नौकरशाहों को डा. आनंद कुमार से सबक लेने की जरूरत

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देहरादून। बीते दिनों रामदेव के सत्याग्रह, लोकपाल विधेयक पर बबाल, च्यूइंग गम उर्फ जासूसी विवाद और मर्डोक के फोन टेपिंग प्रकरण के बीच एक सुखद खबर सुनने को मिली, जिसकी आवाज मद्धम ही सही, पर कुंभकर्णी नींद सोए राजनेताओं और ‘सिस्टम’ को अपने मन मुताबिक ढालने में सिद्धहस्त नौकरशाहों की नींद खोलने के लिए काफी थी। लेकिन ग्लैमर का तड़का न होने के चलते इस खबर को मीडिया में खास तवज्जो नहीं दी गई।

वैसे भी महज टीआरपी बटोरने के फेर में लगे कारपोरेटी मीडिया हाउसों के लिए इस खबर में ऐसा कोई ‘मसाला’ था भी नहीं कि इसे दर्शकों के सामने परोसने में उन्हें रत्तीभर भी फायदा हो। इसकी जगह वे ऐश्वर्य राय बच्चन के मां बनने की खबरों को प्राथमिकता देते हुए लगातार ‘रिपीट’ करने में लगे हुए थे, गोया कि घट-घट व्यापी कैमरामैनों की जद में आने को कोई और मुर्गा (मुद्दा?) शेष ही न बचा हो। वैसे भी, सदी के महानायक की बहु के मां बनने की खबर से जो टीआरपी बटोरी जा सकती थी, वो एक पिछड़े जिले की एक छोटी सी खबर से कहां। खबर बस इतनी सी थी कि तमिलनाडु के एक छोटे से पिछडे़ जिले इरोड के डीएम डा. आर आनंद कुमार ने बजाय अपनी बिटिया को महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के, सरकारी स्कूल में दाखिला दिला दिया। इस एक लाइन की खबर, जिसे मीडिया ने ‘स्क्राल स्ट्रिप’ में चलाने तक की जहमत नहीं उठाई, के बहुत गहरे निहितार्थ हैं।

आज जहां एक छुटभैया नेता तक अपने नौनिहालों को महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाकर उनके भविष्य को ‘सिक्योर’ मान गौरव का अनुभव करता है, और उसके किसी दोस्त को सरकारी स्कूल में जाता देख उसे दीन-हीन महसूस करता है, वहीं यदि भाषणों की बात आए तो ये नेता शिक्षा व्यवस्था सुधारने के दावे करने से बाज नहीं आते। इस खबर के मायने तब और अधिक हो जाते हैं, जब दिल्ली के कई नामी-गिरामी कालेजों ने प्रवेश के लिए पिचानवे से सौ प्रतिशत अंक लाने वालों को ही प्रवेश देने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है। इस तुगलकी फरमान ने एक नए किस्म के अपराध को जन्म दे दिया है, जिसमें फर्जी एससी, एसटी प्रमाण पत्र बनवाकर छात्रों को उंचे कॉलेजों में दाखिला दिलाने का नया खेल चल पड़ा है। इस खेल ने तहसील कार्यालय को कमाई का एक नया रास्ता सुझा दिया है। भविष्य में बिना हथियार इस्तेमाल किए होने वाले इस अपराध के और अधिक बढ़ने के आसार हैं। के बाद उत्तराखण्ड लगातार शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। सरकार की असंतुलित शिक्षा प्रणाली के चलते आज जहां राज्य में कई प्राथमिक विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं तो

यदि उत्तराखण्ड की बात की जाए तो देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड शिक्षा के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध रहा है, लेकिन अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने  वहीं कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां छात्रों के दर्शन तक दुर्लभ हैं। हालत ये हैं कि सरकारी विद्यालयों में तैनात शिक्षकों के बच्चे भी प्राइवेट कॉन्वेंटों की शोभा बढ़ा रहे हैं। क्या इन सरकारी शिक्षकों का खुद में इतना आत्मविश्वास शेष नहीं रह गया है कि छात्रों को गुणवत्तापरक शिक्षा प्रदान कर सरकारी विद्यालयों में छात्रों को आने के लिए प्रेरित कर सकें? केन्द्र सरकार जहां देशभर में शिक्षा का अधिकार कानून लागू कराने को ऐड़ी-चोटी का जोर लगाती नजर आ रही है, वहीं वहीं दूसरी ओर राज्य में यह कानून सरकारी मशीनरी और नौकरशाहों की लापरवाह कार्यप्रणाली के चलते परवान नहीं चढ़ पा रहा है। पहाड़ पर कोई शिक्षक चढ़ना नहीं चाहता। यही कारण है कि शिक्षक शिक्षण कार्य की बजाय नेता-नौकरशाहों के चक्कर काटकर येनकेन प्रकारेण मैदानों में पहुंचना चाहते हैं।

