अमेरिका और भारत की पुलिसिंग में कुछ बुनियादी अंतर

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डा. नूतन ठाकुरमैं अभी बोस्टन में हूँ और अब शनैः-शनैः अपनी यात्रा के अंत की ओर बढ़ रही हूँ जब मैं तेइस तारीख को न्‍यूयार्क इंटरनेशनल एअरपोर्ट से वापसी के लिए हवाई जहाज पर बैठूंगी. कल मुझसे मिलने सत्येन्द्र आये थे. उनके भाई प्रणव भागीरथ को हम लोगों ने इस वर्ष का आईआरडीएस का मानवाधिकार विषयक पुरस्कार दिया था. प्रणव नीदरलैंड्स की राजधानी एम्स्टर्डम में रहते हैं और वहीं से सामाजिक संचेतना वाले कई सारे लोगों का समूह बना कर भारत में बुलंदशहर के आसपास कार्य संचालित करते हैं, जबकि उनके भाई सत्येन्द्र बोस्टन में हैं.

लाखों अन्य भारतीयों की तरह वे भी कंप्यूटर इंजीनियर हैं और अमेरिका में अच्छा खा-कमा रहे हैं. भारत के लिए कुछ करने की उनकी ललक उन्हें हमेशा परेशान किये रहती है, पर कई दूसरे अमेरिकी-भारतीयों की तरह वे भी यहाँ आने से घबराते हैं क्योंकि उनके अनुसार 'इंडिया में कई सारी प्रॉब्लम हैं.' चूँकि मैं मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्य करती हूँ और साथ ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी भी हूँ, लिहाजा इनसे मिलते ही मेरी सबसे पहली रूचि यहाँ की पुलिस व्यवस्था के बारे में जानने की हुई. मैंने उनसे पुलिस के बारे में पूछा और उन्होंने इसके बाद खुद ही बताना शुरू कर दिया. लगता है, देश हो या विदेश, पॉलिटिक्स के बाद पुलिस ही हर व्यक्ति का सबसे पसंदीदा विषय होता है.

सत्येन्द्र ने बताया कि अमेरिका में जो सबसे अच्छी बात है वह यह कि यहाँ के पुलिस वाले तनिक भी बदतमीज नहीं होते. उन्हें अपने काम से मतलब होता है, धौंस डालने से नहीं. ऐसा नहीं कि अमेरिका वाले पुलिस से नहीं डरते हों. लोग यहाँ भी पुलिस से बहुत अधिक घबराते हैं, लेकिन ऐसा आदमी तब करता है जब वह क़ानून तोड़े हुए होता है. इसका भी कारण सत्येन्द्र ने यह बताया कि यहाँ पर क़ानून तोड़ कर बच पाना काफी मुश्किल होता है. पुलिस शायद ज्यादा सतर्क और चौंकन्नी होती है, जिसके कारण किसी भी घटना के होने के बाद पुलिस वाले अपराध की तह तक प्रायः पहुँच ही जाते हैं.

मैंने उनसे यह पूछा कि यदि कोई व्यक्ति किसी मुसीबत में पुलिस वालों को बुलाये तो वह अमूनन कितनी देर में आ जाते हैं. सत्येन्द्र का कहना था कि उनके खुद के अनुभव से वे कह सकते हैं कि कॉल करने के पांच से दस मिनट के अंदर पुलिस वाले आ ही जाते हैं. उन्होंने वहाँ की पुलिस से जुडी एक और महत्वपूर्ण बात बताई. उनका कहना था कि यहाँ कम्युनिटी पुलिसिंग का बड़ा ही रिवाज है. कम्युनिटी पुलिसिंग में सारे इलाकाई लोगों की सहभागिता होती है. पुलिस के लोग हर इलाके में कुछ ऐसे लोगों को चुनते हैं जिन्हें वे सामाजिक सारोकार वाला समझते हैं. फिर इन लोगों को कुछ पुलिसिया अधिकार भी मिल जाते हैं और उनके कुछ कर्तव्य भी निर्धारित होते हैं. जिस भी व्यक्ति को कम्युनिटी पुलिसिंग के लिए चुना जाता है, वह इसे बड़े ही गौरव का विषय समझता है और अपने खाली समय में अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी तत्परता से करता है.

मेरे यह कहने पर कि ऐसा तो हमारे देश में भी एसपीओ, पुलिस वार्डेन आदि के रूप में होते हैं, सत्येन्द्र ने बताया कि दोनों में बुनियादी अंतर है. जहां भारत में लोग ये पद या तो स्वयं ले लेते हैं या सिफारिश कर के पा लेते हैं, पर उसके बाद इन पदों के प्रति पूरी तरह लापरवाह हो जाते हैं, वहीँ अमेरिका में ये दावित्व पुलिस वाले बहुत सोच-विचार कर देते हैं और जिसे यह दायित्व मिलता है वह भी पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है.

एक और बात उन्होंने ट्रैफिक के बारे में बताई. सत्येन्द्र ने बताया कि यहाँ यदि कोई व्यक्ति तीन बार ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करता है तो स्वतः ही उसका ड्राइविंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. ट्रैफिक नियमों को जानने के लिए दुनिया भर के कैमरे लगे हुए हैं, जिनसे सारी बातें हर पल मालूम होती रहती हैं. इस कारण हर आदमी अपने आप ही निरंतर चौंकन्ना रहता है और ट्रैफिक विभाग को इसका अतिरिक्त सरदर्द नहीं लेना पड़ता.

अंत में सत्येन्द्र ने एक बड़ी मजेदार बात कही- 'मैंने अपने बेटे को कह रखा है कि अमेरिका में तुम कहीं भी किसी भी तरह की परेशानी में आओ तो सबसे पहले किसी सबसे नजदीक के पुलिसवाले से संपर्क करो. पुलिसवाला तुम्हारी वाजिब मदद जरूर करेगा. लेकिन जब हम हिंदुस्तान आते हैं तो उसी बच्चे को मैं कहता हूँ कि यदि यात्रा के दौरान कभी कोई मुसीबत आ जाए तो किसी के भी पास जा कर मदद मांग लेना, पर पुलिसवाले के पास कत्तई मत जाना.' सत्येन्द्र की यह बात सुन कर मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा, एक तो इसलिए कि मैं भी उसी हिंदुस्तान की हूँ जिसके पुलिस की वे शिकायत कर रहे थे. फिर दूसरे यह भी कि एक पुलिसवाले की पत्नी भी हूँ. पर यह भी तो जानती हूँ कि मुझे अच्छा लगे या बुरा, उनकी बात बहुत हद तक सही भी है.

डॉ.  नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस


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