क्या आईपीएस अफसर पर जीवन भर तलवार लटकाए रखेंगे?

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मैं ने अपने पति अमिताभ जी से जुड़े कई मामले भड़ास पर रखे, जिन में उन्हें बिना किसी कारण के प्रदेश सरकार से प्रताडित और परेशान होना पड़ा पर उन्होंने बिना हार माने और बिना किसी के सामने झुके किस तरह अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया और कई मामलों में विजय भी हासिल की.

यदि आपको स्मरण हो तो मैं ने सबसे पहले अमिताभ जी से जुड़ा लेख लिखा था उनके गोंडा जिले के एसपी के रूप में वह प्रकरण जिस में उन्हें बिना किसी भी आधार के उनकी दरियादिली को हथियार बना कर उनको बदनाम करने की साजिश की गयी थी- हथियारों की सौदागरी और मीडिया ट्रायल.  इसके बाद मैं ने उनके अध्ययन अवकाश से सम्बंधित कई खबरें भड़ास पर भेजी जिसे अत्यंत उदारता के साथ यशवंतजी ने यहाँ प्रकाशित किया.

यह भी सही है कि मेरी हर बात को हर आदमी ने स्वीकार नहीं किया और कुछ लोगों को यह सब मेरा और अमिताभ जी का झूठा और छिछला प्रयास लगा, जिसके लिए इन लोगों ने मेरी और अमिताभ जी की निंदा करने के साथ-साथ यशवंत जी को भी अच्छी तरह लपेटा और उन पर यह आरोप लगाया कि चूँकि हमने उन्हें एक पुरस्कार दे दिया इसीलिए वे हमारी सभी गलत-सही बातों को छापते रहते हैं. जबकि ना तो वह कोई इतना बड़ा पुरस्कार था ना उससे कोई धनराशि ही जुड़ी है पर हाँ, उस पुरस्कार में हमारा प्यार जरूर छिपा था और इसी के जरिये हमें एक बहुत नजदीकी साथी मिले थे.

मेरे पति को अध्ययन अवकाश, जो जानबूझ कर उन्हें परेशान करने की नियत से उत्तर प्रदेश के दो ताकतवर और रसूखदार अधिकारियों श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह द्वारा न्याय का गला दबा कर रोका गया था, अंत में इसी साल के जून महीने में मिला और साथ ही करीब ग्यारह लाख रुपये भी, जो यहाँ अंततः मिली स्टडी लीव : पढ़ना उतना आसान नहीं रहा शीर्षक से छपा था.

लगभग इसी अवधि में मेरे पति अमिताभ जी ने एक और कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट, इलाहाबाद के आदेशों के बाद तब जीती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने अपने सचिव श्री विजय सिंह, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थो और नाराजगी के चलते गृह विभाग के प्रमुख सचिव श्री कुंवर फ़तेह बहादुर के साथ मिल कर उन्हें पिछले लगभग चार साल से लगातार परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं, के दिये गए आदेश को गलत पाते हुए रद्द कर दिया.

यह वास्तव में एक बहुत बड़ी विजय थी जब यह बात अभिलेखों पर साबित हो गयी कि श्री विजय सिंह ने अपने अधिकार क्षेत्र से बढ़ कर गलत आदेश किया. मायावती ने सचिव विजय सिंह के गलत आदेश को किया रद्द शीर्षक इस लेख से मालूम हो सकता है कि कुछ अधिकारियों के निहित स्वार्थों के सामने घुटने नहीं टेकने और अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में अमिताभ जी को किस-किस तरह से प्रताड़ना मिली और कैसे न्यायालय के हस्तक्षेप से ही उन्हें न्याय मिल सका.

