वीरेश जी को फांसी दो!

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वीरेश कुमार सिंह उतने ही आईआईटीयन हैं, जितने गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पणिक्कर, इन्फोसिस के नारायणमूर्ति, सोशल एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल तथा आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव हैं. वीरेश सिंह ने 1988 में आईआईटी कानपुर से सिविल इंजिनीयरिंग में बीटेक की डिग्री ली. इसके बाद बिहार तथा यूपी के तमाम अन्य आईआईटी छात्रों की तरह उन्होंने भी तीन बार सिविल सर्विस की परीक्षा दी.

हम में से कई लोग सिविल सर्विस की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए और अब कहीं कमिश्नर, कहीं आईजी/डीआईजी, कहीं दूतावास में बड़े पदों पर हैं. वीरेश जी की किस्मत, वे परीक्षा में सफल नहीं हो सके. लेकिन चूँकि गाँव-देहात से ताल्लुख रखते थे और माँ-बाप की यही इच्छा थी कि वे सरकारी सेवा में ही जाएँ, लिजाहा उस जिद के आगे एम टेक की उपाधि के बावजूद कोई और नौकरी नहीं कर के उत्तर प्रदेश राज्य सेवा आयोग की परीक्षा में बैठ गए और वहाँ से जिला ऑडिट अधिकारी की नौकरी में पहुँच गए. जिसे जहां जाना होता है और जो देखना होता है वह हो ही जाता है.

आज वीरेश बाह्य तौर पर शायद उन में से किसी भी आदर्श के प्रतीक नहीं नज़र आयें जो आम तौर पर आईआईटी के लोग नज़र आते हैं या अपनी बातों में कहते हैं. अभी हाल में जब मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति को कुछ स्थानीय लोगों द्वारा उनकी ईमानदारी पर चुनौती मिलने लगी थी तो मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने तुरंत ही इस बात को सामने रख दिया कि वे आईआईटी के हैं और उनकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को समर्थन देने वालों में भारी संख्या में वर्तमान और पूर्व आईआईटी छात्र भी थे. ऐसे में यदि एक आईआईटी का पूर्व स्टूडेंट भ्रष्टाचार के मामले में रंगे हाथ पैसे के साथ गिरफ्तार हुआ हो, कई दिनों तक जेल में रह चुका हो, विजिलेंस डिपार्टमेंट द्वारा कोर्ट में चार्जशीट प्रेषित की जा चुकी हो और वह पिछले चार सालों से अपनी सेवा में निलंबित चल रहा हो, ऐसे व्यक्ति को तो आम तौर पर लोग दूर से ही सलाम करते नज़र आयेंगे. खास कर के अपने देश में, जहां भ्रष्ट वह है जो पकड़ा जाए- बाकी तो सभी साधु हैं.

वीरेश जी इन सभी स्थितियों से गुजर चुके हैं. वर्ष 2007 में गढ़वाल विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी के रूप में उन्हें कथित तौर पर पन्द्रह हज़ार रुपये की मांग करते और पांच हज़ार रुपये का घूस लेते हुए पकड़ा गया था, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया और वे 28 दिनों तक जेल में रहे. आगे चल कर उत्तरांचल राज्य के विजिलेंस डिपार्टमेंट ने उनके विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र प्रेषित किया है. इसी आरोप में वे पिछले चार सालों से राज्य सरकार द्वारा निलंबित भी हैं.

इन्हीं स्थितियों में वीरेश जी से कल मेरी मुलाक़ात हुई, जब वे यूँ ही मुझसे मिलने चले आये. एक बहुत लंबी मुलाक़ात के बाद मुझे एक बार फिर इस बात पर और गहरा यकीन हो गया कि शायद हर चीज़ वैसी नहीं होती जो दिखती है. जैसे हर चमकती हुई चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही शायद हर आरोपित व्यक्ति अपराधी नहीं होता. कई बार सतह के ऊपर जो दिखता है वह सच नहीं होता. जीवन इतना सरल और एक-रेखीय नहीं है. इसकी इतनी सारे संश्लिष्टताएं हैं जिसे समझने और भांपने के लिए बहुत अंदर गहरे पानी पैठना पड़ता है.

वीरेश जी का ही मामला लीजिए. यदि किसी दूसरे माध्यम से अथवा सरकारी दस्तावेजों से मैं उनके बारे में जानता तो यही बात मन में रह जाती कि एक आदमी घूस लेते हुए पकड़ा गया, उसे जेल भेजा गया, चार्जशीट न्यायालय गया है, अभी निलंबित चल रहा है, तो ठीक है, कहीं ना कहीं क़ानून अपना काम कर रहा है. वैसे भी इस देश में भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों का कड़ाई से पालन किये जाने की सख्त जरूरत है, चलो कम से कम एक मामले में तो वैसा हो रहा है.