यह स्थिति तब और भी अधिक दुखद हो जाती है, जब शिक्षकों के बार-बार सचिवालय के चक्करों से आजिज आ राज्य की शिक्षा सचिव को यह आदेश जारी करना पड़े कि कोई शिक्षक स्थानांतरण के लिए उनसे संपर्क न करें। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि फर्जी मेडिकल द्वारा शिक्षक अपना तबादला मैदानी क्षेत्रों में करा लेते हैं, लेकिन उनकी जगह खाली पड़ी सीटें ज्यों की त्यों खाली ही पड़ी रह जाती हैं। नतीजा शिक्षा के लिए शहरों की ओर पलायन के रूप में सामने आ रहा है। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन के पीछे राज्य के गांवों में बेहतर शिक्षा न पहुंच पाना भी एक बड़ा कारक है। शिक्षकों की कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के कई प्राथमिक विद्यालय आज बंदी की कगार पर हैं। शहरों में भी हालत कुछ अलग नहीं है। यहां यदि अंटी में पैसा है तो आप बेशक पब्लिक स्कूलों की तानाशाही झेलते हुए भी अपने नौनिहालों को वहां दाखिला दिला लें, लेकिन गरीब जिन सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर है, वहां की हालत सुधरने की बजाय और विकट होती जा रही है। आश्चर्य यह है कि इन पब्लिक स्कूल प्रबंधकों और संचालकों की तानाशाही पर अंकुश लगाने के लिए न तो कोई नियम ही बन पाया है और न ही राज्य सरकार की ऐसी कोई मंशा ही नजर आती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य की भाजपा की सरकार अभी तक राज्य में शिक्षा का अधिकार कानून को अमल में लाने की दिशा में एक वर्ष में एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा पाई है। इससे उसकी मंशा पर कई सवाल खड़े होते हैं। सरकार की इस महत्वपूर्ण मामले पर इसलिए निष्क्रिय बनी बैठी है, ताकि अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे शिक्षा मापिफया को संरक्षण दिया जा सके। हां, सरकार लोगों को गुमराह करने के लिए रंगरेजियत की कला के दम पर शिक्षा के क्षेत्र में विकसित होने की अखबारी सुनहरी तस्वीर जरूर पेश कर रही है।

केन्द्र सरकार ने लगभग दो माह पूर्व सार्वजनिक सूचना जारी कर प्राइवेट स्कूल प्रबंधकों को हर हाल में पच्चीस फीसदी सीटें गरीब छात्रों के लिए खाली रखने के निर्देश जारी किए थे, लेकिन शिक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे पब्लिक स्कूल संचालकों ने इसे तनिक भी भाव नहीं दिया, क्योंकि गरीबों को मुफ्त शिक्षा देकर वे अपने ‘एजुकेशन बिजनेस’ पर क्यूंकर टाट का पैबंद लगाएंगे। गरीब बच्चे को एडमिशन देंगे तो कॉपी, किताबों और ड्रेस के नाम पर मोटी कमाई कैसे हो पाएगी? यही कारण है कि राज्य के राजनेताओं और नौकरशाहों की मंशा यह है कि राज्य में शिक्षा के कानून को अमलीजामा पहनाने में, जितना विलंब हो सके, किया जाए, ताकि ठीकरा केन्द्र सरकार के सिर फोड़ा जा सके।

यह सब तब हो रहा है, जब मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधियमम के तहत होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार को वहन करना है। केन्द्र सरकार द्वारा 2009 में बनाए गए अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को इस नये शैक्षिक सत्र में भी लागू न किए जाने के पीछे भी राज्य सरकार और नौकरशाहों की शिक्षा मापिफया को संरक्षण देने की मंशा ही काम कर रही है। राज्य सरकार जिस प्रकार इस कानून को लागू करने में कछुवा चाल चल रही है, उससे तो यही लगता है कि अगले सत्र में भी यह कानून शायद ही लागू हो पाएगा।

बहरहाल इन सबके बीच डा. आर आनंद कुमार ने जो मिसाल पेश की है, उससे सरकारी स्कूलों की दशा सुधरने की ओर कुछ कदम उठ सकते हैं। इसकी शुरुआत फिलहाल उस स्कूल से हो चुकी है, जहां डीएम साहब ने अपनी बिटिया को दाखिला दिलवाया है।

खैर, अब यह स्कूल भी लाइमलाइट में आ चुका है। अब उत्तराखण्ड को देवभूमि समझ दुहने में लगे नौकरशाहों को डा. आर आनंद कुमार से सबक लेने की जरूरत है, लेकिन इसके लिए नौकरशाहों को स्वहितों के लिए नियमों को मोड़ने की मानसिकता से उपर उठकर अपने-अपने दड़बों से बाहर आना पड़ेगा, जिसकी उम्मीद फिलहाल तो नहीं है। खास तौर पर तब, जब प्रदेश में ऐसा एक भी उदाहरण हाल-फिलहाल तक न दिखाई देता हो।

लेखक मनु मनस्‍वी पत्रकारिता से जुड़े हैं.


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