कुछ लोगों ने मेरे द्वारा इन प्रकरणों को यहाँ रखने की निंदा की और इसे व्यक्तिगत मामला बताते हुए इससे किसी और का मतलब नहीं होने की बात कही और कहा कि भड़ास पर इसका कोई मतलब नहीं है. मैं इससे पूर्णतया असहमत हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ और सभी जानने वाले जानते हैं कि सुश्री मायावती के निकटस्थ और विश्वस्त अधिकारियों के रूप में श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह की उत्तर प्रदेश में क्या स्थिति है और इनके सामने खड़े होने का क्या मतलब है. मैं दावे से कह सकती हूँ कि इसके लिए बहुत कलेजे की जरूरत है और यदि कोई भी ऐसा करता है तो वह मामला स्वतः ही उस व्यक्ति का निजी मामला नहीं हो पर एक सार्वजनिक और सामाजिक सन्दर्भ का मामला बन जाता है.

इस श्रृंखला में एक और जीत अमिताभ जी ने कल कैट, लखनऊ में हासिल की जहां उनका मुक़दमा 177/2010 चल रहा था. इस मामले में पहले आठ अगस्त 2011 को एक बार पूरी बहस हो गयी थी और कैट द्वारा फैसला सुरक्षित कर लिया गया था. फिर इस पूरी बहस के दो दिन बाद उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सरकारी वकील ने यह दरख्वास्त लगा दी थी, उन्होंने सरकार की तरफ से दाखिल करने के लिए एक एफिडेविट दिनांक 01/11/2010 (यानि करीब आठ महीने पहले) को बना कर सरकार को भेजा था, जो सरकार के अधिकारी की तरफ से साइन हो कर 17/06/2011 (करीब सात माह बाद) को उन्हें मिला, जो संयोग से उनकी फ़ाइल में कहीं खो गया. इसीलिए उस एफिडेविट को कैट के सामने रखने की अनुमति दी जाए. इस पर फिर 17 अगस्त को बहस हुई और फैसला एक बार फिर सुरक्षित हुआ जो अब कैट द्वारा सुनाया गया.

मैं फैसले पर आने के पहले थोड़ा इस मामले को बताना चाहूंगी. अमिताभ जी के विरुद्ध अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1969 के नियम 10 के अंतर्गत उनके देवरिया जिले के पुलिस अधीक्षक पद से जुड़े कुछ प्रकरण में वर्ष 2000 में डीजीपी ऑफिस को शिकायतें मिली थीं. मूल रूप से ये दो शिकायतें थीं- एक तो यह कि उनके द्वारा एक सामाजिक संस्था पंजीकृत कराई गयी, उस संस्था की सचिव के रूप में मेरे नाम से 21 डिसिमल जमीन देवरिया के क़स्बा गौरीबाजार में खरीदी गयी पर उस भूमि के खरीदने और उक्त संस्था के अध्यक्ष पद ग्रहण करने की कोई सूचना उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन को नहीं दी गयी. दूसरा आरोप यह लगा था कि देवरिया के थाना रामपुर कारखाना में एक मुकदमे में जमा एक मारुती कार को उनके द्वारा स्वयं ख़रीदे जाने के उद्देश्य से कम कीमत में नीलाम करा दिया गया और एक कथित रिश्तेदार के जरिये ख़रीदा गया.

इन शिकायतों पर गृह विभाग, उत्तर प्रदेश शासन ने उत्तर प्रदेश सतर्कता विभाग से जांच कराई और यह जांच उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान ने की, जिसने 02/01/2004 को अपनी जांच आख्या सतर्कता विभाग को सौंप दी. अपनी जांच में सतर्कता अधिष्ठान ने साफ़ लिखा- “उल्लिखित तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में शासन द्वारा श्री अमिताभ ठाकुर, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, देवरिया को भविष्य के लिए सचेत किये जाने की संस्तुति की जाती है.”

