सिंगापुर के इन नेताओं से शराफत सीखें भारत के लीडरान

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यशवंत जी, एक बार पत्रकारिता का रसपान जो कर लेता है तो इसका कीड़ा जिंदगीभर उसके दिमाग में कुलबुलाता है। कुछ ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ जिसको मैं दृष्टिपटल पर रखना चाहूंगा। एक अक्टूबर को सिंगापुर के बुडलैंड क्षेत्र में शनिवार को डांडिया महोत्सव 2011 का आयोजन किया गया, जिसमें सिंगापुर में बसे हजारों भारतीयों में हिस्सा लिया और जमकर डांडिया खेला।

इस महोत्सव में मुझे भी शरीक होने का मौका मिला। महोत्सव में शरीक होना और डांडिया खेलना ये कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है लेकिन जिस बात की ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं.... वो ये हैं कि इस कार्यक्रम की गेस्ट ऑफ आनर बुडलैंड़ क्षेत्र की सांसद कोह ली थी, जिनके साथ मैं पिछले आधा घंटे से डांडिया खेल रहा था। लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि वो इस कार्यक्रम की गेस्ट आफ आनर हैं और इस क्षेत्र की सांसद हैं। क्योंकि ली सामान्य लोगों की तरह डांडिया खेल रही थी... पद का कोई रौब नहीं .. कोई दिखावा नहीं... आम लोगों में घुल मिलकर ऐसे डांडिया खेल रहीं थी... जैसे वो खुद भी एक आम नागरिक हों... उनकी सादगी देखकर पत्रकारिता का कीड़ा मेरे दिमाग में कुलबुलाया और उनके बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई... तो फिर मैंने उनसे महोत्सव के दौरान ही थोड़ा बात करने के लिए टाइम मांगा... और उनसे आधा घंटे बात की... इस दौरान कई बातें निकलकर आई... तो मुझे लगा कि ये बातें मुझे अपने पत्रकार साथियों के साथ शेयर करनी चाहिए। दूसरी भारतीय सांसदों की सोच और यहां के सांसदों की सोच का भी अंदाजा आप खुद पढ़कर लगा लीजिएगा।

1. मेरा ली से पहला सवाल था कि आप इस कार्यक्रम की गेस्ट ऑफ आनर हैं और इस क्षेत्र की सांसद हैं.... लेकिन फिर भी आपके सम्मान में यहां कोई स्वागत समारोह आयोजित नहीं हुआ--- ऐसा क्यों? .. ली ने इसका जबाब बड़ी ही सहजता के साथ दिया....और बोलीं कि देखो राम... स्वागत समारोह एक अनावश्यक खर्चा है... और आधा घंटा कार्यक्रम में देरी.... और बिना स्वागत समारोह के मैंने लोगों से साथ घुल मिलकर जितना डांडिया का आनंद लिया... तब थोड़ी ले सकती थी.... तब मुझे अपने सांसदों की याद आई... वाह रे भारतीय सांसदों... जब तक इनके सम्मान में स्वागत समारोह आयोजित नहीं किया जाता... तब तक वो किसी कार्यक्रम में शिरकत करना ही पसंद नहीं करते।

2. फिर मेरा ली से अगला सवाल था...आप यहां एक आम नागरिक की तरह आईं....आम नागरिक की तरह कार्यक्रम में शिरकत की....और आम नागरिक की तरह वापस जा रही हैं...इतनी खुश भी हैं...इसके पीछे क्या कारण है? .. ली ने इसका सीधा सा जबाब दिया कि मैं सांसद होने से पहले एक आम नागरिक हूं..और मैं इन्हीं लोगों के बीच में से सांसद बनी हूं... और ये है नहीं कि सांसद बनने के बाद मैं कोई भगवान बन गई.... सांसद बनने के बाद भी में एक इंसान ही हूं... मैं सांसद इन लोगों की सेवा के लिए बनी हूं न कि इन लोगों में अपने आप को बड़ा दिखाने के लिए।

3. फिर ली से मेरा अगला सवाल था कि यहां न तो आपके साथ कोई बाडीगार्ड है और न ही दो–चार छुटभइये....ऐसा क्यों ...क्या आपको नहीं लगता कि ये सब होना चाहिए? ...तो ली ने कहा कि इंसान की पहचान उसके काम से होती है...दो–चार छुटभइये साथ रखने से नहीं...और रही बात बाडीगार्ड की तो ..बाडीगार्ड की जरूरत उसे होती है... जिसके मन में डर होता है... जब कोई गलत काम करता है... वरना अपना काम ईमानदारी से करो... जनता सर–आंखों पर बिठाकर रखती है... और दिल से इज्जत करती है... वाह रे मेरे भारतीय सांसदों... कुछ सीखो... जनता के लिए काम करो... और जनता ने जिस काम के लिए तुमको चुनकर भेजा है.. उसे ईमानदारी से करो... तो तिहाड़ जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी... और न ही पुलिस सुरक्षा की जरुरत पड़ेगी... इससे एक ओर देश को आर्थिक फायदा होगा... तो दूसरी ओर तुम्हारा जनता में भी विश्वास बढ़ेगा... फिर तुमको बाड़ीगार्ड और दो-चार छुटभइये साथ रखने की जरूरत नहीं।

लेखक रामवीर सिंह डागुर पिछले तीन साल से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. पंजाब केसरी, मीडिया चक्र न्यूज एजेंसी और ईटीवी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वर्तमान में सिंगापुर में प्रोक्यूरमेंट डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं। इनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या मोबाइल नंबर 0065– 84245001 के जरिए किया जा सकता है।


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