कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों की सदस्यता खत्म करने के लिए पहल करें

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झारखंड आरटीआइ फोरम के अध्यक्ष बलराम ने एक पत्र देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिख भेजा है. इस पत्र में उन्होंने नागरिकों चुनाव लड़कर आने की चुनौती देने वाले दो सांसदों कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों की सदस्यता खत्म करने के लिए पहल करने व प्रावधान बनाने का अनुरोध किया गया है. बलराम ने इसके पक्ष में कुछ तर्क दिए हैं. उनका तर्क कितना सही या गलत है, यह उनके पत्र से आपको पता चल जाएगा, जिसे हम नीचे हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

सेवा में

मुख्य निर्वाचन आयुक्त

निर्वाचन आयोग, नयी दिल्ली

विषय- नागरिकों को चुनाव लड़ने की चुनौती के कारण निर्वाचन आयोग पर अगंभीर उम्मीदवारों के बोझ की संभावना के संदर्भ में दिशानिर्देश का निवेदन

मान्यवर,

आप अवगत होंगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत जनलोकपाल के लिए नागरिकों का लोकतांत्रिक तरीके से जनांदोलन चल रहा है। इस क्रम में कतिपय सांसदों/ प्रमुख दलों व सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों ने आंदोलनकारी नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़कर आने की चुनौती दी है। इनमें लुधियाना के सांसद मनीष तिवारी तथा चांदनी चौक के सांसद कपिल सिब्बल शामिल हैं। नागरिकों को ऐसी चुनौती देना वयस्क मताधिकार पर आधारित संसदीय लोकतंत्र की भावना एंव प्रावधानों के खिलाफ है। प्रत्येक जनप्रतिनिधि को नागरिकों के मत एवं भावना का सम्मान करना चाहिए और उस अनुरूप कार्य करना चाहिए। दुर्भाग्यवश, प्रतिनिधि वापसी की व्यवस्था अब तक नहीं लागू हो पायी है। लेकिन इससे जनप्रतिनिधियों को मनमानी करने और कोई सलाह देने पर आंख दिखाने की स्वतंत्रता नहीं मिल गयी है।

नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने की धमकी देने के दूरगामी परिणामों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करने के लिए मैं यह पत्र आपको लिख रहा हूं। अगंभीर उम्मीदवारों की बड़ी संख्या निर्वाचन आयोग के लिए हमेशा चिंता का विषय रही है। ऐसे प्रत्याशियों का नामांकन रोकने का समुचित तरीका अब तक नहीं निकल सका है। इसके कारण कई क्षेत्रों में निर्वाचन आयोग और सरकारी मशीनरी को गंभीर समस्या से गुजरना होता है और संसाधनों की भारी क्षति होती है।

नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने की धमकी से आहत होने के कारण संभव है कि मैं लुधियाना, चांदनी चौक व ऐसे अन्य क्षेत्रों से नामांकन कर दूं। अन्य नागरिक भी बड़ी संख्या में ऐसे कदम उठा सकते हैं। इससे निर्वाचन आयोग एवं सरकारी मशीनरी पर अनावश्यक बोझ बढ़ सकता है और चुनावी प्रक्रिया पर भी इसका प्रतिकूल असर संभव है। लिहाजा, निवेदन है कि इस दिशा में सख्ती से कदम उठाते हुए सभी राजनीतिक दलों/जनप्रतिनिधियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करें। नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने के लिए उकसाने वाले वक्तव्य देने वालों की सदस्यता समाप्त करने और उन्हें कोई भी चुनाव लड़ने से रोकने के लिए स्पष्ट प्रावधान बनाने की पहल की जानी चाहिए।

भवदीय

बलराम,

अध्यक्ष, झारखंड आरटीआइ फोरम

एफ-108, अशोक विहार, रांची


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