लखनऊ में 3000 करोड़ की सीरियल किलिंग : बाबूलाल कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्रा को बचाने के लिए की जा रही लीपापोती

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लखनऊ/नई दिल्ली :  सीएमओ का मतलब होता है चीफ मेडिकल ऑफिसर. पर इस वक्त लखनऊ में सीएमओ को लोग ''करप्शन मर्डर ऑफिसर'' के नए नाम से जानने लगे हैं. और जानें भी क्यों नहीं. तीन सीएमओ के कत्ल व एक और पूर्व सीएमओ की गिरफ्तारी ने 3000 करोड़ की इस सीरियल किलिंग को देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री जो बना दी है.

डॉ. वीके आर्य की मौत 27 अक्तूबर 2010 को हुई. डॉ. बीपी सिंह की हत्या दो अप्रैल 2011 को हुई. इसके बाद पुलिस हिरासत में डॉ. वाईएस सचान की 22 जून 2011 को हत्या हो गई. सूत्रों के मुताबिक सीरियल किलिंग में मारे जाने वाले तीसरे सीएमओ यानी डाक्टर सचान ने अपनी मौत से एक दिन पहले पुलिस को बताया था कि डाक्टर शुक्ला ही वो अहम शख्स है जो इस सीरियल किलिंग की गुत्थी सुलझा सकता है. सचान के मुताबिक शुक्ला तीन हज़ार करोड़ की सीरियल किलिंग के हर दबे राज को जानता है. पर इससे पहले कि डाक्टर सचान इस सीरियल किलिंग में डाक्टर शुक्ला के शऱीक होने या ना होने पर कुछ और बोल पाते उनका कत्ल कर दिया गया.

डाक्टर सचान की जेल में कत्ल के बाद पुलिस कुछ दिन तो चुप रही. लेकिन जब लोग सड़कों पर उतर आए तो नए सिरे से पुलिस ने तीन हजार करोड़ की इस सीरियल किलिंग के फाइलों को फिर से पलटना शुरू किया. इन्हीं फाइलों में पुलिस को मिले डॉक्टर शुक्ला के दस्तखत. ये दस्तखत इशारा कर रहे थे कि हजारों करोड़ के इस घपले और गबन में डाक्टर शुक्ला एक अहम कड़ी हैं. कुछ दिनों की जांच में ये साफ हो गया कि डाक्टर शुक्ला इस सीरियल किलिंग में अगर सीधे तौर पर नहीं भी जुड़े हैं तो कम से कम इस घपले में वो शरीक जरूर हैं. और मुम्किन तौर पर तीनों कत्ल के दबे राज भी जानते हैं. बस इसी के बाद पुलिस हरकत में आई और मंगलवार को लखनऊ मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर से डाक्टर शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस ने डॉक्टर शुक्ला पर पर वहीं इल्जाम लगाए हैं जो डॉ सचान पर लगे थे. डॉक्टर सचान के ख़िलाफ़ डॉ. बीपी सिंह के क़त्ल के तीन दिन बाद यानि 5 अप्रैल को घपले का केस दर्ज हुआ था और डॉ. शुक्ला के ख़िलाफ़ इसके दो दिन बाद ही यानि 2 अप्रैल को. लेकिन सूत्रों की मानें तो ऊपरी पहुंच के चलते तब डाक्टर शुक्ला को गिरफ्तार नहीं किया गया. तीन सीएमओ का हश्र जमाने के सामने है. अब चौथा सीएमओ यानी डाक्टर शुक्ला पुलिस की गिरफ्त में है. क्या होगा आगे?

क्या शुक्ला खोलेंगे राज़ या फिर खुद निशाने पर हैं डॉ. शुक्ला? : तीन हजार करोड़ की इस सीरियल किलिंग का अब ये सबसे बड़ा सस्पेंस है. डाक्टर शुक्ला की गिरफ्तारी ने एक बार फिर डॉक्टर सचान की कहानी ताजा कर दी है. डर इस बात का है कि कहीं सच सामने आए उससे पहले डाक्टर शुक्ला की जुबान भी बंद ना कर दी जाए, और इसी आशंका के मद्देनजर हाई कोर्ट ने ना सिर्फ डाक्टर शुक्ला को जेल में कड़ी निगरानी में बल्कि चौबीसों घंटे कैमरे के सामने रखने का हुक्म सुनाया है.

क्या आपने कभी सुना है कि जेल के अंदर कोई कैदी चौबीसों घंटे कैमरे की भी कैद में रहे? आप भले ही यकीन ना करें पर ऐसा होने जा रहा है. तीन हजार करोड़ के घपले और सीरियल किलिंग के इलजाम में गिरफ्तार पूर्व सीएमओ डाक्टर एके शुक्ला अब जब तक जेल में रहेंगे चौबीसों घंटे कैमरे के सामने होंगे.

