मायावती ने सचिव विजय सिंह के गलत आदेश को किया रद्द

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डा. नूतनमेरे पति और 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ जी ने एक लम्बे समय से अपने तमाम सेवा सम्बंधित मामलों में अपनी लड़ाई लड़ने का काम जारी रखा है. हम सब जानते हैं कि यह एक मुश्किल रास्ता है और इसमें समय भी बहुत अधिक लगता है. हम यह भी जानते हैं कि कोर्ट में मामलों का शीघ्र निस्तारण नहीं हो पाता, वर्षों लग जाते हैं. इसकी तुलना में सरकार यदि चाहे तो काम आनन-फानन में हो जाते हैं.

यह सभी जानते हैं कि अव्वल तो कोर्ट में जल्दी आदेश नहीं होते, यदि आदेश हो भी गए तो उनका अनुपालन नहीं होता. जब अनुपालन करने वाला उन्हें लागू ही नहीं करना चाहता तो वे भला कैसे लागू हो जायेंगे. फिर इन आदेशों के लागू नहीं होने पर आदमी कोर्ट दुबारा दौड़ता है, इस बार कंटेम्प्ट पेटिशन लिए. उन कंटेम्प्ट पेटिशन पर सालों बहस चलती है और अंत में जा कर कहीं मामले में कोई परिणति निकल पाती है. खुद मेरे पति अमिताभ जी के दो साल के अध्ययन अवकाश के मामले में वे अब आईआईएम से लौट आये हैं, कैट और हाई कोर्ट ने आदेश कर दिया है, कैट में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का मुक़दमा चल रहा है लेकिन सरकार है कि इस पर कुंडली मारे बैठी है.

ऐसे में यदि कोई आदमी इन सारी जमीनी हकीकतों से वाकिफ होते हुए भी अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है और इसका अच्छा और बुरा झेलने को तैयार है, तो मेरी निगाह में यही अपने आप में बड़ी बात है. फिर यदि इस लड़ाई में गाहे-बगाहे कोई सफलता हाथ लग जाए तब तो कहना ही क्या? ऐसा ही कुछ अमिताभ जी के मामले में हाल में हुआ है. दरअसल उन्होंने उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के लखनऊ खंडपीठ में एक रिट याचिका संख्या 8 / 2011 (एस/बी) दायर किया था. अपने रिट याचिका में उन्होंने कहा था कि उनके सेवा सम्बंधित कई मामलों में मुख्यमंत्री मायावती के स्थान एवं उनके नाम पर सचिव विजय सिंह द्वारा ही फाइलों पर मुख्यमंत्री के नाम पर स्वयं आदेश निर्गत कर दिए जा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि विजय सिंह द्वारा किये जा रहे इन विधि-विरुद्ध आदेशों के कारण उन्हें नुकसान हो रहा है.

अमिताभ जी ने इस सम्बन्ध में तीन विशेष दृष्टांत प्रस्तुत किये थे. इनमे दो प्रकरण उनके साल 1998-1999 तथा 1999-2000 में जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित दो एसीआर में दी गयी प्रतिकूल प्रविष्टियों से सम्बंधित थे और तीसरा मामला उनके दो वर्षों के अध्ययन अवकाश से सम्बंधित था. इन प्रतिकूल प्रविष्टियों की अपनी एक अलग लंबी कहानी है कि किस तरह उन्हें उनके अन्य सीनियर अफसर की बात नहीं मानने के एवज में ऐसा एसीआर मिला जैसा आज तक शायद ही किसी आईपीएस अफसर को मिला होगा. अभी इन एसीआर के बारे में भी अमिताभ जी ने कैट के लखनऊ बेंच में मुक़दमा कर रखा है जो पिछले तीन सालों से लंबित है.

अपनी इस रिट याचिका में अमिताभ जी का यह कहना था कि विजय सिंह द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र के परे जा कर अपने ही स्तर पर जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित एसीआर के मामलों में पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश को पलट दिया गया है, जिसमें उन्होंने प्रतिकूल प्रविष्टियों को विलोपित करने का आदेश दिया था. साथ ही आईआईएम में पढ़ाई के लिए मांगे गए अध्ययन अवकाश के मामले में जबकि विभागीय प्रमुख सचिव मंजीत सिंह ने अध्ययन अवकाश देने की स्पष्ट संस्तुति की थी, विजय सिंह ने उसके विपरीत आदेश निर्गत कर दिए थे.

इस रिट याचिका में उच्च न्यायालय के दो जजों जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस डॉ. सतीश सिंह ने दिनांक 06 जनवरी 2011 को आदेशित किया था कि अमिताभ जी द्वारा संयत भाषा में नियमों के परिप्रेक्ष्य में एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जाए, जो उनके प्रकरणों में आदेश पारित करने हेतु सक्षम अधिकारी होने के नाते स्वयं मुख्यमंत्री के सामने रखा जाए. उच्च न्यायालय ने यह भी आदेश दिए कि उक्त प्रार्थना पत्र का निस्तारण मुख्यमंत्री के स्तर से चार सप्ताह के अंदर कर दिया जाए.

अमिताभ जी द्वारा इस आदेश के मिलने के बाद दिनांक 04 फरवरी 2011 को मुख्यमंत्री को अपनी पूरी बात लिखते हुए एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया. इस प्रार्थना पत्र और पूर्व में दिए गए तमाम प्रत्यावेदन के आधार पर मुख्यमंत्री मायावती ने मामले पर विचार किया और उन्होंने अमिताभ की बात सही पाए जाने पर 26 अप्रैल 2011 के आदेश द्वारा उनके वर्ष 1999-2000 में जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित एसीआर में दी गयी प्रतिकूल प्रविष्टियों को विलोपित कर दिया. शेष दो प्रकरण संभवतः अभी लंबित हैं.

इस तरह अमिताभ जी को ना सिर्फ एक सफलता मिली है बल्कि उनके द्वारा विजय सिंह के विरुद्ध लगाया गया आरोप भी काफी हद तक सही सिद्ध हुआ है जब स्वयं मुख्यमंत्री मायावती ने अपने सचिव द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया है और अमिताभ जी की बात की पुष्टि की है.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल'स फोरम, लखनऊ


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