फिर ऐसा क्यों हुआ कि इन हालातों से गुजर रहे व्यक्ति ने शायद एक हमदर्द या नर्मदिल आदमी मानते हुए जब मुझे अपनी पूरी कथा कही तो मुझे वीरेश जी के प्रति सिर्फ सहानुभूति और अपनेपन के भाव के अलावा और कुछ नहीं आया? वीरेश जी ने जो मुझे बताया उसके अनुसार यूनिवर्सिटी में एक ठेकेदार थे, जो यूनिवर्सिटी के उस समय के रजिस्ट्रार के कोई नजदीकी रिश्तेदार भी थे. कुछ मामलों को लेकर वीरेश जी, जो यूनिवर्सिटी के वित्त अधिकारी थे और रजिस्ट्रार में आपस में तनातनी हो गयी. उन में से एक कारण रजिस्ट्रार के यह ठेकेदार रिशेदार भी थे, जिनके द्वारा यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर लगाने सम्बंधित दो बड़े प्रस्ताव वीरेश जी ने यह कह कर खारिज कर दिया कि अभी यह नयी यूनिवर्सिटी है, उसमे कई अन्य चीज़ों की जरूरत है, शायद अभी इस बात पर खर्च करना न्यायसंगत नहीं होगा. इस बात पर ठेकेदार और वित्त अधिकारी में कुछ बहस भी हुई थी.

इसी बीच उन ठेकेदार महोदय का कोई बीस हज़ार के भुगतान का मामला आया. शायद पूरा काम नहीं हुआ था इसीलिए वित्त अधिकारी ने रजिस्ट्रार से भुगतान देने के पहले कुछ बातों पर गहराई से पूछताछ की. इनका उत्तर पा कर वीरेश जी ने उन ठेकेदार का बीस हज़ार का चेक भुगतान के लिए साइन कर दिया और उन्हें चेक प्राप्त भी हो गया. वीरेश जी के अनुसार चेक पाने के बाद भी वह ठेकेदार उनके सरकारी कार्यालय में आये और कुछ पैसे उनकी टेबल पर रख दिया. उस समय रजिस्ट्रार भी वहाँ मौजूद थे. जब वीरेश जी ने उन ठेकेदार को पैसे देने की बात पर डांट लगाईं तो रजिस्ट्रार ने भी ठेकेदार को डांटते हुए वह पैसे टेबल से हटाने की बात कही. ठेकेदार अपने पैसे ले कर वहाँ से चले गए.

वीरेश जी के अनुसार इसके कुछ देर बाद वे अपने दफ्तर से निकल कर अपनी कार की तरफ बढे. वहाँ वह ठेकेदार एक बार फिर उनके पास आ गये और उनकी जेब में कुछ रुपये डाल दिये. वीरेश जी पूरी बात समझ नहीं पाए और जैसे ही अपनी जेब से वे पैसे निकाल कर उन ठेकेदार महोदय को डांट कर देने को हुए, तब तक विजिलेंस डिपार्टमेंट के दो लोग उनके पास आ गए. उनके हाथों पर उस पैसे में लगा फेनोलफथलिन लग चुका था, नोटों पर उनकी उँगलियों के निशान थे, हाथ धोए जाने पर उससे लाल रंग निकला और कुछ ही क्षण में वीरेश जी गिरफ्तार किये जा चुके थे और वहाँ से जेल.

मैं नहीं कह रहा कि जितनी बात अपनी तरफ से वीरेश जी ने बताई वह सब सही होगा. यह बिलकुल संभव है कि उन्होंने मुझे जो कहा वह गलत हो, झूठ हो. पर हो सकता है यह बात सच भी हो. क्योंकि मैंने खुद एक पत्र देखा जो उस समय के रजिस्ट्रार ने यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस चांसलर को घटना के अगले दिन लिखा था. रजिस्ट्रार के उस पत्र में वीरेश जी के कार्यालय में घटी घटना, जैसी उन्होंने मुझे बतायी, का पूरा जिक्र है कि कैसे ठेकेदार ने पैसे रखे, कैसे वीरेश जी ने उसे पैसे उठा कर वहाँ से जाने को कहा, कैसे रजिस्ट्रार ने स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करके ठेकेदार से वे पैसे उठवाये.

रजिस्ट्रार की उस चिट्ठी में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे आगे चल कर जब विजिलेंस के कुछ लोगों ने उन्हें बुलाया तो वे वीरेश जी के पास उनकी कार के पास गए जहां उन्होंने वीरेश जी द्वारा पूर्व में घटित घटना को तस्दीक किया. यह भी देखने वाली बात है कि विजिलेंस डिपार्टमेंट के एफआईआर के अनुसार वीरेश जी यह पैसा अपने सरकारी कार्यालय में ले रहे थे, जब उन्हें रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया, जबकि रजिस्ट्रार साहब के इस पत्र के अनुसार कार्यालय में ऐसी कोई घटना नहीं हुई. साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि विजिलेंस की एफआईआर में रजिस्ट्रार के अलावा यूनिवर्सिटी के जिन दो कर्मचारियों को घटना का गवाह बताया गया उन्होंने आगे चल कर एफिडेविट के जरिये दूसरी ही बातें कही और घटना की सत्यता से इनकार किया.

