किसानों का खून बहाकर मायावती ने दिखाया अपना क्रूर चेहरा

E-mail Print PDF

बीपीआस्था, श्रद्धा और भावनाओं का कोई मूल्य होता है क्या? कानून के दायरे में ही, क्या कुछ भी करना एक दम सही होता है? आस्था, श्रद्धा व भावनाओं के लिए अगर कोई कानून के विरोध में खड़ा हो जाता है, तो क्या वह अपराधी है और ऐसे अपराधी के साथ तानाशाही व्यवहार करना चाहिए? ऐसे सवाल इस लिए उठ रहे हैं कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक प्रणाली के दायरे में होने के बावजूद लोक की भावनाओं पर लगातार कुठाराघात किया जा रहा है।

जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने में कोई पीछे नहीं है। समय-समय पर सभी जनभावनाओं को नजर अंदाज करते देखे जा सकते हैं। हाल-फिलहाल एक्सप्रेस-वे की ही बात की जाये, तो सभी विकास की बात तो करते दिख रहे हैं, लेकिन उस किसान की बात कोई नहीं कर रहा, जिसके लिए उसकी जमीन मां होती है और बेटे के लिए मां की कोई कीमत नहीं होती। मां के खरीदने, बेचने या छीनने की तो बात ही छोडिय़े, मां के बगैर जीवन की कल्पना करना भी कठिन हो जाता है, पर यह बात सरकारों में बैठे लोगों की समझ में नहीं आ रही।

सवाल यह भी है कि आप विकास किस के लिए करना चाहते हैं, जनता के लिए ही न, तो जनता की भी व्याख्या की जायेगी क्या? अधिग्रहण का जो लोग विरोध कर रहे हैं, वह किसान जनता नहीं हैं क्या और अगर हैं, तो उनके विरोध पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं होना चाहिए? पीढिय़ों दर पीढिय़ों से जो जमीन उन्हें पालती आ रही है और जिस जमीन की जो लोग सेवा करते आ रहे हैं, वह जमीन कागज के कुछ रुपयों के लिए कैसे दी जा सकती है? जमीन देना बेहद जरूरी भी है, तो सरकार की नीतियों में एकरूपता क्यों नहीं है? एक्सप्रेस-वे से जब सरकार व कार्यदायी संस्था को बराबर लाभ होगा, तो किसानों की जमीन के दाम भिन्न-भिन्न क्यूं हैं? जमीन किसान के जीने का सहारा होती है, वह जमीन के सहारे ही पूरा जीवन गुजार देता है। किसान के सपने और आशाएं जमीन से ही जुड़ी होती हैं, जिसे कोई कैसे खरीद सकता है?

पांच वर्ष का वेतन-भत्ता आदि लेकर विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकते हैं क्या, बाकी जीवन का वेतन आदि लेकर आईएएस, आईपीएस अधिकारी या कर्मचारी इस्तीफा दे सकते हैं? अगर नहीं, तो फिर रुपये लेकर किसान ही मां जैसी जमीन को क्यूं दे दें? जमीन किसान के पूरे परिवार के जीवन जीने का आधार होती है और अगर वह आधार ही समाप्त हो जायेगा, तो वह किसके सहारे जीयेगा और क्यूं जीयेगा? यह बात सरकार में बैठे लोगों की समझ में क्यूं नहीं आ रही? किसान अगर बेशकीमती जमीन के बदले में वे पास के ही कामर्शियल भूमि की मांग कर रहे हैं, तो इसमें नाजायज क्या है? किसी के पास नकदी जितनी भी हो, वह कितने दिन साथ दे सकती है? नकदी कब खत्म हो गयी, यह पता ही नहीं चलेगा, फिर किसान क्या करेगा? इसी डर के चलते वह आमदनी का स्रोत चाह रहे हैं, तो इसमें बुरा क्या है?

इस गरीब देश में धनपतियों की कमी नहीं है और कोई बोली लगा कर पूरे देश का ही टेंडर ले सकता है क्या और ले भी ले, तो क्या बाकी जनता को देश छोड़ कर चला जाना चाहिए, क्या ऐसा कानून हो सकता है और अगर हो सकता है, तो उसका पालन कराना संभव हो सकेगा, अगर नहीं, तो यह स्थिति भी वैसी है। किसान के लिए उसका गांव और उसकी जमीन बेहद प्यारी होती है, जिसे छोड़ने की कल्पना करना भी बेहद दु:खदायी होता है, पर सरकार ऐसा ही चाहती है कि जमीन जाने से बेरोजगार हुए किसान रुपये लेकर किसी शहर में जाकर बस जायें, पर उतने पैसे में शहर में जाकर किसान क्या करेगा? इन्हीं सब समस्याओं को लेकर अगर किसान जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं, तो उन्हें विद्रोही करार क्यूं दिया जा रहा है?

सरकार को यह याद रखना चाहिए कि हंसिया, कुल्हाड़ी, लाठी किसान के पास जरूरत के लिए रहती है, पर यही सब, जब हथियार बनते हैं, तो क्रांति आती जाती है, इस लिए बहुमत की सरकार होने के दंभ से बाहर आकर मुख्यमंत्री मायावती को किसानों की मूल समस्या पर भी ध्यान देना चाहिए, वरना हालात असहनीय भी हो सकते हैं, जिसका फिर कोई उपचार नहीं होगा। दुर्भाग्य की बात यह भी है कि जनता की आवाज कोई नहीं सुनता, लेकिन उसी मुददे से अगर कोई नेता, दल या प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता जुड़ जाता है, तो देश में हाहाकार मच जाता है, पर इस तरह के मुददों से कोई नहीं जुडऩा चाहता, क्योंकि देश के नामचीन धनपतियों व उद्योगपतियों से अधिकांश दल या नेता चंदे के रूप में मोटी रकम लेते हैं। यही वजह है कि छोटी-छोटी बातों पर सदन की कार्रवाई बाधित कर देने वाले विधायकों या सांसदों को किसानों की समस्या नजर ही नहीं आ रही है, इसी लिए दादरी ओवरव्रिज प्रोजेक्ट हो, चाहे घोड़ी-बछेड़ा, साकीपुर, डाढ़ा, अंबुजा कंपनी, अंसल सिटी, हाईटेक सिटी या गंगा-यमुना एक्सप्रेस-वे का मुद्दा हो या बांध से संबधित मुददे रहे हों, जीत सरकार की ही होती है, क्योंकि जनहित के मुद्दों पर आम आदमी का संग कोई नहीं देता।

विकास के लिए जमीन बेहद जरूरी है, पर किसानों के हितों की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, इसलिए जमीन जाने से बेरोजगार होने वाले किसानों को रोजगार देने की पर्याप्त व्यवस्था करनी ही होगी, वरना कोई भी कानून या बंदूक आम आदमी की आवाज को दबा नहीं पायेगी। जनता अंतिम सांस तक शोषण सहती है, पर जिस दिन उठ कर खड़ी हो जाती है, उस दिन तानाशाहों के लिए तख्त पलट देती है, मायावती की बसपा सरकार तो बहुत छोटी बात है, इसलिए मायावती को भी समय रहते किसानों के हितों पर गंभीरता से विचार कर क्रियान्वयन कर ही देना चाहिए, वरना इतिहास में एक क्रूर महिला शासक के रूप में नाम दर्ज हो सकता है, जो किसी के लिए भी सम्मान की बात नहीं होती।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. जनपक्षधर एवं शुचितापरक पत्रकारिता के हिमायती हैं तथा सभी विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.


AddThis