राहुल कुमार को हमारे-आपके सहयोग की दरकार है भी या नहीं?

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पंकज झा: हम राहुल कुमार के साथ हैं, लेकिन....! : यशवंत जी, भास्कर में राहुल से संबंधित खबर के बाद आपका आलेख पढ़ कर याद आया कि संबंधित साइट भड़ास4मीडिया ही है. वह प्रकरण भी याद आया. तो यहां यह कहना ज़रूरी है कि निश्चित ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र को पावन बनाता है.

शास्त्र-पुराण में उल्लिखित प्रसंग भी इस बात की गवाही देते हैं कि बोलने की आज़ादी समाज को सभ्य बनाता है. लेकिन जहां तक राहुल प्रकरण का सवाल है तो नक्सल मामले में (लोकतंत्र के पक्ष में) खुद को अतिवादी समझने के बावजूद भी एक पत्रकार के नाते हम यह मानते हैं कि राहुल या किसी को भी लिखने के कारण कभी प्रताडित नहीं होना पड़े. लेकिन अभिव्यक्ति के भावुक पैरोकार गण (आप खुद भी) कई बार इस आज़ादी का उपयोग करते हुए अन्य तरह की आजादी या दूसरों की आज़ादी का जाने-अनजाने अतिक्रमण कर जाते हैं. हमें यह बार-बार याद करने की ज़रूरत है कि संविधान ने भी अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें बिना किसी शर्त के नहीं दिया है. अभिव्यक्ति और बदतमीजी में फर्क करने का नाम ही लोकतंत्र है.

इस नए मीडिया ने वास्तव में हमारे हाथ एक बड़ा हथियार उपलब्ध कराया है. कॉपी-पेस्ट की सुविधा के कारण, बीच में किसी भी एडिटर के नहीं होने और अन्य मीडिया के अपेक्षा अपनी द्रुत गति और बिना किसी खास बुनियादी ढाँचे के बिना पहुच जाने के कारण कंम्युनिकेशन की दुनिया में वास्तव में इसने एक क्रान्ति ला दी है. लेकिन इस नए तरह के अभिव्यक्ति के साथ कुछ सावधानियों को भी हमें स्वीकार करना होगा. राहुल जैसे नए लेखकों में वास्तव में प्रतिभा है. लेकिन जल्दबाजी और कूद कर नतीजे पर पहुच जाने की हडबडी में कई बार खुद का तो ज्यादातर देश और लोकतंत्र को नुकसान पहुचा देते हैं.

इसके अलावा ऐसे बालक अपने अक्खड़पन को अपनी विशेषता भी समझ लेते हैं. आप भले ही यह कह दें कि राहुल ने माफी मांग ली थी लेकिन जैसा कि संजय कुमार सिंह जी ने याद दिलाया है, बाद में इस मुद्दे पर भड़ास में ही लिखते हुए उसने तो आपकी भी ऐसी-तैसी कर दी थी. तो ज़ाहिर है जब-तक खुद राहुल सामने आकर सच्चे मन से अपनी गलती स्वीकार करने या अपना पक्ष रखने को तैयार नहीं होता, तब-तक बिना मांगे उसे किसी तरह का समर्थन देने का कोई औचित्य कहाँ है. आपको यह याद रखना होगा कि अभियुक्त राहुल है, आप नहीं. और पुलिस ऐच्छिक तौर पर तो आपको अभियुक्त बनाने से रही. राहुल के संबंध में आप जिसे कोरी भावुकता कहते हैं, वह कम से कम राहुल में तो सिरे से गायब था. कोई भी संवेदनशील आदमी अपने देश के गृह मंत्री को गोली से उड़ा देने या संसद में आग लगा देने की बात तो कभी नहीं करता. इसे केवल उद्दंडता ही कहा जाना चाहिए. बहरहाल.

जहां तक नक्सल या माओ के नाम पर चल रहे आतंकी गतिविधियों का सवाल है तो यह बार-बार कहे जाने की ज़रूरत है कि इस मामले में आप सभी पिरामिड को उलटा करके देखने के अभ्यस्त हो गए हैं. जैसा कि आपने अपने इस लेख के शुरुआत में लिखा है उस तरह तो कम से कम ‘गरीबों-आदिवासियों-निरीहों के सरकारी दमन’ का मामला बिलकुल नहीं है. अलग से छत्तीसगढ़ का सवाल आपके इस लेख में नहीं है लेकिन फिर भी मैं बस्तर को एक केस स्टडी के तौर पर लेते हुए यह कहना चाहूँगा कि सरकार का अभियान माओ के नाम पर दो हज़ार करोड़ के वसूली के विरुद्ध है, न कि आपने जैसा कहा वैसा.

