ओसामा के माफिक 'तेवतिया' के पीछे पड़े माया के वर्दीवाले गुंडे

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वेस्ट यूपी के ग्रेटर नोएडा, अलीगढ़, मथुरा और आगरा के किसान हक के हवन कुंड में जल रहे हैं। खाकी खून की प्यासी हो गई है। बच्चे, बूढ़े, जवान सब पर वर्दी कहर बरपा रही है। जमीन की जंग में समूचे खेत और गांव जलाए जा रहे हैं। सियासत के सपेरें, तपते हुए इस मामले पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने भागे-भागे आ रहे हैं। यहां गिरफ्तारी देने की होड़ मची है। ऐसा लग रहा है, जैसे गिरफ्तारी के बाद मिलने वाले प्रसाद से इन सभी को मोक्ष मिल जाएगा।

इनाम की घोषणा कर ओसामा की माफिक यूपी पुलिस कथित किसान नेता 'तेवतिया' को ढूढ़ रही है। अपनी मांग को लेकर विद्रोह करने वाले शख्स को अपराधी घोषित कर दिया गया है। इस शख्स की पत्नी का कहना है कि, उसका पति अपराधी नहीं समाजसेवी हैं। यदि वह अपराधी हैं, तो अन्ना और केजरीवाल क्या हैं? पुलिस इलाके में डेरा डाले हुए है। उनके आतंक का आलम यह है कि किसान गांव छोड़कर भाग गए हैं। इस रवैये से साफ जाहिर हो रहा है कि मायावती के वर्दीवाले गुंडों ने आंदोलनकारी किसानों को सबक सिखाने का फैसला कर लिया है।

उदाहरण पेश करना चाहती है सरकार : कोशिश है कि किसानों का ऐसा दमन करो कि मिसाल कायम हो जाए। फिर कोई दूसरा सरकार के खिलाफ सर उठाने की कोशिश ना करें। जैसा अमेरिका ने ओसामा को मारकर विश्व के सामने एक उदाहरण पेश किया कि हमसे पंगा लोगे तो ऐसा ही होगा, कुछ इसी तरह यूपी सरकार तेवतिया को पकड़ कर उदाहरण देना चाहती है।

विकास के नाम पर कत्ल : पश्चिम उत्तरप्रदेश के विभिन्न इलाकों में अधिग्रहण और उसके विद्रोह का मामला कोई नया नहीं है। दिल्ली के फैलने के साथ आस-पास के इलाकों में शहरी क्षेत्र बसाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इस क्षेत्र के लोगों की जरूरत पूरी करने के लिए सड़क और उद्योग बसाने के लिए जमीन की जरूरत पड़ी। ऐसे में पहले नोएडा फिर ग्रेटर नोएडा का जन्म हुआ।

वेस्ट यूपी के इलाके की धरती सोना उगलती है। हरित क्रांति को सफल बनाने में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही है। इस उपजाऊं धरती को किसानों से छीनकर सरकार कंक्रीट का जहां बसाना चाहती है। सरकार ने बिल्डरों, रीयल इस्टेट कंपनियों और देशी-विदेशी बड़ी कंपनियों के हक में किसानों के खिलाफ एक तरह से हल्ला-बोल दिया है। सीधे-सीधे सरकार की अगुवाई में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन लूटी जा रही है।

क्या करें किसान : पेट मार लात मार रही सरकार से झल्लाये किसान विद्रोह ना करें तो क्या करें? विकास के नाम पर किसी की रोजी-रोटी छीनने की कोशिश की जाएगी तो यही हाल होगा। इन इलाकों के किसानों का कहना है कि मुआवजा तो एक समय तक चलता है, फिर इसके बाद का क्या होगा। कुछ किसानों का कहना है कि मुआवजा मिलने से हमारी आगामी पीढी़ भी खराब हो रही है। अचानक आए धन का नकारात्मक प्रभाव इन पर पड़ रहा है।

दलाली ना करे सरकार : यहीं, कुछ किसानों का मानना है कि, यदि विकास के लिए जमीन की जरूरत है तो उन्हें मुआवजा बाजार भाव के हिसाब से दिया जाए। सरकार जमीन की दलाली छोड़ दे। किसान, व्यापारियों से सीधे डील करना चाहते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों सरकार को इससे आपत्ति है? अपनी ताकत की बदौलत वह किसानों की आवाज दबाना चाहती है।

कहीं लीबीया और मिश्र जैसा ना हो जाए हश्र : यूपी सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि जब आवाम ठान लेती है तो बड़ी से बड़ी ताकत घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। इसका ताजा उदाहरण लीबीया और मिश्र में हुई क्रांति है। अब समय रहते सरकार को चेत जाना चाहिए, वरना गद्दाफी और मुबारक जैसा हश्र होने में देर नहीं लगेगी।

लेखक मुकेश कुमार दैनिक भास्कर, भोपाल में कार्यरत हैं.


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