डा. निशीथ राय प्रकरण : धन्य है, धिक्कार है यूपी पुलिस को

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बीती रात साढ़े 11 बजे के आसपास इलाहाबाद के बाघम्बरी इलाके में हिन्दी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार दिवंगत डॉ. रामकमल राय के मकान पर छह थानों की पुलिस ने मिलकर धावा बोला और घर में उनकी चौरासी वर्षीया पत्नी व छोटी पुत्रवधू द्वारा इसकी वजह पूछने पर उन्हें एक किनारे करते हुए कहा कि पता चला है, यहां कुछ अपराधी छिपे हुए हैं, सो हम  छानबीन करेंगे।

कोई सर्च वारंट नहीं, लेकिन इससे क्या? यूपी के मौजूदा निजाम में पुलिस जो करे, वही नियम-कानून है! सो पुलिसवालों ने पूरे मकान में धींगामुश्ती की और एक छोटी-सी आलमारी भी तोडक़र देखा- क्या पता, उसका काल्पनिक अपराधी किसी जादूगर के डिब्बे की तरह उसी में उकड़ू बैठकर छिपा हो। बहरहाल, अपनी निहायत हास्यास्पद, लज्जास्पद और निंदनीय तलाशी के बाद दोनों महिलाओं को हक्का-बक्का छोडक़र पुलिस वाले चले गए। किस मुखबिर की सूचना पर और किसके निर्देश पर पुलिस ने अपराधी तलाशने के इस महाअभियान को अंजाम दिया, यह तो वही जाने, लेकिन कहना पड़ता है कि यह कृत्य करने वाले धन्य हैं- उन्हें धिक्कार है!

दिवंगत साहित्यकार डॉक्टर रामकमल राय का यह वही मकान है, जिसमें प्रख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय से लेकर दूसरे हिन्दी लेखकों और इलाहाबादी रचनाकारों का आना-जाना रहा है। इसलिए स्वाभाविक है कि बेवजह और रात में जबकि घर में कोई पुरुष सदस्य भी न हो, बिना महिला पुलिस को साथ लिए इस बेतुकी तलाशी पर इलाहाबाद के साहित्यिक समाज समेत सचेत नागरिकों के विभिन्न वर्गों में क्षोभ है। क्या पुलिस का यह तलाशी-पराक्रम नागरिक अधिकार और मानवाधिकार की ऐसी-तैसी करना नहीं है?

पुलिस ने ऐसा क्या इसीलिए किया कि दिवंगत साहित्यकार के एक पुत्र प्रोफेसर निशीथ राय डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट अखबार के चेयरमैन हैं और एक पुत्र उत्पल राय यूपी में राज कर रही बसपा सरकार की विरोधी कांग्रेस पार्टी के नेता हैं? पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि बीते बरस किस तरह डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन की अनुपस्थिति में ऊपरी आदेश का हवाला देकर बिना किसी पूर्व नोटिस के उनको आवंटित आवास से सारा सामान बाहर निकाल कर उसे खाली कराया गया था। तो क्या इलाहाबाद में उनके पैतृक आवास पर रात की तलाशी का यह हथकंडा पत्रकारिता की उस कलम को मद्धिम या दुर्बल करने की कोशिश है, जो व्यवस्थागत खामियों को उजागर करने का अपना धर्म निभाती है?

लेखक अरविंद चतुर्वेदी डीएनए, लखनऊ के संपादक हैं.


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