मुंबई के राजपूत

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मुंबई में इस बार मुझे एक बहुत ही अजीब बात समझ में आई. आमतौर पर अपनी बिरादरी की पक्षधरता से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस-पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढ़ी के लिए यह अजूबा ही रहा है कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा

शोषण राजपूत तालुकेदारों और राजाओं ने किया होगा लेकिन शोषक का तमगा सब पर थोप दिया जाता रहा है. आम राजपूत तो अन्य जातियों के लोगों की तरह गरीब ही हैं. मैं ने अपने बचपन में देखा है कि मेरे अपने गांव में राजपूत बच्चे भूख से तड़पते थे. मेरे अपने घर में भी मेरे बचपन में भोजन की बहुत किल्लत रहती थी. इसलिए राजपूतों को एक वर्ग के रूप में शोषक मानना मेरी समझ में कभी नहीं आया. लेकिन सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी और बाद में वामपंथी सोच के कारण कभी इस मुद्दे पर गौर नहीं किया. संकोच लगता था.

मेरे बचपन में मेरे गाँव में राजपूतों के करीब 16 परिवार रहते थे. अब वही लोग अलग-विलग होकर करीब 40 परिवारों में बँट गए हैं. मेरे परिवार के अलावा कोई भी ज़मींदार नहीं था. सब के पास बहुत मामूली ज़मीन थी. कई लोगों के हिस्से में तो एक एकड़ से भी कम ज़मीन थी. तालाब और कुओं से सिंचाई होती थी और किसी भी किसान के घर साल भर का खाना नहीं पूरा पड़ता था. पूस और माघ के महीने आम तौर पर भूख से तड़पने के महीने माने जाते थे. जिसके घर पूरा भी पड़ता था उसके यहाँ चने के साग और भात को मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर लिया गया था.

मेरे गांव में कुछ लोग सरकारी नौकरी भी करते थे हालांकि अपने-अपने महकमों में सबसे छोटे पद पर ही थे. रेलवे में एक स्टेशन मास्टर, तहसील में एक लेखपाल और ग्राम सेवक और एक गाँव पंचायत के सेक्रेटरी. तीन-चार परिवारों के लोग फौज में सिपाही थे. सरकार में बहुत मामूली नौकरी करने वाले इन लोगों के घर से भूखे सो जाने की बातें नहीं सुनी जाती थीं. बाकी लोग जो खेती पर ही निर्भर थे उनकी हालत खस्ता रहती थी. लेकिन जब हम बड़े हुए और डॉ. लोहिया की समाजवादी सोच से प्रभावित हुए तो मेरी समझ में आया कि राजपूत तो शोषक होते हैं, लेकिन जब मैं अपने गाँव के राजपूतों को देखता था तो मुझे लगता था कि मेरे गाँव के लोग भी तो राजपूत हैं, लेकिन शोषक होना तो दूर की बात, वे तो शोषण के शिकार थे.

बाद में समझ में आया कि चुनावी राजनीति में कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करने के उद्देश्य से राजनीतिक बिरादरी ने कुछ ऐसी जातियां मार्क कर दी थीं जिनके खिलाफ पिछड़ी और दलित जातियों को संगठित किया जा सके. हालांकि उस काम में वे सफल नहीं हुए. सवर्ण जातियों को गरिया कर पिछड़ी जातियों के वोट तो हाथ आ गए, लेकिन बाद में मायावती और कांशी राम के नेतृत्व में उन्हीं पिछड़ी जातियों के खिलाफ दलित जातियों ने मोर्चा खोला और आज उत्तर प्रदेश में सबसे ऊंची ब्राह्मण जाति के लोग मायावती के साथ हैं, जबकि राजपूत वोट बैंक के रूप में विकसित हो चुका है और उसे अपनी तरफ खींचने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां कोशिश कर रही हैं.

आज राजपूतों के एक बहुत बड़े वर्ग के लोग गरीबी की रेखा के बहुत नीचे रह रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि इसी बिरादरी से आने वाले बहुत सारे लोगों ने उत्तर प्रदेश में राजनीति का सहारा लेकर अच्छी खासी ताक़त अर्जित कर ली है. लेकिन वे माइनारिटी में हैं. उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में स्थित अपने गांव के हवाले से हमेशा बात को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे इंसान के लिए यह बात हमेशा पहेली बनी रही कि सबसे गरीब लोगों की जमात में खड़ा हुआ मेरे गाँव का राजपूत, शोषक क्यों करार दिया जाता रहा है. मेरे गाँव के राजपूत परिवारों में कई ऐसे थे जो पड़ोस के गाँव के कुछ दलित परिवारों से पूस-माघ में खाने का अनाज भी उधार लाते थे, लेकिन शोषक वही माने जाते थे.