उस जांच में यह बात भी सामने आ गयी कि जिस भूमि को मेरे नाम की भूमि कही जा रही थी वह मूल रूप से दो संस्थाओं के नाम थी, ना कि मेरी निजी भूमि. इसी तरह मारुती कार के सम्बन्ध में यह बात सामने आई कि इसे नीलाम करने का कानूनी आदेश मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट, देवरिया ने दिया था, जिस पर जिला मजिस्ट्रेट देवरिया के आदेश पर उसकी नीलामी एसडीएम देवरिया ने परिवहन विभाग के आरआई गोरखपुर के इंस्पेक्शन में लगाईं गयी कीमत के अनुसार की. यह बात भी विजिलेंस की जांच में आई कि चंद्रभान राय, जिन पर हमारे रिश्तेदार के रूप में वह मारुति कार खरीदने का आरोप लगा था, से हमारी किसी भी प्रकार की रिश्तेदारी या सम्बन्ध की बात जांच के मध्य प्रकाश में नहीं आई.

बात वहीँ समाप्त हो जानी चाहिए थी पर चूँकि अमिताभ जी ने किसी से कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं किया, लिहाजा मामला खींचता ही रहा. पहले उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गयी जो 27/10/2004 को शुरू हुई, पर मामला लटकाया जाता रहा और अंत में जा कर 25/05/2007 को इन्हें चेतावनी देते हुए मामला समाप्त किया गया. लेकिन अभी इस मामले में और भी मजेदार बातें होनी थी.

अमिताभ जी गोंडा में 30/12/2004 को सस्पेंड हुए थे पर उनकी जांच जान-बूझ कर खींची जाती रही थी और अंत में जब इन्हों ने कैट, लखनऊ में कंटेम्प्ट केस किया तो यह जांच 22/05/2009 को अमिताभ जी को दोषमुक्त मानते हुए खत्म की गयी. यानी पांच साल बाद वे निर्दोष साबित हुए और सस्पेंशन के समय की पूरी तनख्वाह भी मिली. लेकिन इसके साथ उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियों, जैसे श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह, को शायद यह दिक्कत हो गयी कि अब अमिताभ जी के खिलाफ कोई जांच नहीं बची थी और अब उन्हें नियम से डीआईजी पद पर प्रमोट करना बाध्य हो गया था. चूँकि वे किसी कीमत पर ऐसा नहीं चाहते थे, इसीलिए अपने पद और रसूख का बेजा इस्तेमाल करते हुए जिस दिन 22/05/2009 को अमिताभ जी की गोंडा वाली जांच समाप्त हुई, ठीक उसी दिन दो साल पहले 25/05/2007 को चेतावनी दे कर समाप्त की गयी देवरिया वाली जांच अचानक फिर से शुरू कर दी गयी. तर्क यह दिया गया कि इस मामले में जब राज्य सरकार ने 25/05/2007 को अमिताभ जी को चेतावनी दी थी तब गृह मंत्रालय, भारत सरकार के 13/07/2007 को राज्य सरकार को यह पत्र लिखा था कि चूँकि चेतावनी कोई सजा नहीं होती, अतः इस अधिकारी को या तो परिनिन्दा का दंड दिया जाए या फिर पूरी तरह माफ किया जाए. मजेदार बात यह रही कि राज्य सरकार में यह चिट्ठी दो साल तक यूँ ही दबी रही थी पर अमिताभ जी के गोंडा वाली जांच में उनके दोषमुक्त होने पर यह दो साल पहले की यह चिट्ठी अचानक सामने आ गयी.

अमिताभ जी ने इस जांच के खुलने के तुरंत बाद सरकार को यह लिखा था कि अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1969 के नियम 24 के तहत कोई भी सरकार अपने पूर्व के फैसले को एक साल के अंदर ही पुनरीक्षित कर सकती है, अतः राज्य सरकार का दो साल बाद मामले का पुनरीक्षण करना प्रथम-दृष्टया ही गलत है. पर राज्य सरकार ने इनकी बात नहीं सुनी थी जिस पर अमिताभ जी कैट गए थे और इसमें सीधे-सीधे प्रमुख सचिव, गृह श्री कुंवर फ़तेह बहादुर पर यह आरोप लगाया था उन्होंने उनकी प्रोन्नति रोकने के लिए यह षडयंत्र किया.