वीरेश जी ने इस सब के पीछे कुछ गहरी साजिशों की बात बतायी जो यूनिवर्सिटी पोलिटिक्स से जुडी हुई थी और जिस में कई बड़े नाम शामिल थे पर चूँकि उनके पास इसके ठोस प्रमाण नहीं थे, अतः मैंने उन्हें इसे भूल जाने की ही सलाह दी.

मेरा यह दृष्टांत लिखने का यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि मैं वीरेश जी का बचाव पक्ष प्रस्तुत करूँ. वह तो उन्हें स्वयं अपने लिए सक्षम न्यायालय में करना होगा जहां उनका मुकदमा चल रहा है. यह भी मैं नहीं कह रहा कि जितनी बातें वीरेश जी ने मुझे बतायीं वह सब सही हों. इस बात की भी पूरी संभावना है कि वे पूरी तरह झूठ बोल रहे हों और विजिलेंस की ही पूरी बात सच हो- सच और झूठ का फैसला तो न्यायालय ही कर सकती है. मैंने यह पूरी बात मात्र इसीलिए लिखी क्योंकि मुझे महसूस हुआ कि हमारे आसपास कई सारे वीरेश जी हैं, जो कई बार शायद सही भी होते हैं पर उनके इर्द-गिर्द स्थितियां ऐसी बना दी जाती हैं कि वे एकदम से अपराधी घोषित हो जाते हैं.

इसी मामले को लीजिए. यदि आज यह माना जा रहा है कि विजिलेंस का मुक़दमा सही है तो यह भी तो हकीकत है कि खुद यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने पूरी घटना को दूसरे ढंग से स्वयमेव ही कुलपति के सामने प्रस्तुत किया, यह भी तो हकीकत है कि यूनिवर्सिटी के दो कर्मचारियों ने वीरेश जी के पक्ष में अदालत में एफिडेविट दिया, यह भी तो अभिलेखों में है कि वीरेश जी की जमानत पर बहस होने के बाद तत्कालीन माननीय जनपद न्यायाधीश महोदय ने उन्हें तत्काल बेल देने हुए अपने आदेश में यह लिखा कि चूँकि अभियुक्त ने पूर्व में वादी (उन ठेकेदार महोदय) के दो प्रस्तावों को स्पष्ट मना कर दिया था इसीलिए यह संभव है कि उसने दुश्मनी में यह कराया हो. साथ ही यह भी कि बीस हज़ार के भुगतान के लिए पन्द्रह हज़ार का घूस माँगा जाना कुछ समझ के परे दिखता है.

मेरा यह दृष्टांत रखते समय एक मकसद यह है कि हम इन्सान के रूप में सिर्फ एक पहलू पर नहीं अटक जाया करें और यदि एक बार किसी को जमाने ने दोषी ठहरा दिया तो बिना उसकी गहराई में गए, उसे अपने मन की अदालत में फांसी के हक़दार नहीं बना लें. इस दुनिया में तमाम बातें होती रहती हैं और कई बार सच के भीतर सच की परछाईयाँ कैद होती हैं. हर बात उतनी सरल नहीं होती जितनी दिखती है. यह बिलकुल संभव है कि वीरेश जी की पूरी बात झूठी हो पर यह भी संभव है कि वे सच पर हों- फैसला अभी आना बाकी है.

इस दृष्टांत को रखने का मेरा एक मकसद यह भी है हम इन दिनो भ्रष्टाचार-विरोध के एक तीव्र ज्वार से गुजर रहे हैं. हम सभी चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार का खात्मा हो पर ऐसा ना हो जाए कि भ्रष्टाचार विरोध की जल्दीबाजी में हम अति-उत्साही हो कर ऐसे क़ानून बना डालें, जो इतनी हड़बड़ी में हो जहां सच सुनने और सच समझने का समय ही नहीं हो- बस इस बात की हड़बड़ी हो कि यदि कोई गिरफ्त में आया तो उसे सरेआम नीलाम करते हुए फांसी दे दी जाए. यदि ऐसी हड़बड़ी और ऐसे मानसिकता में कुछ निर्दोष वीरेश जी भी बलिवेदी पर चढ़ गए तो आपको-हमें सब को तकलीफ होगी, क्योंकि हम सब भ्रष्टाचार तो दूर करना चाहते हैं पर इसके नाम पर अकारण अन्याय नहीं करना चाहते.

इसके साथ अंत में यह बात भी कि यदि एक पल के लिए वीरेश जी की बात सही हो तो यह हर आदमी के लिए एक चेतावनी भी है कि वे ना सिर्फ ईमानदार रहें, बल्कि उसके साथ सतर्क भी रहें, क्योंकि कोई नहीं जानता कि किसका कौन सा दुश्मन किस तरह से उसे फंसाने के लिए कौन सी चाल चल रहा हो और कैसे फर्जी मामला बना कर किसी को फंसा दे, क्योंकि व्यावहारिक तौर पर होता यही है कि यदि एक बार इस तरह का मामला फंस गया तो उसे ठीक होने में वर्षों लग जाते हैं. मेरी निगाह में यह बात खास कर ईमानदार लोगों के लिए और भी जरूरी है.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं.


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