मूड बनाने की बजाय बिगाड़ न दे कंडोम!

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योगेशरात के यही कोई ग्यारह बज रहे होंगे। कमरे में दम घुटने लगा था सो नीचे सड़क पर आ गया। ठण्ड की रात अकेले सड़क पर बिताने का वही मजा है जो जेठ की रात कोठे पर गजल सुन कर टहलते हुए बिताने का। फोन पर बात करते-करते रात सड़क पर बिताने की आदत बहुत पहले ही लग चुकी थी। घर में कोई सुन न ले इसलिए बात करने सड़क पर आ जाना और फिर नोकिया का बैटरी बैक-अप भी तो अच्छा था तब। धीरे-धीरे आदत लग गई।

रोज की तरह आज भी निकला। गुलाब जामुन खाते हुए नजरें इधर-उधर दौड़ा रहा था। अचानक सामने के दुकान पर रखे कंडोम के डब्बों पे नजर पड़ी। डब्बी पर लडकी की अश्लील सी फोटो थी। ऐसा लग रहा था मानो डिब्बी के अन्दर कंडोम नहीं होकर उस लडकी का अता-पता हो। कंडोम के बगल में ही नैपकीन भी रखी थी। कॉटेक्स, स्टेफ्री, विस्‍पर वगैरह वगैरह। इन पर लडकियों का फोटो होना तो समझ में आ गया लेकिन इसी आधार पर कंडोम की डिब्बी पर लडकों की जगह लडकियों की इस तरह की फोटो ने दिमाग के अन्दर गुदगुदी कर दी। रेडियो और टीवी पर देख-सुन कर इतना तो सब जान चुके हैं कि कंडोम लड़के और नैपकीन लड़कियों के उपयोग की है, फिर ऐसी भी क्या जरूरत आ पड़ी कि कंडोम की डिब्बी पर नंगी लड़कियों को चिपकाकर सामने रखा जाए। सरे आम। क्या लड़कियों का जिस्म देखकर कंडोम की क्वालिटी का पता चलता है! दिमाग में सवालों का अंकुरण तेजी से शुरू हो गया।

जहां तक मेरी जानकारी है कोई भी सरकारी संस्था कंडोम की बिक्री इस तरह नहीं करती है। हां रेड लाइट एरिया में एनजीओ कंडोम का वितरण जरूर करता है। क्राइम रिर्पोटिंग के दौरान कई बार रेड लाइट एरिया गया हूं लेकिन वहां भी ऐसा प्रदर्शन इस तरह से नहीं होता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कटवरिया सराय में न रहकर रेडलाइट एरिया में जी रहा हूं। सच कहिए तो कंडोम का मजाक बन रहा है और यह अपने लक्ष्य से भटक रहा है। कंडोम को कमोडिटी की तरह लांच किया जा रहा है। मेनफोर्स दस का, कामसूत्र बीस का...पांच सौ का भी आ गया है मार्केट में। थू। बेशक इसके लिए बाजार जवाबदेह है। वही बाजार जो कैंसर से तड़प-तड़प कर मरते समाज के लिए जब गुटखा को पैक कर रहा होता है तो वैधानिक चेतावनी एक ऐसी निशानी की तरह छापता है मानो महानगर की महिला के मांग का सिंदूर हो। बामुश्किल दिखता है जाने इरादा क्या होता होगा मैडम जी का! उच्चतम न्यायालय ने आजिज आकर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि खबरदार जो मार्च 2011 के बाद से पाउच का प्रयोग किया।

मैं कंडोम के साथ किए जाने वाले सेक्स के पक्ष में हूं लेकिन कंडोम का इस तरह का नृशंस बाजारीकरण कहीं इसे इसके लक्ष्य से न भटका दे, इसी का डर है मुझे। किसी भी समाज का एक अनुशासन होता है। बिहार राज्य एड्स नियंत्रण समिति ने जब नक्सलियों तक नाई के माध्यम से कंडोम पहुंचाने की बात की थी तो मैंने इस रिपोर्ट को पहले पन्ने का लीड बनाया था। सुलभ शौचालय, रेलवे प्लेटफॉर्म जैसी सार्वजनिक जगहों पर डब्बे में कंडोम रखे जाने का कदम सराहनीय है, लेकिन शहर के मेडिकल स्टोरों में बडे-बडे पोस्टरों में घोर अश्लील तस्वीरों के साथ अश्लील शब्दों का मसाला बनाकर कंडोम की प्रदर्शनी से न तो परिवार नियोजन होगा और न ही जागरूकता आएगी। इससे बस असहजता आएगी। जागरूकता लाने के लिए ’’कंडोम बिंदास बोल’’ तक ठीक है लेकिन स्वीमिंग पूल में बिकनी में किसी महिला की घोर अश्लील तस्वीर को जागरूकता के नाम पर आम और सरे आम करना जागरूकता नहीं बदमाशी है। हमारे मनोविज्ञान पर इनका क्या असर होता है यह किसे नहीं मालूम है। सच पूछिए तो डर इस बात का भी है कि नियोजन या एड्स से रोकथाम के लिए बना कंडोम कहीं महिला संसर्ग का लाइसेंस न बन जाए! यूं तो इसके कोई प्रत्यक्ष दुष्परिणाम नहीं होंगे लेकिन यह सामाजिक ढांचे को तहस-नहस कर के रख देगा। संभ्रांत होने का दिखावा बहुत दिनों तक नहीं चल सकता।

लेखक योगेश शीतल पत्रकार हैं.


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