ब्रिटेन में पुलिस से हमें क्या सीखने की जरूरत है?

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अमिताभ आजकल पुलिस की ट्रेनिंग के परिप्रेक्ष्य में यूके आया हुआ हूँ और वर्तमान में मैनचेस्टर में हूँ. यहाँ से आगे कैम्ब्रिज जाना है जहां कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलोजी में ट्रेनिंग होगी. सैद्धांतिक ट्रेनिंग तो अपनी जगह है ही पर जो सबसे लाभप्रद और जरूरी जानकारियाँ मिल रही हैं वह तो फील्ड में ही है.

इस मामले में भारत ही नहीं पूरे विश्व की पुलिस में काफी समानता है क्योंकि अंततोगत्वा किसी भी देश में पुलिस तो वही मानी और जानी जाती है जो फील्ड में नज़र आये और जिसका जनता से सीधा सरोकार हो. हमें इस रूप में ग्रेटर मैनचेस्टर के रोशडेल और बरी इलाके की पुलिस से रूबरू होने और उनके साथ संपर्क में आ कर उनकी स्थितियों-परिस्थितियों के बारे में जानकारी हासिल करने का अवसर मिला जिसने हमें बता दिया कि हम वास्तव में अभी ब्रिटेन से कई मामलों में काफी पीछे हैं. जब हम रोशडेल डिविजन हेडक्वार्टर में ले जाए गए तो हमें लगा जैसे कि हम दिल्ली पुलिस मुख्यालय में आ गए हों. पांच-छह मंजिले इस बड़े से इमारत में रोशडेल पुलिस के सभी विंग्स के दफ्तर हैं,  लेकिन यह हमारे किसी भी जिले, रेंज और ज़ोन के कार्यालयों से बहुत बड़ा और विशाल है.

पूरा मैनचेस्टर शहर ऐसे बारह डिविजन में बंटा हुआ है. इस दफ्तर के बाहर हमें कम से कम डेढ़ दर्ज़न पुलिस की सरकारी गाडियां नज़र आती हैं जो आज के जमाने की बेहतरीन गाडियां हैं. इनमे मर्सिडीज भी है, वोल्वो भी, मिनी बस और बड़ी बसें भी, कई तरह के ट्रक भी, बख्तरबंद गाडियां भी. इसके अलावा अलग-अलग किस्म के कई प्राइवेट कार पुलिस ऑफिस कैम्पस में खड़े हैं जो वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों के हैं. यदि मैं इस दफ्तर की तुलना अपने देश की पुलिस व्यवस्था से करूँ तो इसे एक तरह से एसएसपी के दफ्तर की तरह माना जा सकता है पर दोनों जगहों के साधन-संसाधन में जमीन आसमान का अंतर है.

यह तो हुई बाहर की स्थिति. अब यदि दफ्तर के अंदर चलते हैं तो ना जाने कितने सारे बड़े और छोटे कमरे नज़र आते हैं जिनमे चुस्त-दुरुस्त कपडे़ पहने पुरुष और महिला पुलिसकर्मी काम कर रहे हैं या एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते दिख रहे हैं. इस पूरे दफ्तर के मुखिया चीफ सुपरिंटेंडेंट रैंक के एक अधिकारी हैं और उनके अधीन एक सुपरिंटेंडेंट, कुछ चीफ इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर, कई सारे सार्जेंट और बहुतायत में कॉन्स्टेबल काम करते हैं. पूरे ब्रिटेन में पुलिस में भर्ती केवल कॉन्स्टेबल स्तर पर ही होती है और इन्हीं में से कुछ लोग आगे चल कर प्रोन्नति पाते हुए ऊपर के पदों पर आते हैं. लगभग पूरा पुलिस महकमा कॉन्स्टेबल और सार्जेंट पर आधारित है क्योंकि यही लोग बहुतायत में हैं. इस रूप में ब्रिटेन और भारत की स्थिति में कोई बहुत अंतर नहीं है पर जो सबसे बड़ा अंतर है वह है भारत के कॉन्स्टेबल और ब्रिटेन के कॉन्स्टेबल में. ऐसा नहीं है कि ब्रिटेन में कॉन्स्टेबल की भर्ती कोई बहुत ऊँची डिग्री के बाद होती है.

हकीकत तो यही है कि कॉन्स्टेबल पद के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता ही नहीं है पर यदि आप ब्रिटेन की पुलिस फ़ोर्स के एक कॉन्स्टेबल से मिल लेंगे तो आपको लगेगा कि वह हिंदुस्तान के कई सारे सब इन्स्पेक्टर और इंस्पेक्टर से बेहतर हैं. पहली बात तो यह कि इनमे से कोई भी कॉन्स्टेबल तथा सार्जेंट ऐसे नहीं दिखेंगे जैसे ये किसी निम्न पद पर हों. उनमे आत्म सम्मान की गहरी भावना होगी और वह साफ़ परिलक्षित भी हो जायेगी. जब हम रोशडेल पुलिस ऑफिस पहुंचे थे तो हमें स्वागत करने एक सार्जेंट और एक कॉन्स्टेबल आये थे,  पर दोनों की स्मार्टनेस और कॉन्फिडेंस देखने योग्य थी. वे हमें प्रेजेंटेशन रूम में ले गए, तुरंत कंप्यूटर पर छोटा सा प्रेजेंटेशन दिया और फिर अपने वरिष्ठ अधिकारी को वहीँ से बुलाया.