डॉ. शुक्ला को कैमरे की निगरानी में रखने का हुक्म : डाक्टर सचान की जेल के अंदर हत्या से खुद अदालत हैरान है. और यही वजह है कि मंगलवार को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने डाक्टर शुक्ला को 14 दिनों की न्यायिक हिरात में जेल भेजने का फैसला सुनाया तो साथ में ये भी हुक्म दिया कि डाक्टर शुक्ला को चौंबीसों घंटे जेल के दर सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में रखा जाए. हाइकोर्ट ने इसके साथ ही जेल प्रशासन को सख्त हिदायत दी है को वो डाक्टर शुक्ला को कड़ी सुरक्षा में रखे. दरअसल एक के बाद एक तीन सीएमओ के कत्ल की वजह से डाक्टर शुक्ला की सुरक्षा को लेकर अदालत कोई कोताही नहीं चाहती है.

पूर्व के तीन सीएमओ के हश्र को देखते हुए खुद डाक्टर शुक्ला का परिवार भी उनकी सुरक्षा को लेकर आशंकित था. दरअसल जब से तीन हजार का ये घोटाला सामन आया है तभी से ये कहा जा रहा है कि इसके पीछे बड़े और ताकतवर लोगों का हाथ है. यहां तक कि इसी सीरियल किलिंग के इलजाम में गिरफ्तार एक शूटर आनंद तिवारी ने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की है.

शूटर आनंद तिवारी ने कहा कि हमें अपनी जान का खतरा है क्योंकि इस कांड के पीछे कई बड़े लोग हैं. डरा हुआ सिर्फ आनंद तिवारी ही नहीं है. इस सीरियल किलिंग का एक और मोहरा अभय सिंह जो इस वक्त जेल में कैद है, वो भी बुरी तरह सहमा हुआ है कि कहीं सबूत मिटाते-मिटाते खुद उसे भी ना मिटा दिया जाए. इस घपले और सीरियल किलिंग से जुड़े हर छोटे प्यादे और अफसरों को अपनी-अपनी जान का खतरा है, और खतरा हो भी क्यों ना. जो लोग जेल के अंदर घुस कर डाक्टर सचान की जुबान बंद कर सकते हैं उनकी पहुंच का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. वैसे आपको ये भी बता दूं कि न्यायिक जांच में ये साबित हो गया है कि डाक्टर सचान ने खुदकुशी नहीं की थी बल्कि जेल के अंदर उनकी हत्या की गई थी.

डॉ. सचान का जेल के अंदर क़त्ल हुआ था : तीन हज़ार करोड़ के घोटाले का सबसे बड़ा सस्पेंस यही है कि दो सीएमओ को सरेआम गोली मारी जाती है. और जिस तीसरे सीएमओ को दोनों कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया जाता है खुद उसका जेल के अंदर कत्ल कर दिया जाता है. फिर कत्ल के बाद साजिश रची जाती है. लाश को पंखे से लटकाया जाता है. ताकि दुनिया को मामला खुदकुशी का लगे. लेकिन, चीफ़ जयूडिशिएल मैजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में आखिरकार इस साजिश को बेनकाब कर दिया है. मजिस्ट्रेट ने मंगलावार को हाई कोर्ट में सौंपी अपनी रिपोर्ट में सफ कहा है कि डॉ. सचान को एक साजिश के तहत जेल के अंदर मारा गया.

डॉ. सचान उगलने जा रहे थे साज़िश रचने वालों के नाम : सूत्रों के मुताबिक अपनी मौत से एक दिन पहले डॉ. सचान ने जेल में कुछ कैदियों से एलानिय़ा तौर पर कहा था कि उन्हें इस सीरियल किलिंग में बलि का बकरा बनाया जा रहा है. डॉ. सचान ने कहा था कि वो पुलिस को उन सभी लोगें के नाम बताएंगे जो सीधे तौर पर इस घोटाले से जुड़े हैं और जिनका इस साजिश में हाथ है. दरअसल 17 जून को यूपी पुलिस ने तीन शूटरों को पकड़ कर एक प्रेस कांफ्रेंस में खुलासा किया कि डॉ. सचान ने सात लाख की सुपारी देकर सीएमओ हत्याकांड को अंजाम दिया. ये खबर जैसे ही जेल में पहंची डॉ. सचान भड़क उठे. 23 जून को डॉ. सचान को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ होनी थी. सूत्रों के मुताबिक डॉ. सचान ने अपने घर वालों को भी बता दिया था कि वो पुलिस को इस पूरी साजिश में शामिल रुसूख वाले लोगों के नाम बता देंगे.