इस पक्ष में कई तर्क पहले भी दिए जा चुके हैं फिर भी कुछ सवाल उठाना लाजिमी है. जैसा कि कहा जाता है कि नक्सल आतंक उद्योगपतियों और सरकार के गठजोड से आदिवासियों को बचाने की है तो आप गौर करें.. आपने कब यह सुना या पढ़ा कि किसी नक्सली ने कभी वहां के किसी व्यापारी को अगवा किया या उसकी हत्या की है? तरीके से तो यह कहा जा सकता है कि वहां के व्यापारियों के लिए तो वरदान जैसे हैं नक्सल. बस उसका हिस्सा उसका पन्द्रह प्रतिशत लेवी दो और जम कर संसाधनों की बंदरबांट करो. अगर यह आतंक, आदिवासियों के पक्ष में होता तो आखिर कैसे पांच हज़ार स्थानीय जवान जान हथेली पर लेकर सरकारी एसपीओ बन नक्सलियों का दांत खट्टा करते होते?

कैसे लाखों आदिवासियों अपना घर-बार छोड़ कर भी उन आतंकियों के विरुद्ध ‘सलवा जुडूम’ जैसे अभियान के नाम पर एकत्रित होते? शनिवार के जनसत्ता की खबर पढ़िए जहां विस्तार से लिखा गया है कि बिहार में भी कैमूर आदि की पहाडियों में अवस्थित गावों में आज स्थानीय आदिवासी समाज इन माओवादी कहे जाने वाले गुंडों के पक्ष में उठ खडा हुआ है.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ऐसे ही प्रयोग को दुहराना चाहती हैं तो झारखंड में भी किस तरह का आक्रोश इन आतंकियों के विरुद्ध उठ खडा हुआ है. बस्तर में हर बार होने वाले चुनावों में किस तरह आदिवासीगण बढ़-चढ कर मतदान करते हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा साख प्राप्त चुनाव प्रणाली से केवल भाजपा जैसी पार्टी को ही इकतरफा समर्थन मिल जाता है? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर बार बस्तर में वहां के रायपुर, बिलासपुर आदि शहरों से ज्यादा मतदान होता है. आप तय मानिए कि इस पारदर्शी ज़माने में कोई चुनाव केवल धांधली से नहीं जीता जा सकता है.

तो राहुल पर करवाई जैसा कि आपने कहा ‘गरीबों-आदिवासियों-निरीहों के सरकारी दमन’ के खिलाफ  लिखे गए आलेख के कारण नहीं हुआ है बल्कि उस बदतमीजियों के कारण हुआ है जिसकी इजाज़त कम से कम अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर तो बिलकुल नहीं दिया जा सकता. इस तरह तो थोड़ी सी उथली जानकारी या दुष्प्रचार का शिकार होकर हर कोई मरने-मारने की बात करने लगेगा. छत्तीसगढ़ की स्थिति के मद्देनज़र वहां सरकार को अलग से एक जन सुरक्षा क़ानुन बना कर नक्सल गतिविधियों को महिमामंडित करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान किया गया है.

लेकिन आपको जान कर ताज्जुब होगा कि वहां भी लिखने के कारण तो कम से कम कभी भी किसी भी पत्रकार या लेखक को दण्डित नहीं किया गया है. आपने सही कहा कि नैसर्गिक न्याय का यह सिद्धांत है कि सौ दोषी भले ही छूट जाए लेकिन एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए. लेकिन राहुल का मामला भी इसका अपवाद तब साबित नहीं होगा जब वह खुद सामने आ कर अपने किये पर पश्चाताप करे.

इस बात का भरोसा है मुझे है कि इतना कर लेने के बाद आपको एनसीआर या देश भर के पत्रकारों को अपील करने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी. ‘तिहाड’ में तो राजाओं-कनिमोझियों के कारण ऐसे ही जगह की काफी किल्लत है. लेकिन माफी मांग लेने के बाद भी अगर पुलिस उस बालक पर कोई दमनात्मक कारवाई करती है तो निश्चय ही आपका यह अपील काम आएगा. निश्चय ही पत्रकारों की ज़मात निरीह के पक्ष में खडा होगा. लेकिन सरेआम आपको लांछित करते समय तो उसने ऐसा कोई संकेत नही दिया था कि उसे अपने किये पर कोई पश्चाताप है. तो पहले आप ये तो पता कीजिये कि आपके सहयोग या सौजन्य की दरकार उस बालक को है भी या नहीं?

लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित भाजपा के मुखपत्र दीपकमल मैग्जीन के संपादक हैं.


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