तीस आईपीएस अफसरों की जिंदगी पर किताब लिखेंगे अमिताभ

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अमिताभ मैं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में हूँ, स्वाधीनता के पूर्व इसका नाम आईपी (इंडियन पुलिस) था. यह हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में जो पुलिस व्यवस्था है, उसमे सर्वोच्च पद आईपीएस अधिकारियों को जाता है. यह भी एक सच्चाई है कि आईएएस के बाद जिस सेवा को सरकार और समाज में सर्वाधिक महत्व दिया जाता है वह आईपीएस है. जिस परिवार का कोई एक लड़का आईपीएस में चयनित हो जाता है वह अपने आप को अत्यंत भाग्यशाली परिवार समझता है और इस एक बात से ही उसकी सामाजिक हैसियत में कुछ वृद्धि सी हो जाती है.

पर यह भी बड़ा ही रोचक है कि इसी आईपी/ आईपीएस की सेवा में एक ही परीक्षा पास कर के, एक ही एकेडमी में आ कर, एक ही प्रारंभिक पथ से गुजरते हुए हर व्यक्ति के जीवन की दिशा इतनी अलग-अलग हो जाती है,  जिसकी आदमी उस समय कल्पना भी नहीं कर सकता था जब वह इस सेवा में शामिल हो रहा था.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए मेरे मन में यह ख्याल आया कि मैं ऐसे ही तीस आईपीएस अधिकारियों का चयन करके उनका संक्षिप्त जीवन वृत्त प्रस्तुत करूँ जिन्होंने एक ही प्रारंभिक अवस्था से गुजरते हुए आगे अपने जीवन को बिलकुल ही अलग परिदृश्यों और स्थितियों में पाया. मैंने इस हेतु जो तीस नाम चयन किये हैं यदि उनमें आईपीएस के नामचीन अधिकारी, पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक केपीएस गिल हैं, जो पंजाब के आतंकवाद का सम्पूर्ण नाश करने के जिमेदार माने जाते हैं तो यूपी कैडर के पूर्व एडीजी सीडी कैंथ भी हैं, जिन्हें बरेली में एक पुलिस इन्स्पेक्टर केके गौतम द्वारा रिश्वत मांगने के आरोप में उसी थाने में मुलजिम बनाया गया, जिस थाने के वे उस समय आईजी थे और जिन्हें जीवन के तमाम झंझावातों को झेलते हुए अंत में आत्महत्या तक करने को मजबूर होना पड़ा.

अपनी नौकरी के प्रारम्भ से ही पूरे देश के लिए प्रतिरूप और मिसाल का काम कर रहीं किरण बेदी को देखें, जो आज रिटायर होने के बाद भी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों की रीढ़ बनी हुई हैं तो उसी सेवा में मधुकर टंडन भी रहे हैं, जो एक गरीब नौकरानी के बलात्कार जैसे जघन्य और घृणित अपराध के ना सिर्फ मुलजिम हैं बल्कि एक लंबे समय से भगोड़े और एक लाख के ईनामिया हैं. जी हाँ, एक आईपीएस अधिकारी जिसने अपनी सेवा के दौरान ना जाने कितने अपराधियों पर ईनाम घोषित किये होंगे, आज स्वयं ही फरार हैं और उनको ज़िंदा या मुर्दा पुलिस के सामने पेश करने वाले को एक लाख रुपये दिए जाने की घोषणा उसी पुलिस विभाग ने कर रखी है, जिसके वे चुनिन्दा सदस्य थे.

यदि पुलिस विभाग में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और पंजाब के पूर्व डीजीपी जूलियो रिबेरो हैं,  जिन पर सारा मुंबई गर्व करता है और जिन की आवाज़ की बुलंदियां आज भी महाराष्ट्र के शासन और प्रशासन को हिला कर रख देती है तो उसी पुलिस विभाग में उसी पद पर हरियाणा में एसपीएस राठौड भी रहे हैं,  जिन्हें यदि आज कोई याद करता है तो मात्र रुचिका गिरोत्रा नामक पन्द्रह साल की एक अबोध बच्ची के साथ कथित छेड़खानी और उसे आत्महत्या के लिए बाध्य कर देने के आरोपों और अपनी उस मुस्कराहट के लिए जिसने पूरे देश के लोगों के हृदय पर ऐसा जख्म लगाया कि सब एक साथ कराह से गए.

कोई शायद ही विश्वास करे कि आज एक आईपीएस अधिकारी को लोग आईपीएस के रूप में नहीं, साईं बाबा के सच्चे शिष्य और उनके संभावित अवतार के रूप में जानते हैं और गुरूजी के नाम से विख्यात सीबी सत्पथी आज दिल्ली से ले कर देश-विदेश में लाखों-करोड़ों लोगों को जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों और जीवन की सूक्ष्म परिभाषाओं से रूबरू कराते हैं. इससे थोड़े अलग अभयानंद हैं जो हैं तो आईपीएस में पर इनको देशव्यापी ख्याति मिली है एक शिक्षक के रूप में. जी हाँ, आईआईटी जेईई जैसे अत्यंत कठिन परीक्षा के लिए आनंद कुमार के साथ मिल कर पटना में उनके द्वारा शुरू किया गया सुपर थर्टी आज एक ऐसा ब्रांड बन गया है जिसकी धूम हर जगह है.

ये कुछ ऐसी बानगियाँ है उस सेवा की, जिससे एक ही दरवाजे से निकल कर ना जाने कितने ही रास्ते और कितनी ही गालियाँ निकल पड़ीं, जिन्हें स्वयं उस रास्ते का राही भी अपनी यात्रा के प्रारम्भ में नहीं जान रहा होगा.

इन तीस आईपीएस अधिकारियों के परिचयस्वरुप यह पुस्तक मैं लिख रहा हूँ. मेरी पुस्तक में कोई नए रहस्योद्घाटन नहीं होंगे और ना ही इन तीसों अधिकारियों के जीवन का कोई गहन और विषद विश्लेषण होगा,  क्योंकि मैं जानता हूँ कि तीस लोगों के जीवन को उनकी समग्रता और उनकी सत्यता में प्रस्तुत कर सकना अत्यंत दुष्कर कार्य है. इसके विपरीत पुस्तक मूलतया में पाठकों को ऐसे तीस लोगों से परिचित कराते हुए उनके वैसे स्वरूपों और कार्यों को सामने रखने का प्रयास होगा, जिसने उन्हें एक अलग किस्म की पहचान दी- चाहे वह पहचान अच्छे में हो या बुरे में.

इस पुस्तक में माध्यम से जो मूल बात मैं सामने रखना चाहता हूँ वह यह कि व्यक्ति के प्रारब्ध और उसके भाग्य का उसके कर्मों से कोई बहुत सीधा रिश्ता हो यह आवश्यक नहीं. कई बार यह देखा गया कि एक आदमी जीवन भर किसी दूसरी जगह पर रहा पर जब उसके कुछ खास करने का समय आया तो नियति उसे कहीं और ही खींच कर ले गयी. आप जानते होंगे कि केपीएस गिल पंजाब नहीं असम-मेघालय कैडर के थे और आचार्य किशोर कुणाल थे गुजरात कैडर के पर उन्हें बुलंदियां मिलीं अपने गृह प्रदेश बिहार आ कर जहां अब वे धार्मिक और सामाजिक जगत में एक प्रतिमान के तौर पर स्थापित हो चुके हैं.

इन तीस जीवनों के जरिये ना सिर्फ 'कलर्स ऑफ खाकी'  (खाकी के रंग) दिखाने का प्रयास होगा बल्कि जीवन के भी अलग-अलग आयामों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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