लेकिन पुलिस रिमांड पर जाने से एक दिन पहले यानी 22 जून को ही डॉ. सचान की रहस्यमी हालत में मौत हो गई. एक ऐसी मौत जिसे पुलिस और सरकार लगातार खुदकुशी बता रही थी. लेकिन पुलिस और सरकार की धज्जियां उड़ा दीं डॉ. सचान की पोस्टमर्टम रिपोर्ट ने. पुलिस बार-बार दोहराती रही कि डॉ. सचान ने गले में बेल्ट का फंदा कस कर खुदकशी की और फिर अपनी नसें काट लीं. जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सचान के गले में फंदा उनकी मौत के बाद कसा गया. रिपोर्ट में कहा या है कि डॉ. सचान के शरीर में जख्म के कुल नौ निशान थे. इनमें से आठ मरने से पहले के थे. जबकि नवां जख्म यानी गले पर फंदे का निशान मौत के बाद का था. और बस इसी रिपोर्ट ने न्यायिक जांच में ये साबित कर दिया कि डक्टर सचान ने खुदकुशी नहीं की थी बल्कि उनका कत्ल किया गया था.

लखनऊ की सड़कों पर एक-एक कर दो सीएमओ को उन्हीं के घर के बाहर गोलियों से भून दिया जाता है. जांच होती है और फिर पुलिस इन दोनों कत्ल का इलजाम डाक्टर सचान पर डाल कर उन्हें गिरफ्तार कर लेती है. लेकिन इसके बाद खुद डॉक्टर सचान का जेल के अंदर कत्ल हो जाता है.

एक के बाद एक तीन सनसनीख़ेज़ मौत : इस खूनी सिलसिले की शुरुआत कोई सालों पहले नहीं हुई. बल्कि मामला महज 8 महीने पहले का है. खूनी खेल की शुरुआत हुई 27 अक्तूबर 2010 को जब हजारों करोड़ का हिसाब-किताब करने वाले सीएमओ वीके आर्या को सुबह-सुबह लखनऊ में उन्हीं के घर के बाहर गोलियों से भून दिया गया. सबूत के तौर पर पुलिस को मौका-ए-वादात से सिर्फ गोलियों के खोखे मिले.

आर्य के कत्ल के बाद डिप्टी सीएमओ सचान को कार्यकारी सीमओ बना दिया गया. लेकिन फिर सरकार ने बीस जनवरी को सेवा चयन के आधार पर बीपी सिंह को नया सीएमओ बना दिया. बीपी सिंह ने पद संभालते ही घपलों की जांच करानी शुरू कर दी. लेकिन जांच अभी आगे बढ़ती कि तभी उनका भी ठीक वही हश्र हुआ जो पूव सीएमओ आर्य का हुआ था. इसी साल 2 अप्रैल को ठीक डॉक्टर आर्य की तरह ही डॉक्टर बीपी सिंह को बी सुबह-सुबह उनके घर के बाहर सुबह के वक्त गोलियों से छलनी कर दिया गया जब वो टहलने निकले थे. मौका-ए-वारदात से इस बार भी पुलिस को बस चले हुए कारतूस के खाली खोखे ही मिले. जैसे पहले कत्ल में मिले थे.

दो-दो सीएमओ का कत्ल हो चुका था. मामला संगीन था. लिहाजा जांच एसटीएफ को सौंप दी गई. जांच में पाया गया कि दोनों हत्यओं में एक ही हथियार का इस्तेमाल किया गया है. ये नतीजा बैलेस्टिक रिपोर्ट में के पर मिले खाली खोखे के आधार पर किया गया. यानी मकसद चाहे जो हो, कातिल एक था. लेकिन राज़ इसलिए गहरा गया क्योंकि हथियार एक होने के बावजूद पुलिस ने कातिल अलग-अलग पकड़े. डाक्टर आर्य के कत्ल में पूर्वांचल के माफिया सरगना अभय सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया. बल्कि डॉक्टर बीपी सिंह के कत्ल का ठीकरा डाक्टर सचान के सिर फोड़ दिया गया.

पुलिस की इस जांच पर सवाल उठने लगे और सरकार की साख पर उंगलियां उठनी शुरू हो गईं. विपक्ष अब खुल कर बोल रहा था कि इस सीरियल किलिंग में सरकार अपने दो बड़े दिग्गज नेताओं को बचाने के लिए लीपापोती कर रही है. उधर पुलिस इस बात पर अड़ी रही कि डाक्टर सचान ने सरकारी पैसे का जमकर घोटाला किया था. उन्हें डर था कि जांच हुई तो वो पकड़े जाएंगे. इसी से बचने के लिए उन्होंने पहले डॉ विनोद आर्या की हत्या कराई और फिर डॉ. बीपी सिंह की.

