पुलिस कांस्टेबल मीनाक्षी की संघर्ष यात्रा

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अमिताभमैं इन दिनों आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (जिसे संक्षेप में ईओडब्ल्यू कहते हैं) के सेक्टर मेरठ में पुलिस अधीक्षक के पद पर कार्यरत हूँ. यहाँ आने के बाद मुझे अपने सरकारी काम के अलावा एक ऐसे घटना से साबका पड़ा जिसने मुझे कई तरह से सोचने को मजबूर कर दिया. वाकया यह है कि इस दफ्तर में मीनाक्षी नामक एक महिला आरक्षी कार्यरत है. बगल के ही मुज़फ्फरनगर के नन्हे सिंह की यह लड़की करीब सात-आठ साल से पुलिस विभाग में है.

परसों जब मैं दफ्तर में बैठा था तो मीनाक्षी मेरे पास आई और कहा कि वह अपनी कुछ समस्या मुझे बताना चाहती है. मुझे लगा कि शायद छुट्टी वगैरह या ट्रांसफर को ले कर मसला होगा क्योंकि आम तौर पर पुलिस के लोग इन्हीं बातों के लिए ज्यादा परेशान दिखते हैं.उसने कहना शुरू किया- 'मेरी शादी आज से छह साल पहले हुई थी. उस समय मैं आगरा में तैनात थी और मेरे होने वाले पति अमित भी. वे दरोगा थे और मैं सिपाही. हम दोनों के बीच प्रेम हो गया और फिर इसके बाद शादी. प्रेम विवाह होने के नाते मेरे पति के घर वाले कभी भी मुझे पसंद नहीं करते थे, लिजाहा उन्होंने शुरू से ही मुझे प्रताडित करना शुरू कर दिया था. अमित के पिता, उसकी माँ और उसके भाई ना सिर्फ मुझे ताने देते थे बल्कि मेरे पति को भी इस तरह के आचरण के लिए भड़काते थे. आगे चल के मेरे पति को शराब पीने की आदत हो गयी और वे मुझे शराब के नशे में धुत्त हो कर काफी मारना पिटना शुरू कर दिए. कभी-कभी तो मेरी सास और मेरे देवर भी अकेले में मुझ पर हाथ छोड़ देते. मेरे पति मुझे हाथ-पाँव के अलावा बेल्ट, जूते या किसी भी अन्य सामन से मारते-पिटते.'

मीनाक्षी ने आगे कहा- ' मैं यह मार-पीट कई सालों तक सहती रही. वे लोग हमेशा मुझे कहते कि मैं अपनी नौकरी छोड़ दूँ पर मुझे लगता कि यदि मैं नौकरी भी छोड़ दूंगी तो मेरी आर्थिक आजादी तक खत्म हो जायेगी. जब मैं पुलिस में कॉन्स्टेबल हूँ तब तो इतना परेशान करते हैं, इसके हटने के बाद पता नहीं क्या करें. फिर भी इन लोगों के कहने से मैं शादी के बाद करीब ढाई साल तक अलग-अलग तरह की छुट्टी ले कर घर पर ही रही. इस दौरान मेरी पिटाई बदस्तूर जारी रही. अंत में आजिज आ कर मैंने नौकरी शुरू कर दी. इसी बीच एक बार अमित ने मुझे इतना अधिक मारा जो मेरे लिए असह्य हो गया. मैंने तुरंत अपना मेडिकल कराया और मारपीट की कई धाराओं के अंतर्गत मु0अ0सं0-29/2009 थाना दौराला, मेरठ में पंजीकृत कराया. मैं अपने पति अलग जा कर भी रहने लगी थी पर उसने आ कर मुझसे माफ़ी मांग ली और मेरा दिल पसीज गया. मैं फिर से उसी घर में रहने लगी.'

आगे मीनाक्षी ने कहा- 'मेरे घर आने के बाद एक महीना तो सब ठीक रहा पर उसके बाद मेरे सास-ससुर, देवर और पति मिल कर उसी तरह का व्यवहार करने लगे. पति ने फिर से भारी मात्र में शराब पी कर मारना-पीटना शुरू कर दिया. अब दो दिन पहले मेरे पति ने फिर शराब के नशे में धुत्त हो कर इतना मारा है कि मैं अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही.' इतना कह कर मीनाक्षी सिसक कर रोने लगी. मैंने भी देखा तो उसके चेहरे पर बहुत गहरा घाव साफ़ दिख रहा था. उसने हाथ पर भी ऐसा ही गंभीर घाव दिखाया और बताया कि ऐसे ही निशान शरीर पर अन्य स्थानों पर भी हैं.

