एसपी ने कहा- डीजीपी साहब ढंग से बात करिए

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संजय शर्मा पूरी जिंदगी अपनी बेबाकी और तेज-तर्रार जीवन शैली के लिए मशहूर रहे उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कमरवीर सिंह ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भरी मीटिंग में कोई नौजवान पुलिस अफसर उन्हें इस हद तक खरी-खरी सुना सकता है। मगर अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले शायद यूपी में इन डीजीपी को यह शर्मनाक दिन भी देखना था।

यह वाकया घटा प्रदेश के सभी पुलिस अफसरों के सामने और इस वाकये के घटने के बाद सन्नाटे में आये सभी अफसर मीटिंग के बाद सिर्फ इसकी चर्चा करते नजर आये। दरअसल प्रदेश के सभी एसपी, डीआईजी तथा आईजी की मीटिंग प्रदेश मुख्यालय पर बुलायी गई थी। इस मीटिंग में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के अलावा प्रमुख सचिव गृह समेत बड़ी संख्या में अफसर मौजूद थे। डीजीपी अपने सभी मातहतों को कानून व्यवस्था से जुड़ी बारीकियों को विस्तार से समझा रहे थे। वह इस बात से बेहद नाराज थे कि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में अपराधों का ग्राफ कम नहीं हो रहा।

इसी कड़ी में उन्होंने जिले के अफसरों को लताडऩा शुरू किया कि वह कानून व्यवस्था का पालन सही से नहीं करवा रहें हैं और इसी कारण से अपराध बढ़ते चले जा रहे हैं। उन्होंने इस बात पर भी गहरी नाराजगी जाहिर की पुलिस अधिकारी अनावश्यक रूप से राजनेताओं के दबाव में काम कर रहे हैं जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो गई है। इससे पहले प्रमुख सचिव गृह भी इसी मामले को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके थे।

इसके बाद डीजीपी ने कानपुर देहात के एसपी आशुतोष को भरी मीटिंग में फटकारना शुरू कर दिया। उन्होंने एसओजी प्रभारी के रूप में एक ऐसे इंस्पेक्टर की पोस्टिंग कर दी थी जिसकी सामान्य छवि खराब थी और उसकी चरित्र पंजिका में भी प्रतिकूल प्रविष्टि थी। डीजीपी ने बाकी सब एसपी की नाराजगी भी इसी मामले को लेकर निकालनी शुरू की और कहा कि यह घटना बेहद शर्मनाक है। जब फटकार ज्यादा हो गई तो एसपी ने पलटकर भरी मीटिंग में डीजीपी से कहा कि आप मुझसे कायदे से बात कीजिये और आपको जो करना हो वह कर लीजिये।

इस वाकये के बाद पूरे हाल में सन्नाटा छा गया। सम्भवत: प्रदेश के इतिहास में यह पहली घटना थी जब भरी मीटिंग में किसी एसपी ने डीजीपी को इस तरह जवाब दिया हो। सभी को उम्मीद थी कि अब यह मामला बेहद तूल पकड़ेगा मगर अप्रत्याशित रूप से सभी वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मामले पर चुप्पी साध ली। लोग यह मान रहे थे कि चौबीस घंटे के अंदर आशुतोष को प्रदेश की सबसे खराब जगह पर पोस्ट किया जायेगा,  मगर घटना के कई दिन बीतने पर भी उनका तबादला न होना उनकी हैसियत और डीजीपी के कमजोर होने की बात दर्शाता है।

दरअसल जिस इंस्पेक्टर को वहां पोस्ट किया गया उसे एक स्थानीय विधायक बेहद चाहते थे और उन्हीं के कारण यह तैनाती की गई। मगर जब तैनाती हुई और इस इंस्पेक्टर की कारगुजारी वरिष्ठ अधिकारियों को पता चली तो उन्होंने एसपी को कड़ा किया। इसके बाद एसपी ने विधायक महोदय को बता दिया कि वरिष्ठ अधिकारी नहीं चाहते कि यह पोस्टिंग की जाये। इस पूरे वाकये की जानकारी जब शासन को हुई तो उसकी परिणति डीजीपी की नाराजगी के रूप में निकली जिसके बाद एसपी ने उनको टका सा जवाब दे दिया।

इस वाकये की चर्चा पूरे प्रदेश के अफसरों में होती रही। अफसरों ने आशुतोष के इस कदम की सराहना की। बड़े अफसर इस बात से भी खुश थे कि वह भरी मीटिंग में डांट सुनते रहते हैं और कुछ कह नहीं पाते जबकि 2001 बैच के बेहद जूनियर अफसर ने डीजीपी को दिखा दिया कि जिले की पोस्टिंग में अब डीजीपी की कोई खास हैसियत नहीं रह गई है। मगर इस वाकये से पुलिस की दयनीय स्थिति सबके सामने आ गई है।

लम्बे समय से प्रदेश में डीजीपी की पोस्ट बेहद कमजोर हो गई है। वह अपने मन से जिलों में एसपी या रेंज में डीआईजी तक तैनात कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। आईएएस और आईपीएस अफसरों में तनाव लम्बे समय से चलता आ रहा है। उत्तर प्रदेश में अप्रत्यक्ष रूप से प्रमुख सचिव गृह के अधीन ही डीजीपी को कर दिया गया है। इस बात से आईपीएस बेहद नाराज है मगर लम्बे समय से आईपीएस एसोसिएशन की कोई बैठक नहीं हुई है,  जिसके कारण आईपीएस अफसर अपना दुख-दर्द किसी से बयां करने की स्थिति में भी नहीं है।

यह बात सभी मानते हैं कि अगर इस तरह भरी मीटिंग में एसपी डीजीपी को जवाब देंगे तो विभाग में भारी अनुशासनहीनता हो जायेगी। साथ ही यह भी देखना होगा कि वरिष्ठ अधिकारी बिना राजनीतिक दबाव के अपने जूनियर अफसरों को कितना संरक्षण दे पाते हैं। इस वाकये के बाद पुलिस के आला अफसर मीडिया मैनेजमेंट में जुट गये। वह कोशिश कर रहे थे कि किसी भी कीमत पर यह खबर अखबारों में न छपे क्योंकि इससे डीजीपी और पुलिस विभाग की खासी किरकिरी हो जायेगी। हालांकि वह अपने मकसद में कामयाब भी हो गये और किसी भी अखबार ने व्यवस्था को तोडऩे वाली इस खबर को नहीं छापा।

अब देखना यह है कि पुलिस कांस्टेबिल लेकर इंस्पेक्टर तक के कर्मचारियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले आला अफसर अपने मातहतों की इस अनुशासनहीनता से कैसे निपटेंगे। जिले में तैनात एक तेज तर्रार एसपी का कहना है कि थानाध्यक्ष से लेकर इंस्पेक्टर तक की तैनाती के लिये मुख्यालय से फोन आता है,  तब यह बात आला अफसरों को क्यों समझ में नहीं आती कि इतने बड़े पद पर बैठकर जब वह विधायकों के सामने जिले में थानाध्यक्ष तैनात करने के लिये फोन करेंगे तो एसपी किस हैसियत से राजनेताओं को मना कर पायेंगे।

लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्‍स के संपादक हैं. आप इस लेख पर अपनी राय 9452095094 पर एसएमएस कर सकते हैं.


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