आईपीएस अफसरों की इस ट्रेनिंग के निहितार्थ

E-mail Print PDF

अमिताभ: ब्रिटेन और अमेरिका में पुलिसिंग : मैं इन दिनों सरदार वल्लभ भाई पटेल नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद में एक ट्रेनिंग कर रहा हूँ. इसे ''मिड-कैरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम'' कहते हैं. सभी आईपीएस अधिकारियों के लिए यह ट्रेनिंग प्रोग्राम अनिवार्य हो गया है. हमें यह प्रोग्राम कराने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की टीम आई है. इसके साथ अमेरिकी और ब्रिटिश पुलिस अधिकारी भी हैं.

इनके साथ ही कई सारे पुलिस विज्ञान के अकादमिक विद्वान् भी इसमें प्रशिक्षक के तौर पर आये हैं. एक ख़ास विषय जिस पर हम लोगों को काफी कुछ बताया गया वह है ब्रिटिश और अमेरिकन पुलिस की बारीकियां. अब तक हम लोग भी अमेरिका और ब्रिटेन की पुलिस के बारे में विदेशी फिल्मों में ही देखते रहे थे पर पहली बार उनकी कार्यप्रणाली और उनकी आतंरिक व्यवस्था के बारे में इतनी गहराई से जानकारी मिली. वैसे भी इन देशों की पुलिस प्रणाली के बारे में गहरी जानकारी हम लोगों के लिए इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तो हमारे देश की पुलिस व्यवस्था स्वयं अंग्रेजों से ली गयी है और दूसरे ये दोनों देश पुलिसिंग के मामले में विश्व भर में अपनी साख रखते हैं.

जो पहली बात हम लोगों को ज्ञात हुई वह यह कि अमेरिका और इंग्लैण्ड में कई सारे पुलिस बल हैं. जिस तरह हमारे देश में प्रत्येक राज्य का अपना पुलिस बल होता है, उसी तरह अमेरिका और इंग्लैण्ड में काउंटी और प्रोविंस के भी पुलिस बल होते हैं. बल्कि अमेरिका में इससे आगे बढ़ कर म्युनिसिपेलिटी तक के पुलिस बल होते हैं. नतीजा यह कि जहां ब्रिटेन में कुल मिला कर 43 विभिन्न पुलिस ईकाईयां हैं वहीँ अमेरिका में यह संख्या 18,000 है.

इसके अलावा भी कई सारी बातों में हमारे देश की पुलिस अमेरिका और इंग्लैंड की पुलिस से अलग है. सबसे पहली बात तो यह कि इन देशों में पुलिस की त्रिस्तरीय व्यवस्था होती है- एक होम डिपार्टमेंट, दूसरा पुलिस ऑथोरिटी और तीसरा चीफ कौन्सटेबल के अन्दर पुलिस बल.  इसमें चीफ कौन्सटेबल भले ही पुलिस ऑथोरिटी और होम डिपार्टमेंट के अधीन होता है पर अपने दैनिक कार्यों के लिए वह पूर्णतया स्वतंत्र होता है. इस तरह से वहां के बाहरी तत्व पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करते हैं. और यह बात सिर्फ सिद्धांत में नहीं है बल्कि यह व्यवहार में भी होता है.

ऐसा नहीं कि वहां की पुलिस पर जनता का नियंत्रण नहीं होता, बहुत होता है. पर यह नियंत्रण एक व्यवस्था के अंतर्गत होता है. वहां की पुलिस ऑथोरिटी प्रत्येक माह में एक बार पुलिस कमिश्नर के साथ मीटिंग करती है जिसमे पुलिस के कार्यों की पूरी समीक्षा होती है और उनका उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाता है. पर यह मीटिंग गुपचुप बंद कमरों में नहीं होती बालजी खुले में होती है जिसमे पुलिस ऑथोरिटी के सदस्य, जो जनता के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, बैठते हैं और पुलिस के कार्यों का पर्य्वेक्शें और मार्गदर्शन करते हैं. साथ ही वे पुलिस की समस्या भी सुनते हैं और उन्हें अपेक्षित सहयोग भी देने को सतत तैयार रहते हैं.

इस तरह इन देशों के पुलिस तंत्र में सरकारी और राजनैतिक नियंत्रण बहुत कम होता है. एक अन्य बात यह है कि इन देशों में प्रत्येक अपराध दर्ज किया जाता है चाहे वह झूठी सूचना ही क्यों ना हो. वे पुलिस के अधिकारी झूठी सूचना दिए जाने पर उसे दर्ज करने से इनकार नहीं करते, यह अलग बात है कि आगे चल कर वे उस झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ पूरी कानूनी कार्यवाही करते हैं और उन्हें ही कोर्ट में सजा दिलवाते हैं.

इसके साथ ही वहां पुलिस की शिकायतें सुनने के लिए एक पूर्णतया अलग एजेंसी है जिसे इंडिपेंडेंट पुलिस कम्प्लेंट कमिटी कहते हैं. जिस तरह से जनता की अन्य शिकायतें तुरंत दर्ज होती हैं उसी तरह से पुलिस वालों के खिलाफ दी गयी शिकायतें भी तत्काल दर्ज की जाती है और उसमे इंडिपेंडेंट कमिटी द्वारा जांच होती है. यदि कोई अधिकारी शिकायत दर्ज करने में आनाकानी करता है तो आगे चल कर पहले अधिकारी के साथ आनाकानी करने वाले अधिकारी के विरुद्ध भी स्वतः ही जांच होने लगती है.

शिकायतों के दो मुख्य श्रोत होते हैं- एक दो जनता के लोगों द्वारा और दूसरा स्वयं पुलिस  द्वारा घोषित. जी हाँ, इन देशों में पुलिस की यह जिम्मेदारी है कि कतिपय मामलों में स्वयं ही अपने स्तर से सूचना दर्ज करे जिस पर यह इंडिपेंडेंट कमिटी जांच करती है. इनमे एक मसला होता है- पुलिस कॉन्टेक्ट डेथ का. पुलिस कॉन्टेक्ट डेथ का मतलब हुआ कि मृत्यु के पूर्व किसी व्यक्ति का पिछले चौबीस घंटों में किसी भी तरह से पुलिस से संपर्क हुआ हो. इस संपर्क में पूछताछ, बातचीत, इस व्यक्ति के घर पुलिस का जाना, घटना स्थल का निरिक्षण आदि सभी शामिल हैं यदि किसी पुलिसवाले ने स्वयं से इस तरह की सूचनाएं नहीं दी और बाद में ये बातें संज्ञान में आयीं तो उसके लिए अलग से दंड का प्रावधान है.

मैं समझता हूँ  कि ऊपर जो भी व्यवस्थाएं दी गयी हैं वे सभी अपने-आप में अनुकरणीय हैं. यदि हम भी किसी स्तर पर आ कर इन प्रावधानों का पालन करने लगेंगे तो इसके निश्चित तौर पर लाभकारी परिणाम मिलेंगे. बस प्रश्न यह है कि क्या हमारा समाज ऐसी व्यवस्था के लिए तैयार है?

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं.


AddThis