मैंने यह सब सुन कर मीनाक्षी को व्यक्तिगत हैसियत से दो राय दिए-

1. अपने पति और दूसरे दोषी लोगों के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करावे.

2. अपने पति से तलाक ले लेवे.

मैंने उसे कहा कि यद्यपि यह एक दुष्कर रास्ता होगा और इसमें कई सारी मुसीबतें भी आएँगी पर फिर भी उसकी खुद की स्वतंत्र जिंदगी किसी भी जिल्लत की जिंदगी से बेहतर होगी. मैंने इतना और कहा कि मैं अपनी व्यक्तिगत हैसियत भर उसकी मदद जरूर करूँगा पर यह लड़ाई उसे अपने दम पर लड़नी होगी. मैंने यह साफ़ कर दिया कि कोई भी आदमी दूसरे के बल लड़ाई नहीं लड़ सकता. यदि उसमे इस बात की हिम्मत है कि वह हर स्थितियों में अमित कुमार का सामना कर सकती हो तब ही वह मेरे बताए हुए रास्ते पर आगे बढे़.

मुझे यह देख कर बहुत सुखद अनुभूति हुई जब मीनाक्षी ने साफ़ कहा कि वह हर तरह से संघर्ष करने को तैयार है, हर तरह की कठिनाई झेलने को तैयार है पर अब वह इस तरह से मारपीट बर्दाश्त नहीं करेगी. मैंने स्वयं मीनाक्षी को एक एफआईआर लिखने में मदद की, दौराला के थानाध्यक्ष से मुकदमा लिखने के बारे में बात किया और एफआईआर लिखवाया.

आज मेरे पास अमित कुमार भी आया और उसने दुनिया भर की सफाई देते हुए मुझसे यह निवेदन किया कि वह तलाक लेने को तैयार है, बस मीनाक्षी अपने मुकदमे से दहेज की धाराओं को हटा ले. बातों ही बातों में उसने मीनाक्षी को ऐसा नहीं करने पर अपनी ओर से भी परेशान करने की बात कही. साथ ही यह भी जोड़ दिया कि वह मीनाक्षी को मारने-पिटने को इसी से बाध्य हो जाता है क्योंकि मीनाक्षी का चरित्र ठीक नहीं है. उसने एक काबिलेगौर बात कही-' सर, आप तो जानते ही हैं कि औरत की जुबान और मर्द का हाथ चलता है.'  मेरी निगाह में यह पुरुष मनोवृत्ति और हमारी पारंपरिक सोच का एक बहुत ही जीवंत इदाहरण है.

उसने बाद में मीनाक्षी से यह भी कहा कि अब वह भी मीनाक्षी के खिलाफ मुकदमा लिखवाएगा. मीनाक्षी ने उससे कहा कि वह जेल जाने को तैयार है, मरने को तैयार है पर अब वह उस जिल्लत भरी जिंदगी में दुबारा नहीं जायेगी. मैं जानता हूँ कि अभी यह मीनाक्षी के जीवन की मात्र एक नयी शुरुआत है. मैं यह नहीं जानता मैं कब तक उसकी मदद कर पाऊंगा. यह भी नहीं जानता कि उसका पति उसे किस हद तक परेशान करने की कोशिश करेगा. पर एक बात जो मैं अवश्य जानता हूँ कि मीनाक्षी ने अपने जीवनपथ के इस मोड़ पर जो निर्णय किया है वह बहुत ही प्रशंसनीय और सराहनीय है. एक अकेली महिला होने और एक ताकतवर शत्रु के होते हुए भी अपने पैरों पर खड़े होने का जो भाव उसमे जगा है, चाहे मेरे कहने से अथवा स्वयं से, वह मेरी निगाह में एक साहसिक कदम है.

मेरा बहुत साफ़ मानना है कि नारी की शक्ति और नारी उत्थान की दिशा में पहला कदम स्वयं नारी ही उठा सकती है. यदि वह संघर्ष का रास्ता चुनने तो तैयार है तो आज नहीं तो कल उसे अपनी मंजिल मिलने की पूरी उम्मीद रहेगी. अगर ऐसा नहीं भी हुआ तब भी तो कम से कम इस बात का संतोष और गर्व तो रहेगा कि मैंने अन्याय का प्रतिकार किया और अपने अस्तित्व के लिए जायज संघर्ष किया.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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