स्पेशल सेल को अब बड़ा आपरेशन करने की छूट नहीं है!

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आलोक कुमार: रिपोर्टर की कलम से : दहली दिल्ली में क्षत विक्षत है पुलिस : बुधवार सुबह दिल्ली हाईकोर्ट पर बम धमाके की खबर के साथ ही आतंकवाद पर काम करने वाले पुलिस के पुराने घाघ अफसरों को फोन लगाया। पर उनकी प्रतिक्रिया मायूस करने वाली रही। दिल्ली पुलिस अब से पहले कभी इतनी शिथिल और कमजोर नजर नहीं आई।

बेसब्र रिपोर्टर की तरह बेचैनी से घुमड़ते सवालों के साथ तेजी से कार के चक्के को लोधी कॉलोनी की तरफ घुमाया। लोधी कालोनी में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल का दफ्तर हुआ करता था। अभी भी है। लेकिन ना होने के बराबर की हालत में है। वहां सन्नाटा नजर आया। पुलिस के स्पेशल सेल में वीरानगी कचोटने वाला था, जिसके भरोसे हम रिपोर्टर आपस में बात किया करते थे कि यहां के दक्ष अफसरों के रहते दिल्ली पर आतंकवाद का परिंदा पर तक नहीं मार सकता। लेकिन आज का मंजर अलग था, साफ लगा कि दिल्ली को दहला देने वाले धमाके की कोई अनुगूंज यहां तक नहीं पहुंची है।

स्वभाववश, फिलॉसफिकल हो गया। जेहन में सुनी गई वो बात झूठी होती नजर आई कि इंसान से संस्थान बनता है। संस्थान जब व्यवस्थित हो जाए तो इंसान के चले जाने से संस्थान या बसी बसाई व्यवस्था को फर्क नहीं पड़ता। नए इंसान के सहारे व्यवस्था बनी रहती है, संस्थान चलता रहता है। लेकिन ना जाने क्यों हाईकोर्ट पर आंतकी हमले से घायल पड़ी दिल्ली के सामने निरीह पड़े दिल्ली स्पेशल सेल के दफ्तर को देखते ही जांबाज शहीद मोहन चंद शर्मा की याद आ गई। आंखें नम हो गईं। बाटला हाउस का इन्काउंटर याद आया। पूछने पर पता लगा कि बाटला हाउस में 19 सितंबर 2008 को हुआ इन्काउंटर दिल्ली में आंतकवादियों के सफाए के लिए होने वाले इनकाउंटर की कड़ी का आखिरी इनकाउंटर था। तीन बरस से आतंकवादियों का हौसला चूर करने के लिए होने वाला कोई इनकाउंटर नहीं हुआ है। बरसों से नियमित दिल्ली पुलिस कवर कर रहे पत्रकार दोस्त ओमप्रकाश तिवारी ने बताया कि अब स्पेशल सेल को कोई बड़ा आपरेशन करने की छूट नहीं है। अजीब सा लिजलिजापन पैदा कर दिया गया है। पाबंदी लगी है।