लेकिन जब डाक्टर सचान की ही जेल में मौत हो गई तो दबी जुबान में ये कहा जाने लगा कि सीरियल किलिंग का मास्टरमाइंड कोई और है. असली खेल औऱ असली साजिश कोई और रच रहा है, और वो इतना ताकतवर है कि उस तक पुलिस भी पहुंचने से कतरा रही है. पर वो है कौन? क्या दो-तीन सीएमओ इतने बड़े घपले को अकेले अंजाम दे सकते हैं? क्या इतना बड़ा खेल सिर्फ अफसरों के बीच खेला जा सकता है? जाहिर है ये बात कहीं से हज़म करने लायक नहीं है. साजिश के तार कहीं ऊपर तक हैं. पर कितने ऊपर तक?

बोल तो सब रहे हैं. लेकिन कह कोई नहीं रहा. राज़, डॉ. सचान जानते थे. लेकिन उन्हें बोलने नहीं दिया गया. बस यही सच है इस तीन हजार करोड़ की सीरियल किलिंग का. दरअसल सूत्रों की मानों तो इस सीरियल किलिंग के पीछे सिर्फ और सिर्फ पैसों की बंदरबांट है. दोनों सीएमओ की हत्या और फिर डॉक्टर सचान की मौत का तार नेता, अफसर और अपराधी के गठजोड़ से जुड़ा हुआ है. दरअलसल यूपी के परिवार कल्याण विभाग में केंद्र से तीन हजार करोड़ से ज्यादा के फंड आए थे. एनएचआरएम के इसी फंड में पैसों की खुली लूट और बंदरबांट होने लगी. सूत्रों की मानें तो पैसों की बंदरबांट में नौकरशाह और नेता सबसे आगे थे.

ये कत्ल जब सुर्खियां बनीं तो जनता के दबाव में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा का इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद परिवार कल्याण मंत्री बाबूलाल कुशवाहा को भी जाना पड़ा। पर सवाल उठता है कि अगर एनएचआरएम फंड के सबसे ऊपर कुशवाहा बैठे थे तो फिर पुलिस ने कुशवाहा से पूछताछ क्यों नहीं की? इसी तरह तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा को भी जांच के दायरे से क्यों बाहर रखा गया?

आखिर में सवाल सिर्फ एक लाइन का है कि क्या तीन हजार करोड़ जैसी भारी-भरकम रकम सीएमओ जैसे पद पर बैठे दो-तीन अफसर अकेले डकार सकते हैं? सवाल ये भी कि फिर दो-दो मंत्रियों का इस्तीफा क्यों लिया गया? और सवाल ये भी कि क्या कोई इन मंत्रियों के ऊपर भी है. जो इनसे भी ताकतवर है? ज़ाहिर है बोल तो सब रहे हैं पर कह कोई नहीं रहा. हर कोई कह रहा है कि तमाम सीएमओ की मौत एक साजिश है और साजिश रचने वाले ताकतवर लोग. पर ये कौन लोग हैं? कौन है जिनकी पहुंच जेल के अंदर तक है? जाहिर है इस पूरे मामले के हर पहलू को समझना आपके लिए जरूरी है.

यूपी की राजनीति के दो बड़े चेहरे हैं बाबूलाल कुशवाहा जिनके बारे में कहा जाता है कि जितने वो करीब हैं मायावती के उतना कोई और नहीं. जब स्वास्थय मंत्रालय मे तीन हजार करोड़ के फंड आने शुरू हुए तो कुशवाहा साहब को परिवार कल्याण का मंत्री बनाया गया. दूसरा चेहरा है अनंत कुमार मिश्रा का. ये य़ूपी के पूर्व हेल्थ मनिस्टर हैं जो यूपी के नंबर टू कहे जाने वाले सतीश चंद्र मिश्रा के खास हैं.

यूपी के ये दो अहम चेहरे हमने आपको इसलिए दिखाए क्योंकि जब एक के बाद एक इस सीरियल किलिंग का दूसरा कत्ल हुआ (दूसरा मर्डर बीपी सिंह का दिखाएं) तो जनता के दबाव में मायावती सरकार को कुशवाहा और अनंत मिश्रा का इस्तीफा लेना पड़ा. लेकिन इस्तीफे से भी बात नहीं बनी. क्योंकि तीन हजार करोड़ कोई मामूली रकम नहीं होती. इससे पहले कि यूपी सरकार की पुलिस मामले को रफा-दफा करती कि तभी तीसरी मौत हो गई. एक ऐसी मौत जिसने सरकार को उलझा कर रख दिया.

आजतक डॉट कॉम में 13 जुलाई को प्रकाशित अनूप श्रीवास्ताव/आमिर हक/शम्स ताहिर खान की स्टोरी.


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