भारत में सबसे अधिक ‘रिटर्न’ देने वाला क्षेत्र है राजनीति

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हरिवंशराजनीतिज्ञ नहीं मानेंगे कि जनता, राजनीतिज्ञों से नफ़रत करने लगी है. कुछ हद तक राजनीति से भी. यह प्रवृत्ति पढ़े-लिखे, उभरते मध्यवर्ग या जिन्होंने पुरानी राजनीति और राजनेताओं को देखा है, उनमें अधिक है. युवाओं में भी. हालांकि शुरू में ही स्पष्ट कर दें कि राजनीति और राजनेता ही हालात बदल सकते हैं. बेहतर या बदतर बना सकते हैं.

माओ का बड़ा मशहूर नारा था ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती या जन्मती है.’ साम्यवादी या नक्सलवादी आज भी इसी दर्शन में यकीन करते हैं. पर लोकतंत्र में यह सत्ता राजनीति के गर्भ से निकलती है. सत्ता या पावर वह शक्ति स्रोत है, जो समाज को बदल सकता है. हालांकि गांधीवादी या सर्वोदयी इससे आगे गये, उन्होंने माना कि सरकार की सत्ता, एक सीमा तक ही बदलाव कर सकती है. यानी राजनीति बाह्य चोला-व्यवस्था ही बदल सकती है. अंदरूनी मन का परिष्कार या बदलाव, सत्ता से नहीं होता. बहरहाल यह बड़ा ‘डिबेट’ है. फ़िलहाल हम यहीं तक सीमित हैं कि भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण तबका राजनीतिज्ञों से नफ़रत करने लगा है. पर यह भी सही है कि बिना राजनीति हालात भी नहीं बदलेंगे.

यह भी सच है कि राजनीतिज्ञ, चाहे वे किसी दल के हों, शायद ही मानें कि लोग राजनेताओं से नफ़रत करने लगे हैं. ऐसे राजनेता तर्क देते हैं कि कहां गिरावट नहीं है? पत्रकारिता में? नौकरशाही में अध्यापन में? आध्यात्मिक गुरुओं में? उनकी कोशिश होती है कि सबको एक तरह एक बराबर साबित कर दें. ऐसे तर्क देनेवाले भूल जाते हैं कि समाज की ड्राइविंग सीट पर राजनीतिज्ञ हैं. अगुआ हैं. महाभारत की भाषा में कहें तो’महाजन’(श्रेष्ठ जन) हैं, जिनके चले रास्ते पर दूसरे चलते हैं. अपनाते हैं. पर लोग क्यों घृणा कर रहे हैं? राजनीति से? इसलिए नहीं कि वहां अपराधी पहुंच गये हैं? ब्लैकमेलर, नायक बनना चाहते हैं? अमर सिंह एंड कंपनी की संस्कृति प्रभावी हो रही है? चीटर, धोखेबाज, चारण, चाटुकार, दरबारी, दलाल, अयोग्य, नासमझ, अप्रतिबद्ध पात्रों की भीड़ राजनीति में बढ़ रही है. ये सब कारण कमोबेश हैं.

इससे भी अधिक है, राजनीति का सिद्धांतहीन बन जाना. और उससे भी अधिक राजनीति का धनार्जन का सबसे प्रभावी मंच बन जाना है. तेज कमाई का माध्यम, नौकरी नहीं, उद्यम उद्योग धंधा नहीं, कारोबार नहीं, बल्कि राजनीति है. यानी जनता के कल्याण के नाम पर राजनीति में उतरना, फ़िर विधायक-सांसद या मंत्री बन ‘पावर’ (सत्ता) पाना और उसका उपयोग निजी आर्थिक क्रांति में करना. गांव से लेकर दिल्ली तक राजनीति करनेवालों में अनेक इस स्थापना के अपवाद हैं. पर माना यही जा रहा है कि राजनीति में घुसकर आप खाकपति से करोड़पति-अरबपति बन सकते हैं.

यह विश्वास अकारण भी नहीं है. संसद में बढ़े करोड़पति सांसदों या विधायिका में धनी लोगों की बढ़ती संख्या ही, इसका प्रमाण नहीं है. सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि सांसदों-विधायकों की संपत्ति में जो बढ़ात्तरी हो रही है या इजाफ़ा हो रहा है, उसकी गति सबसे तेज है. गंवई और सहज भाषा में अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत जानने लायक है. ‘रिटर्न आन इंवेस्टमेंट’ यानी निवेश पर आय. आप या हम बैंक में फ़िक्स डिपोजिट करते हैं. सरकार के डाकघरों में पैसा जमा करते हैं. म्यूचुअल फ़ंड में लगाते हैं. शेयर बाजार में निवेश करते हैं. सोना-चांदी खरीदते हैं क्यों? क्योंकि इससे आज जो पैसा खपाते (निवेश) है, वह 2-4-5-10 वर्षो में कई गुना बढ़ जाता है. सबसे अधिक गति से जिन चीजों में निवेश करने से रिटर्न मिलता है, वे हैं, (1) सोना (2) म्यूचुअल फ़ंड (3) सेंसेक्स (शेयर बाजार) और फ़िक्स डिपोजिट्स. यह मानना हैं, अर्थ या व्यवसाय के माहिर या विशेषज्ञ लोगों का.