आतंकवाद के खिलाफ कमजोर होते संकल्प का नतीजा है कि ज्यादा से ज्यादा इंसानों की जान लेने के लिए आतंकवादी बीच दिल्ली में रिहर्सल दर रिहर्सल करते हैं। मई में छोटा धमाका कर पुलिस को बता दिया जाता है कि वह इसी जगह फाइनल धमाका करेंगे। रोक सको तो रोक लो। फिर जुलाई में जान जोखिम में डालकर खुफियागिरी करने वाले लोगों के हवाले से दिल्ली पुलिस को बता दिया जाता है कि आतंकी हमला होने वाला है। फिर भी पुलिस पीसीआर वैन लेकर हताहतों की संख्या गिनती हुई चुपचाप खड़ी रहती है। बार एसोसिएशन की तरफ से विस्फोट के मौके पर निगरानी के लिए सीसीटीवी लगाने की जरूरी मांग की जाती है। कोर्ट के परिसर की तरफ सीसीटीवी लगा भी दी जाती है पर बाहर की चौकसी बढाने के लिए सीसीटीवी लगाने में अक्षमता जता दी जाती है। पुलिस की शिथिल बचाव उपायों का मजा लेते हुए आतंकवादी मेल की जरिए धमाके की पूर्व सूचना देते हैं और फिर सोई पुलिस के आगे आसानी से अपना काम कर जाते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के उस स्वीकारोक्ति पर हंसी से ज्यादा तरस आती है। गुस्सा आता है कि आंतकवाद को रोकने के लिए ठोस प्रयास नहीं हो पाए हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में आगाह करके नाक तले आतंकी हमले की तैयारी होती रही और पुलिस बेबसी से क्यों सोती रही? मई में हाईकोर्ट पर हल्के धमाके के बाद से दिल्ली में एक भी संदिग्ध क्यों नहीं गिरफ्तार किया गया? इसका पता लगाने निकला तो चौंकाने वाली जानकारी मिली। जिसे आपके साथ शेयर करना जरूरी लग रहा है। दोस्तों के हवाले से जानकारी मिली कि आतंकवाद निरोधी स्पेशल सेल को बाटला हाउस इनकाउंटर के बाद से ही नाप लिया गया है। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को अब सिर्फ चोर उच्चकों से निपटने के काम में लगाया जा रहा है। स्पेशल सेल के मौजूदा ज्वाईंट कमिश्नर आरएस कृष्णनैया कभी आतंकवाद निरोधी आपरेशन में नहीं रहे। स्पेशल सेल के विशेष आयुक्त पीएन अग्रवाल और डीसीपी अरुण कंपानी का इतिहास भी अपने आका कृष्णनैया सरीखा ही है। आतंकवादियों के दांत खट्टे करने के लिए देश भर में मशहूर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल की दुर्गति का कुछ इस तरह हवाला दिया गया है 2007 में इंस्पेक्टर राजबीर सिंह की मौत हो गई, 2008 में मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए, 2009 में ज्वाईंट सीपी करनैल सिंह मिजोरम भेज दिए गए, 2010 में डीसीपी आलोक कुमार को अरुणांचल प्रदेश भेज दिया गया। एसीपी संजीव कुमार को सेक्योरिटी में लगा दिया गया। अशोक चांद डीसीपी क्राइम बनाकर अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के लिए लगा दिए गए। इनके साथ आतंकवादियों को पताल से भी ढूंढ निकालने का दावा करने वाले कारिंदों को तितर बितर कर दिया गया। सीबीआई और दिल्ली पुलिस में रहकर दाउद इब्राहिम के दुबई नेटवर्क पर धावा बोलने वाले सक्षम पुलिस अफसर नीरज कुमार को डीजी बनाकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। दिल्ली पुलिस के ये तमाम वो अफसर हैं जिनका नाम बड़े से बड़े आतंकवादियों की पेशानी पर पसीना छुड़ा देने के लिए काफी है।

बहरहाल दिल्ली हाईकोर्ट धमाके की जांच अब केंद्रीय एजेंसी एनआईए के हाथों में है। धमाके के बाद एनआईए को दिल्ली पुलिस की पुरानी स्पेशल सेल की दक्षता के आगे खुद को साबित करनी की चुनौती है। 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में नौ धमाके कर सैकड़ों इंसानों की जान लेने वाले आतंकवादियों पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने छठे दिन की सुबह ही धावा बोल दिया। सुनिश्चित जानकारी मिलने के साथ जोश में आकर जांबाज इंस्पेकटर मोहन चंद शर्मा ने बाटला हाऊस के एल-18 की उस मनहूस फ्लैट में खुद जाकर शातिर आतंकवादियों से मुकाबला किया। दो को मौके पर मार गिराया लेकिन गोली दागते हुए दो दीवार फांदकर भाग निकले। मुठभेड़ में इंस्पेक्टर शर्मा घायल हो गए। पेट में गोली जा लगी। जीवन मौत के बीच जूझते शहीद शर्मा को दौड़ाते हुए पास के होली फैमिली हास्पिटल ले जाया गया।