बाद में समझ में आया कि मेरे गाँव के राजपूतों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा की उपेक्षा रही है. जिन घरों के लोग पढ़-लिख गए वे आराम से रहने लगे थे. वरना पिछड़ेपन का आलम तो यह है कि इस साल राज्य सरकार ने जब सफाईकर्मी भर्ती करने का फैसला किया तो मेरे गाँव के कुछ राजपूत लड़कों ने दरखास्त दिया था. जब गाँव से बाहर निकल कर देखा तो एक और बात नज़र आई कि हमारे इलाके में जिन परिवारों के लोग मुंबई में रहते थे उनके यहाँ सम्पन्नता थी. मेरे गाँव के भी एकाध लोग मुंबई में कमाने गए थे. वे भी काम तो मजूरी का ही करते थे लेकिन मनी आर्डर के सहारे घर के लोग दो जून की रोटी खाते थे. मेरे ननिहाल में लगभग सभी संपन्न राजपूतों के परिवार मुंबई की ही कमाई से आराम का जीवन बिताते थे.

ननिहाल जौनपुर जिले में है. 2004 में जब मुझे मुंबई जाकर नौकारी करने का प्रस्ताव आया तो जौनपुर में पैदा हुई मेरी माँ ने खुशी जताई और कहा कि भइया चले जाओ, बम्बई लक्ष्मी का नइहर है. बात समझ में नहीं आई. जब मुंबई में आकर एक अधेड़ पत्रकार के रूप में अपने आपको संगठित करने की कोशिश शुरू की तो देखा कि यहाँ बहुत सारे सम्पन्न राजपूत रहते हैं. देश के सभी अरबपति ठाकुरों की लिस्ट बनायी जाय तो पता लगेगा कि सबसे ज्यादा संख्या मुंबई में ही है. दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर लोगों के गाँव तत्कालीन बनारस और गोरखपुर कमिश्नरियों में ही हैं.

कभी इस मसले पर गौर नहीं किया था. इस बार की मुंबई यात्रा के दौरान कांदिवली के ठाकुर विलेज में एक कालेज के समारोह में जाने का मौक़ा मिला. वहां राष्ट्रीय राजपूत संघ के तत्वावधान में उन बच्चों के सामान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिनको 2011 की परीक्षाओं में बहुत अच्छे नंबर मिले थे. बहुत बड़ी संख्या में 70 प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की लाइन लगी हुई थी और राजपूत समाज के ही सफल, संपन्न और वरिष्ठ लोगों के हाथों बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. वहां जो भाषण दिए गए उसे सुनकर समझ में आया कि मामला क्या है. उस सभा में मुंबई में राजपूतों के सबसे आदरणीय और संपन्न लोग मौजूद थे. उस कार्यक्रम में जो भाषण दिए गए उनसे मेरी समझ में आया कि माजरा क्या है.

मुम्बई में आने वाले शुरुआती राजपूतों ने देखा कि मुंबई में काम करने के अवसर खूब हैं. उन्होंने बिना किसी संकोच के हर वह काम शुरू कर दिया जिसमें मेहनत की अधिकतम कीमत मिल सकती थी. और मेहनत की इज्ज़त थी. शुरुआत में तबेले का काम करने वाले यह लोग अपने समाज के अगुवा साबित हुए. उन दिनों माहिम तक सिमटी मुंबई के लोगों को दूध पंहुचाने का काम इन लोगों ने हाथ में ले लिया. जो भी गाँव-जवार से आया सबको इसी काम में लगाते गए. आज उन्हीं शुरुआती उद्यमियों के वंशज मुंबई की सम्पन्नता में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है. साठ और सत्तर के दशक में जो लोग मुंबई किसी मामूली नौकरी की तलाश में आये, उन्होंने भी सही वक़्त पर अवसर को पकड़ा और अपनी दिशा में बुलंदियों की तरफ आगे चल पड़े.

आज शिक्षा का ज़माना है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बारम्बार कहा है कि भारत को शिक्षा के एक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. मुंबई के राजपूत नेताओं ने इस बयान के आतंरिक तत्व को पहचान लिया और आज उत्तर प्रदेश से आने वाले राजपूतों ने शिक्षा के काम में अपनी उद्यमिता को केन्द्रित कर रखा है. उत्तरी मुंबई में कांदिवली के ठाकुर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशन्‍स की गिनती भारत के शीर्ष समूहों में होती है. इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे राजपूत नेताओं को मैं जानता हूँ जिन्हों ने शिक्षा को अपने उद्योग के केंद्र में रखने का फैसला कर लिया है. लगता है कि अब यह लोग शिक्षा के माध्यम से उद्यम के क्षेत्र में भी सफलता हासिल करेंगे और आने वाली पीढ़ियों को भी आगे ले जायेंगे. बहरहाल मेरे लिए यह यात्रा बहुत शिक्षाप्रद रही क्योंकि भारतीय सामाजिक जीवन के एक अहम पहलू पर बिना किसी अपराधबोध के दौर से गुजरे हुए मैं ने एक सच्चाई लिख मारी.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.


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