एक छोटी चीज। मैं उनके पीछे-पीछे। वे सड़क पर पहुंचे, तो पांच-छह नौजवान यही सामान लिये हुए वहां तैयार मिले। उन सबने मुंह पर कपड़ा बांधा और सड़क पर झाडू लगानी शुरू कर दी। करीब एक किलोमीटर की सड़क आधे घंटे में चमक गयी। कचरा इकट्ठा करके डस्टबिनों में डाल दिया गया। जो कुछ भंगार इकट्ठा हुआ, उसे बेचकर एक डायरी में वे पैसे दर्ज कर लिये गये।

म्युनिसिपेलिटी के नल पर साबुन से हाथ धोते हुए भागवतजी ने मुस्कराकर मुझसे कहा , 'देखा, जनता क्या कर सकती है? हम चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं, पर करते नहीं। हमेशा दूसरों को जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।' भागवतजी ने वह सड़क 'गोद' ले रखी थी। चंदे और बेचे गये भंगार के पैसों से रोज की सफाई को मैनेज करते। उसमें से भी अक्सर पैसे बच जाते थे, तो वृक्षारोपण करते, जनजागरुकता अभियान के पोस्टर लगवाते, जरूरतमंदों की मदद कर देते।

लौटकर भागवतजी के घर कांदा-पोहे का नाश्ता करते हुए मैंने उनसे कहा, 'आपने आज मेरी आंखें खोल दीं। यह दिखा दिया कि हम भी चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं। आप समाज के असली हीरो हैं।' आज भागवतजी हमारे बीच नहीं हैं। मुझे मुम्बई के कफ परेड इलाके के कुछ नागरिकों की इसी तरह की पहल के बारे में जानकर अचानक उनकी याद आ गयी। ताज रेजिडेंसी होटेल के पास चार एकड़ की जमीन का एक टुकड़ा बेकार पड़ा था। गड्ढेदार और बदबूदार। कफ परेड रेजिडेंट्स असोसिएशन ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि वह जमीन पार्क बनाने के लिए उन्हें दे दी जाये। अधिकारियों को ऐसी किसी जमीन की जानकारी नहीं थी। होती भी कैसे? वह कचराघर की तरह जो इस्तेमाल हो रही थी।

आज वही गंदी जमीन एक सुंदर और हरे-भरे गार्डन में तब्दील हो चुकी है। जनता ने राज्य सरकार या बीएमसी की मदद के बिना खुद ही यह करिश्मा कर दिखाया है। रेजिडेंट्स असोसिएशन के अध्यक्ष केके पुरी बताते हैं, 'हमने सरकार और कॉर्पोरेट से मदद मांगी थी, पर उन्होंने हाथ खड़े कर दिये। आखिर हमें चंदा करना पड़ा। किसी ने पैसे दिये, किसी ने बेंच, किसी ने पौधे और किसी ने बच्चों के झूले और सी-सॉ।' इस कचराघर को ठीक करने के लिए 16 मजदूर लगाये गये। दर्जनों ट्रक कचरा वहां निकला। फिर पौधे लगाये गये। एक महिला ने वहां झोपड़ी बना रखी थी। वह झोपड़ी हटाने के ऐवज में फ्लैट मांगने लगी। उसे पैसे देकर मामला सुलझाया गया।

इस पूरे काम में एक साल का वक्त और एक करोड़ रुपये लगे। अगले साल तक गार्डन लहलहाने लगा। जो लोग नाक पर रुमाल रखकर वहां से गुजरा करते थे, वे यहां टहलने के लिए आने लगे। अपने बच्चों को लाने लगे। हलके-फुलके व्यायाम और गपशप का अड्डा बन गया वहां। देश भर में ऐसी बहुत सी पहल चल रही हैं। बिना प्रचार-प्रसार के लाखों लोग ऐसे कामों में लगे हुए हैं। वे अंधेरे में मशाल की तरह हैं। खुद तो जन कल्याण और विकास के काम करते ही हैं, दूसरों को भी प्रेरणा देते हैं। भागवतजी जैसे सचमुच बहुत से लोग हैं, जो अपना फर्ज समझकर ऐसे कामों में लगे हैं। आज देश के विकास में इन लोगों का भी हाथ है। क्या सरकार इससे कुछ सीख ले सकती है?

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित भुवेंद्र त्यागी की रिपोर्ट


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