रिपोर्टिंग के दिनों की जेहन में बनी वह लाजवाब तस्वीर आज भी कायम है जब होली फैमिली अस्पताल पहुंचा तो कतारबद्ध खड़े सब अफसर आंखें बचाते हुए अंगुली में अंगुली फंसा कंपकपाते होठों से इंस्पेक्टर शर्मा के ठीक हो जाने की दुआ मांग रहे थे। कनिष्ठों की आंखें नम थी। जो मोहन चंद शर्मा को नहीं जानते थे वो अफसोस के साथ शिकायत कर रहे थे कि उनकी जान बेशकीमती है, स्पॉट पर नहीं जाना चाहिए था। बाटला हाउस इन्काउंटर की शाम केस क्रैक होने की खुशी बांटते वक्त स्पेशल सेल के ज्वाईंट सीपी करनैल सिंह, डीसीपी आलोक कुमार और एसीपी संजीव कुमार यादव के चेहरे मायूसी से भरे थे। प्रेस कांफ्रेंस में रुंधे गले से करनैल सिंह ने मीडिया से इंस्पेक्टर एमसी शर्मा के ठीक हो जाने की दुआ की भीख मांगी थी। पर दुआ काम नहीं आई।

इंसानियत के दुश्मनों से सीधी टक्कर लेते हुए 35 आतंकवादियों का परलोक का टिकट कटा देने वाले, 85 आतंकवादियों को अपनी स्थूल बांहों में दबोचकर सलाखों के पीछे पहुंचा देने वाले और कुशाग्र दिमाग से 75 से ज्यादा आतंकवादी वारदातों को सुलझाने वाले जांबाज मोहन चंद शर्मा नहीं बचे। शहीद हो गए। लेकिन अफसोस कि उनकी शहादत के साथ जन्मी राजनीति से दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल भी शहीद हो गया। आंतकवाद से झुलस रहे देश की इतिहास में पहली बार आंतकवादियों को लेकर ओछी राजनीतिक हरकत हुई।

बाटला हाउस इनकांउटर का कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक तौर पर इनकांउटर कर दिया। अपनी ही सरकार की पुलिस की सफलता से उलट बयान दिया और राजनीति की रोटी सेंकने आजमगढ़ जा पहुंचे। अमर सिंह से हाथ मिलाया और इंडियन मुजाहिदीन को खत्म करने के पुलिस के दावे पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। आंतकवाद से लोहा ले रहे पुलिस तंत्र के लिए अफसोसनाक माहौल पैदा हो गया। बात बयानों तक नहीं रुकी। राजनीतिक दबाव ने काम करना शुरू कर दिया। आतंकवाद निरोधी दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के तमाम कारिंदों को तितर बितर कर दिया गया। देश की राजधानी को आंतकवाद के लौ से बचाने के लिए बेहतरीन काम कर रही स्पेशल सेल खत्म सी हो गई। केंद्र सरकार ने नया कानून बनाकर दिल्ली को बचाने की जिम्मेदारी एनआईए के हवाले कर दी गई।

हम पत्रकारों में से जिस किसी ने दिल्ली पुलिस के आतंकवाद निरोधी स्पेशल सेल को काम करते देखा था, स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर और कारिंदों की पथरीली आंखों में कर्तव्य निष्ठा को पढा था, वो दावे के साथ कह सकते हैं कि आज की तारीख में उन अफसरों के माकूल जगह पर रहते दिल्ली के किसी कोने में इस तरह रिहर्सल दर रिहर्सल कर धमाका कर लेना मुमकीन नहीं था। बखूबी याद है कि 2007- 2008 में देश भर में सिरियल बम धमाकों का सिलसिला जारी था। आतंकवादियों का गिरोह इंडियन मुजाहिदीन चौडे होकर क्रूरता भरे मेल से इंसानों के कत्ल की दावेदारियां करता रहा। पुलिस तंत्र को अंगूठा दिखाता रहा। राजनेता आतंकी हमलों के लिए पडोसी पाकिस्तान की तरफ इशारा करके अपने कर्तव्य का इतिश्री समझते रहे। इसके उलट हर धमाकों के बाद दिल्ली के लोदी कॉलोनी के स्पेशल सेल के दफ्तर के बंद कमरों में सादी वर्दी में तैनात कई पुलिस वाले बेसब्र और बेचैन होकर राउंड द क्लॉक नाचते रहे।