लेकिन आर्थिक समझ रखनेवाले महारथी गलत हैं. भारत में सबसे अधिक‘रिटर्न’ देनेवाला क्षेत्र है, राजनीति. याद रखिये सोना खरीद, म्यूचुअल फ़ंड में निवेश, फ़िक्स डिपाजिट में पैसा डालना या शेयर बाजार में पैसा खपाना, ये सब आर्थिक गतिविधियां है. सोना खरीद छोड़कर अन्य तीन क्षेत्रों के निवेश, विकास में‘रिसाइकिल’(पुन:निवेश) होते हैं. यानी यह, आर्थिक गतिविधियों के क्रम (चेन) का हिस्सा है. पर राजनीति? इसका आर्थिक गतिविधियों से कोई प्रत्यक्ष रिश्ता नहीं. यह अमूर्त है. यह पूंजी नहीं है कि जहां जिसको जरूरत हो लिया और उस पर ब्याज या सूद चुकाया. शुद्ध आर्थिक मुहावरे में कहें तो यह‘डेड इंवेस्टमेंट’(निवेश की दृष्टि से मृत या निर्जीव) क्षेत्र है. राजनीति, निवेश का आर्थिक क्षेत्र नहीं है कि जहां पैसा लगाया, और किसी शेयर की तरह उस पर रिटर्न मिला? राजनीति और अर्थनीति दोनों दो क्षेत्र हैं. निवेश और रिटर्न अर्थनीति की दुनिया की गतिविधियां हैं. पर भारत में राजनीति में ही सबसे अधिक रिटर्न का चमत्कार हो रहा है. वैसा ही चमत्कार जैसे कोई बछड़ा, बाछी को जन्म दे. वैसा ही आश्चर्य. यह चमत्कार हमारी स्थापना या मान्यता या कपोल कल्पना नहीं है.

दुनिया में पहचान बना चुकी भारतीय फ़ोरम या संस्थाएं हैं.’एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स’ (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाच (एनइडब्ल्यू). इन्होंने हाल में चार राज्यों में हुए चुनावों का विश्‍लेषण किया है. साथ में लोकसभा चुनावों का भी. इसमें उन्हीं सांसदों/विधायकों का अध्ययन किया गया है, जो एक बार जीतने के बाद दोबारा चुनाव मैदान में थे. पहली बार विधायक-सांसद रहने के बाद दोबारा जब वे प्रत्याशी बने, तो इस अवधि में उनकी संपत्ति में इजाफ़ा या वृद्धि की क्या दर थी? कितने प्रतिशत? पहली बार वे अपनी संपत्ति का ब्योरा दे चुके थे. दोबारा चुनावों में पुन: अपनी संपत्ति का विवरण या ब्योरा दिया. ऐसे लोगों की संपत्ति विवरण का अध्ययन-विश्‍लेषण किया एडीआर और एनइडब्ल्यू के लोगों ने. इसमें अनेक विशेषज्ञ और जाने-माने लोग हैं. इनका निष्कर्ष है कि राजनीति में शरीक लोगों की संपत्ति में सबसे तेज गति से इजाफ़ा हो रहा है. सोने में निवेश की रफ्तार से भी अधिक. इसी तरह म्युचुअल फ़ंड, शेयर बाजार या फ़िक्स डिपॉजिट में रखे गये पैसों पर जो आय होती है, उससे कई गुना अधिक आय राजनीति में शरीक लोगों की पूंजी में हो रही है.

इस विश्‍लेषण के अनुसार पांच वर्षो में सांसदों की पूंजी में 289 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है, तमिलनाडु के विधायकों की परिसंपत्ति में 195%, असम के विधयकों की संपत्ति में 187 फ़ीसदी, केरल के विधायकों की संपत्ति में 175 फ़ीसदी, पुडुचेरी के विधायकों की संपत्ति में 136 व पश्चिम बंगाल के विधायकों की संपत्ति में 71 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. जबकि पांच वर्षो में सोने में निवेश पर रिटर्न रहा है, 138 फ़ीसदी. म्युचुअल फ़ंड्स में 67 फ़ीसदी. सेंसेक्स में 64 फ़ीसदी और फ़िक्स डिपाजिट में 46 फ़ीसदी. इस तरह राजनीति सबसे लाभप्रद धंधा है न ! भारतीय मानस धन कमाना बुरा नहीं मानता. अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष जीवन के चार ध्येय माने गये. पर अर्थ कमाने का रास्ता कौन-सा है? सवाल यह है. राजनीति अर्थ कमाने का माध्यम, पेशा या धंधा नहीं है. इसे सेवा का क्षेत्र माना गया. पर बिजनेस और उद्योग धंधों से कई गुना इसमें आमद है, कैसे? नेता नहीं कह-बता सकते सच, इसलिए राजनीति से लोग नफ़रत करने लगे हैं. इसका घोषित मकसद है, सेवा पर प्रच्छन्न या परोक्ष ध्येय है, सबसे अधिक कमाई. पांच राज्यों के हुए विधानसभा चुनावों में 31 करोड़ रुपये आयकर ने नगद जब्त किये, नेताओं से.

किसी पश्चिमी चिंतक ने कहा था, जिस समाज में युवा या कोई तबका बिना श्रम किये, धनार्जन करने लगे, उसका भविष्य नहीं होता. राजनीति के पास ‘पावर’ रूपी हथियार है, इस प्रभामंडल से वह अर्थ, उद्योग, नीति निर्माण वगैरह क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती है. देश से लेकर विदेशी बैंकों तक धन बढ़ाती- जमा करती है. राजनीति की साख लौटाने के लिए, यह प्रक्रिया-प्रवृति रुके, यह जरूरी है.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं और बिहार-झारखंड के अग्रणी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर अखबार से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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