अब जा कर कैट ने अमिताभ जी की बात को कानूनन सही मानते राज्य सरकार के आरोप पत्र को खारिज कर दिया है. अपने आदेश में कैट के न्यायाधीश अलोक सिंह तथा न्यायाधीश एस पी सिंह के दो-सदस्यीय बेंच ने कहा-“आखिर किसी भी बात का अंत होना चाहिए. यह एक अंतहीन प्रक्रिया नहीं हो सकती जिस में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी के ऊपर बिना उसकी गलती के राज्य सरकार की मनमर्जी से नियमों को दरकिनार करके सालों तक लगातार तलवार लटकाया गया हो”.

कैट ने यह कहा कि यह मामला अमिताभ की किसी देरी या गलती के बगैर राज्य सरकार द्वारा सालों तक लंबित रखा गया जो गलत है. कैट ने इस बात का भी उल्लेख किया कि इस मामले की ड्राफ्टिंग और बहस अमिताभ ने खुद की. कैट ने राज्य सरकार को तीन आईपीएस अधिकारी अजय आनंद, राम कुमार तथा लव कुमार के मामलों में विभागीय कार्रवाई को चेतावनी दे कर समाप्त करने और इसी को आधार बना कर अमिताभ की विभागीय कार्रवाई दुबारा शुरू कर देने को भी गलत बताया. कैट ने अन्य कई स्थानों पर अपने इस निर्णय में राज्य सरकार के इस कृत्य को गलत बताते हुए उसकी निंदा की. कैट ने कहा- “इसका यह अर्थ है कि या तो राज्य सरकार इन मामलों में क़ानून का सही ढंग से पालन नहीं कर रही है अथवा वादी (अमितभ) के लिए अलग मानदंड के अनुसार कार्रवाई कर उनके साथ अन्याय कर रही है."

इस प्रकार तकनीकी रूप से अमिताभ जी पर अब कोई भी जांच लंबित नहीं है. कानूनन ऐसी स्थिति मे अमिताभ जी को प्रोन्नति दिया जाना चाहिए, पर जैसा हम लोगों ने उनके स्टडी लीव मामले में देखा था, राज्य सरकार ने एडी-चोटी का जोर लगाने और सभी जगह से हारने के बाद ही स्टडी लीव दिया था. मैं यहाँ जो भी बात लिखी है, उन में से प्रत्येक बात को साबित करने के लिए मेरे पास अभिलेख हैं और यदि मेरी कोई बात गलत निकलती है तो मैं कोई भी सजा भुगतने को तैयार हूँ.

पर अमिताभ जी की इस कहानी को कहने का मुख्य उद्देश्य उनकी कोई तारीफ़ करना और उनकी व्यक्तिगत कहानी सुनाना नहीं है (यद्यपि ये दोनों बातें कहीं ना कहीं स्वतः ही हो जा रही हैं), इसका असल उद्देश्य यह बताना है कि कैसे व्यवस्था में कई बार ताकतवर और रसूखदार लोग अपनी ताकत और पहुंच का बेजा इस्तेमाल करके व्यवस्था से खेल रहे हैं. इसके साथ मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि यदि हम इन स्थितियों से उबरना चाहते हैं तो हमें इसके लिए किसी बाहरी ताकत पर आधारित होने की नहीं, अपने अंदर शक्ति पैदा करने की जरूरत है. लेकिन इसके साथ ही विपरीत स्थितियों को झेलने और इस दौरान उत्पन्न हुई कठिनाईयों का भी सहर्ष सामना करने की नितांत जरूरत है. यदि हम में से अधिकाँश लोग ऐसे मनोभाव विकसित कर लें तो हम सत्ता और ताकत में मदांध लोगों का बिल्‍कुल मुकाबला कर सकते हैं. अन्यथा कोई भी संस्था हमारी मदद नहीं कर पाएगी.

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार

लखनऊ


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