स्पेशल सेल के अफसर छोटी-छोटी जानकारियों को जोड़ते बुनते आतंकवादियों का पीछा कर रहे। हर एक फोन कॉल को बारीकी से परखा जाता रहा। हाईटेक होते आतंकवादियों से मुकाबले के लिए इंटरनेट की गतिविधियों पर गंभीर नजर रखी जाने लगी। आतंकवादियों की तलाश होती रही। एक निजी मुलाकात में आत्मविश्वास से लबरेज इंस्पेक्टर शहीद एमसी शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा था कि इंडियन मुजाहिदीन के लोग दिल्ली को निशाना बनाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे। इंडियन मुजाहिदीन के लोगों को पता है कि दिल्ली की सरहद में संचार उपकरण का इस्तेमाल करते ही धर दबोचे जाएंगे। 2008 देश की इतिहास में सबसे ज्यादा आतंकी हमले झेलने वाला साल है। 13 मई को जयपुर, 25 जुलाई को बेंगलूरू और 26 जुलाई को अहमदाबाद के सिरीयल धमाकों से सैकड़ों भारतीयों की जान लेकर हौसलामंद हुए आतंकवादियों ने आखिरकार 13 सितंबर को दिल्ली में एक के बाद एक करके नौ बम धमाके कर दिए। जुर्रत करते हुए टीवी चैनलों को मेल भेजकर जिम्मेदारी ले ली। इंस्पेक्टर एमसी शर्मा जैसों ने हमले की जुर्रत को निजी चुनौती के तौर पर लिया और आंतकवादियों को जीरो ईन करते हुए छठवें दिन बाटला हाउस में जाकर घेर लिया।

इनकाउंटर के तुरंत बाद उठे राजनीतिक सवाल से मायूस दिल्ली पुलिस के ज्वाईंट सीपी करनैल सिंह ने सफलता का राज शेयर करते हुए सिर्फ इतना ही कहा पाए कि अब के बाद आपको धमाकों के बाद इंडियन मुजाहिदीन का मेल नहीं मिलेगा। करनैल सिंह की यह दावेदारी 2011 में आज की तारीख तक सच है। पर हम जैसे रिपोर्टरों के लिए अफसोस की बात है कि दिल्ली पुलिस में ऐसा कोई अफसर नजर नहीं आ रहा जो दिल्ली हाईकोर्ट को ही आतंकी हमले के तौर पर चुनने की छोटी सी वजह बता पाए। क्योंकि सीमित समझ से सिर्फ इतना ही लगता है कि आतंकवादियों को इससे बड़ा मारक हमला करने के लिए हाल हाल तक दिल्ली का रामलीला मैदान मौजूद था। फिर भी उसने रिहर्सल वाले जगह पर ही हमला करने की जिद क्यों ठानी?

बहरहाल जांच की पूरी जिम्मेदारी केंद्रीय एजेंसी एनआईए के पास है। एनआईए से दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के पुराने दक्ष अफसरों की सफलता जैसी उम्मीद करने के सिवा फिलहाल दिल्ली वासियों के पास दूसरा कोई चारा नहीं है। ताकि आने वाले समय में एनआईए की तरफ से आतंकवादियों के हौसले पस्त करने वाली जरूरी पुलिसिया कार्रवाई का इजहार हो सके।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.


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