मुझे जो बात सबसे अच्छी लगी वह यह कि जब उस दफ्तर का चीफ सुपरिंटेंडेंट आया तो नीचे के अधिकारियों ने कत्तई ऐसा माहौल नहीं बनाया जैसे कोई भगवान आ गया हो, जैसा हम लोग भारतीय पुलिसबल में आदी हो चुके हैं. बल्कि चीफ के आने के बाद भी वे कॉन्स्टेबल और सार्जेंट अपनी जगह पर ही आराम से बैठे रहे. चीफ सुपरिंटेडेंट ने आ कर कंप्यूटर पर अपनी बात रखी और फिर हमें शेष दिन भर के कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए अपने साथ ले चले.

इसी तरह की स्थिति उस डिविजन के डेली क्राइम मीटिंग में भी देखने को मिली जहां चारों तरफ कंप्यूटर बिखरे पड़े थे और उन पर हर रैंक के अधिकारी बैठे हुए थे. यह डेली क्राइम मीटिंग लगभग एक घंटे की होती है,  जिसमे ग्रेटर मैनचेस्टर के चीफ कॉन्स्टेबल ऑफिस के अधिकारी डिविजनल ऑफिस के साथ बीते दिन का ब्यौरा देखते हैं और आने वाले दिन की रणनीति बनाते हैं. हमें उस क्राइम मीटिंग में बैठ कर उनका कामकाज देखने का मौका मिला और हमने देखा कि जहां डिविजनल ऑफिस का चीफ सुपरिंटेंडेंट खड़ा है वहीँ बाकी सभी लोग आराम से कुर्सियों पर बैठे हैं. क्राइम मीटिंग के दौरान कहीं से माहौल में विशेष गर्माहट या कड़वाहट नहीं नज़र आती है बल्कि सब कुछ सहज सा जान पड़ता है. वीडियो कॉन्फरेंसिंग से ही क्राइम मीटिंग होती है और इसमें बड़ी गहराई से एक-एक मसले पर बातचीत और पूछताछ होती है पर एक बार भी नहीं लगता कि ऊपर का अधिकारी गुस्से में हो या नीचे वालों को हड़का रहा हो. साफ़ दिखता है कि वहाँ एक मित्रवत और प्रोफेशनल माहौल है, ना कि एक-दूसरे से छल-कपट करने का कृत्रिम वातावरण.

ऐसा भी नहीं है कि क्राइम मीटिंग कोई खेल हो. बदतमीजी और डांट-डपट नहीं होने पर भी एक गंभीरता लगातार बनी रहती है क्योंकि जब क्राइम मीटिंग खत्म होती है तो अफसरों के चेहरे पर हंसी और आराम के भाव स्वतः ही दिखाई देने लगते हैं. इसके बाद हमें जितने भी कार्यक्रमों और कार्यों से रूबरू कराया जाता है उन सभी में हमारे साथ मात्र कॉन्स्टेबल और सार्जेंट रैंक के अधिकारी ही रहे पर उनकी कार्य-कुशलता, निपुणता और आत्मविश्वास देखने लायक होता है. एक कॉन्स्टेबल हमें सशस्त्र पुलिस वाहन दिखाते हैं जिसे देख कर हम दंग रह जाते हैं. इस वाहन में कोई ऐसी जरूरत की चीज़ नहीं, जो ना हो. इसमें एक बार में आगे केवल दो पुलिस वाले बैठ सकते हैं क्योंकि पीछे की सीट से ले कर बड़ी सी डिग्गी में केवल साजो-सामन भरे पड़े हैं. इन में अत्याधुनिक हथियार भी हैं, डीएनए किट भी, फोरेंसिक इंस्ट्रूमेंट भी और मौके पर निपटने के लिए नाना प्रकार के यंत्र भी. इस वाहन को चलाने वाले सार्जेंट होते हैं या कॉन्स्टेबल और ये किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सक्षम होते हैं. इन्हें इसके लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी से बार-बार पूछने की जरूरत नहीं. इस प्रकार से ब्रिटिश पुलिस में हमें प्रत्येक स्तर पर भारी जिम्मेदारी और कार्य के स्वतंत्रता की स्थिति नज़र आई. दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे यहाँ की पुलिस में नीचे के अधिकारी बहुधा इस तरह से देखे, समझे और बना दिये जाते हैं कि कोई भी निर्णय ऊपर का अधिकारी ही लेगा, जमीन पर काम कर रहे कॉन्स्टेबल और हेड कॉन्स्टेबल तक तो किसी भी महत्वपूर्ण मौके पर मिट्टी के माधो की तरह अपने बड़े अधिकारियों का मुंह ताकते नज़र आते हैं.

मैं समझता हूँ कि हमें इस मानसिक स्थिति और कार्यप्रणाली से तुरंत उबरना होगा क्योंकि जब तक हम अपने पुलिसबल के सबसे बड़े हिस्से को पूरी तरह जिम्मेदार, काफी हद तक स्वतंत्र, आत्मविश्वास से लबरेज और विशिष्ट कार्यों में दक्ष नहीं बनाएंगे तब तक हमारी पुलिस कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर आधारित पुलिस बल की तरह रहेगी जहां सारा कुछ सिमट कर ऊपर के अधिकारियों के व्यक्तित्व और निर्णयक्षमता पर आधारित हो जाता है. ये कुछ विशेष बातें है जो मुझे अपने इस ब्रिटिश प्रवास में सिखने और समझने को मिला है. मैं समझता हूँ कि बदलते हुए हालातों में अब यदि हम भी परिस्थितियों के अनुरूप नहीं बदलेंगे तो पुलिस में अपेक्षित परफोर्मेंस की कमी रह ही जाया करेगी.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं. इन दिनों पुलिस प्रशिक्षण के लिए इंग्‍लैंड में हैं.


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