पत्रकारिता के छोटे सिपाही दलाली से ही कर पाते कमाई

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देश में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन इसके सबसे छोटे सिपाही संस्थानों के द्वारा अब भी उपेक्षित हैं। यहां से मिलने वाली पगार दो जून की रोटी भी नहीं जुटा सकती। जबकि सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता यहीं से जन्म लेती है और यहीं से बेहद प्रभावी समाचार भी आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है यहां संवादसूत्र से लेकर ब्यूरोचीफ तक पूरी तरह से ऊपरी कमाई से घरबार चलाने को मजबूर हैं।

पत्रकारों की एक बड़ी जमात प्राइमरी-माध्यमिक स्कूलों, इंटर कालेज, तहसील, ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर में दबंगई के बल पर उगाही करना आम बात है। ऐसे में उनसे बेहद खास करने की आशा नहीं की जा सकती। देश में हिन्दी पत्रकारिता को जन्म देने वाला कानपुर शहर भी ऐसे ही सैकड़ों हजारों संवादसूत्रों, पत्रकारों से भरा पड़ा है। कानपुर नगर में देश सभी मुख्‍य समाचार पत्र और टीवी चैनलों का सर्कुलेशन है। जिले में कुल 10 ब्लॉक हैं जिनमें मुखयतः घाटमपुर, बिल्हौर तहसील स्तर पर प्रमुख अखबारों के ब्यूरो कार्यालय हैं। यहां पर पत्रकारिता का डंका पीटने वाले संस्थानों ने ब्यूरो कार्यालय खोल रखे हैं, लेकिन यहां तैनात संस्थानों के कर्मचारी श्रम विभाग के तय कानून की खिल्ली उड़ाते दिखाई देते हैं, इन्हें न तो छुट्‌टी मांगने का अधिकार है और न ही बडे़ पदों पर बैठे संस्थान के लोगों से आंख मिलाने की परमिशन, बस पत्तेचाटी करों और कुछ भी करो, हां कोई क्राइम की खबर न छूटे बस।

कानपुर यूनिट के बिल्हौर तहसील में दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज, सहारा का ब्यूरो कार्यालय है। जागरण के ब्यूरो चीफ की २००० रुपए पगार है। मंहगाई के जमाने में इस पगार से क्या होगा संस्थान को नहीं मालूम। संवादसूत्र पूरे दिन तहसील, कोतवाली, शिक्षण संस्थानों, बैंक, ब्लॉक आदि में सेटिंग कर गुजारा भत्ता का जुगाड़ किया करता है। वहीं अमर उजाला के ब्यूरोचीफ ने सेटिंग के लिए हॉकर को फिट कर रखा है, जो फोटो-सोटू खीचखांच के दो चार सौ रुपए की जुगाड़ करता है। ऐसे में दोनों मुख्‍य अखबारों के लोग पत्रकारिता में कम कमाई में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। वहीं अस्तिव बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय सहारा के मठाधीश संवादसूत्र हैलो कानपुर में भी लिखते हैं। सहारा में उन्होंने भी गुजारा भत्ता के लिए एक चेला पाल रखा है जो मोटर साइकिल पर प्रेस लिखवाकर और कमर में कैमरा खोंसकर चलता है और प्रति प्रेस नोट/विज्ञप्ति पर ५०-१०० रुपए लेता है। जबकि हिन्दुस्तान के संवादसूत्र व प्राइमरी शिक्षक निजी खर्चे पर सब कुछ झेलता है। कुछ दिन पूर्व हुई बैठक में सर्कुलेशन इंचार्ज ने बिल्हौर में अखबार के डांवाडोल स्थिति को देखते हुए अखबार बंद करने का फरमान जारी कर दिया था, लेकिन संवादसूत्र के गिड़गिड़ाने के बाद उसे कुछ दिनों की और मोहल्लत दी गई है।

ऐसा करना इन सभी कलम के सिपाहियों की मजबूरी भी है, क्योंकि जिन्दा रहने के लिए पैसा तो कमाना ही है। बाल-बच्चे पालने हैं तो ये सब गुपचुप तरीके से करना ही पडे़गा। वहीं कानपुर जनंसदेश टाइम्स में खुलेआम उगाही का दौर चालू है। अभी अखबार को पैदा हुए कुछ माह ही हुए हैं लेकिन चीफ रिपोर्टर की दबंगई सातवें आसमान पर है। कानपुर महानगर से सटा जिला उन्नाव टेनरियों और कई नामी कंपनियों का गढ़ होने के साथ कमाई की लंका भी है। ऐसे में संस्थान के लोगों ने कानपुर संस्करण में उन्नाव भी झेल दिया है, कारण टेनरियों से उगाही। एक पीडित चमड़ा व्यवसाई की माने तो दो साल पहले गंगा में प्रदूषण के नाम पर उससे दैनिक जागरण, अमर उजाल और हिन्दुस्तान के पत्रकारों ने खबर न छापने के एवज में क्रमशः ८०००, ५००० और ५००० रुपए लिए थे लेकिन फिर भी बात नहीं छुप सकी और एक टीवी पत्रकार ने केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों को सूचित कर दिया और अब वे इसका मुकदमा लड़ रहे हैं।

चंडीगढ से टेलीकॉस्ट टीवी२४ के अपाहिज पत्रकार महानगर के सभी चौराहों पर ट्रैफिक सिपाहियों, टीएसआई और होमगार्डों से खुले आम उगाही करता है। इस पत्रकार के साथी कल्यानपुर क्रांसिग से रामादेवी चौराहे तक दिन में दो बार चक्कर लगाकर अपना काम करते हैं। कुल मिलाकर संस्थानों को ही तय करना पडे़गा कि उनके कर्मचारियों की सही पगार क्या है। लेकिन प्रभावी पत्रकारिता संस्थान करोड़ों डकार जाते हैं और खून-पसीना बहाने वाले अपने छोटे कर्मचारियों को कुछ नहीं देते। छोटे स्तर पर पत्रकारिता कर रहे लोग १०-१५ घंटे तक संस्थान की ड्‌यूटी बजाते हैं, लेकिन ये संस्थान के नियमित कर्मचारी भी नहीं है, संस्थान जब चाहे उन्हें मक्खी की तरह निकाल फेक देता है। न तो उनका भविष्य निधि खाता है और न ही उन्हें बैंक से पगार दी जाती है। दो-चार महीने तक मठाधीशों की चापलूसी करने के बाद उन्हें चेक से या किसी अन्‍य मद में थोड़ी बहुत रकम दे दी जाती है बस। दूसरों का दर्द उजागर करने वाले स्वयं ही दर्द झेलने को मजबूर हैं। केन्द्रीय श्रम एजेन्सियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए और कर्मचारियों की शिकायत पर उचित पहल करनी चाहिए।

अभिषेक कुमार

चौहट्टा, बिल्‍हौर, कानपुर

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