''विवाहेतर संबंध क्‍या किसी को पीटने का अधिकार दे देता है?''

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: दरोगा ने कहा - पत्‍नी बदचलन है इसलिए मैं तो उसे मारूंगा : मेरे पति अमिताभ जी के दफ्तर में मीनाक्षी नाम की एक महिला कॉन्स्टेबल काम करती है. कुछ दिनों पहले भड़ास पर मेरे पति ने उसकी कहानी पुलिस कांस्टेबल मीनाक्षी की संघर्ष यात्रा शीर्षक से आप लोगों को बतायी थी. मई में लिखे इस लेख के बाद करीब चार महीने बीत गए और मीनाक्षी की दशा बद से बदतर होती जा रही है.

मुझे यह उचित लगा कि मैं एक बार फिर आप लोगों के सामने उससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बातें रखूं और इसके आधार पर मीनाक्षी की न्याय के लिए लगातार चल रही लड़ाई में अपना योगदान कर सकूँ. साथ ही मैं मीनाक्षी की कहानी के जरिये कुछ बुनियादी प्रश्न भी उठाना चाहती हूँ जो आप भी हमारे देश और समाज में बहुत प्रासंगिक है. मीनाक्षी का प्रेमविवाह हुआ था. उसकी शादी आज से छह साल पहले हुई थी. उस समय वह आगरा में तैनात थी और उसका होने वाले दरोगा पति अमित भी. मीनाक्षी खुद यह स्वीकार करती हैं कि उन दोनों के बीच प्रेम हो गया और फिर इसके बाद शादी.

इसी जगह हमारे पारंपरिक और पुरातनपंथी सोच की एक महत्वपूर्ण बानगी सामने आती है. चूँकि मीनाक्षी का प्रेम विवाह हुआ था, इसीलिए शायद उसके पति के घर वाले इस बात से आहत और प्रभावित रहे. आज भी हमारे देश में कई सारे परिवारों में यदि लड़के की शादी परिवार की मर्जी से नहीं हुई और लड़के ने अपनी मर्जी से ब्याह कर लिया तो उसे एक स्वाभाविक घटना नहीं मान कर एक बहुत गंभीर, अशोभनीय और नाक कटवा देने वाली घटना के तौर पर लिया जाता है. इस प्रकार जहां पश्चिम के देशों में स्वाभाविक तौर पर लड़के और लड़कियां अपनी पसंद के अनुसार ही अपना जीवन-साथी चुनते हैं वहीँ हम आज भी उसी पिछड़ी हुई सोच में उलझे हुए हैं जहां यदि लड़के ने प्रेम विवाह कर लिया तो खानदान की नाक कट गयी.

सच पूछिए, तो यह “खानदान” होता क्या है, मैं सही मायने में इसका मतलब तक नहीं समझ पायी हूँ. परिवार की बात तो समझ में आती है- माता, पिता, भाई, बहन, अन्य नजदीकी रिश्तेदार जो एक दूसरे के साथ रहते हैं या सुख-दुःख में मदद करते हैं. लेकिन जिस प्रकार से हम परिवार के लिए कम और “खानदान” के लिए ज्यादा परेशान घूमते दिखते हैं वह मेरी निगाह में तो मात्र हमारा आतंरिक अहम है जो “खानदान” जैसी कल्पित अवधारणा के नाम पर प्रस्फुटित होता रहता है और हम इसी के नाम पर सभी मानव मूल्यों को त्याग कर, सभी मानव अधिकारों को तिलांजलि दे कर हर प्रकार के जुल्म और अपराध करते रहते हैं. “खानदान की नाक” होती भी पता नहीं कैसी है कि किसी के किसी से प्रेम करने अथवा अपनी मर्जी से शादी करने से “कट” जाती है. मैं समझती हूँ कि अब समय आ गया है जब हम खुले ह्रदय और स्वच्छ मन से इस काल्पनिक अवधारणा के विषय में विचार करें और खानदान की नाक कटने के नाम पर जो दुनिया भर के अत्याचार और सितम ढाए जा रहे हैं, उससे पूरी तरह उबरें.

मीनाक्षी के कथन के अनुसार उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ. वह बताती है- “मेरे पति के घर के लोग कभी भी मुझे पसंद नहीं करते थे, लिहाजा उन्होंने शुरू से ही मुझे प्रताडित करना शुरू कर दिया था. अमित के पिता, उसकी माँ और उसके भाई ना सिर्फ मुझे ताने देते थे बल्कि मेरे पति को भी इस तरह के आचरण के लिए भड़काते थे. आगे चल के मेरे पति को शराब पीने की आदत हो गयी और वे मुझे शराब के नशे में धुत्त हो कर काफी मारना पीटना शुरू कर दिए. कभी-कभी तो मेरी सास और मेरे देवर भी अकेले में मुझ पर हाथ छोड़ देते. मेरे पति मुझे हाथ-पाँव के अलावा बेल्ट, जूते या किसी भी अन्य सामन से मारते-पीटते.''

यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात गौर करने लायक है और हमारे समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण भी. अकसर बहुत ठीक-ठाक और भले किस्म के लगने वाले लोग भी अपनी शरण में आई एक असहाय महिला के साथ इस कदर निर्मम और निष्ठुर हो जाते हैं जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. मीनाक्षी की ही बात लें. वह कहती है- “वैसे तो मेरी सास श्रीमती महावीरी और ससुर राजवीर सिंह जो स्वयं भी पुलिस में आरक्षी थे, देखने और सुनने में बाहरी तौर पर काफी भले और सामाजिक व्यक्ति लगते थे किन्तु उसके पास रहने के बाद मुझे ज्ञात हुआ कि इन्सान की हैवानियत क्या होती है.”

किसी भी औरत पर अत्याचार खास कर इसीलिए भी अधिक गंभीर और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हमारी परम्परा में एक महिला अपना सब कुछ छोड़कर ससुराल जाती है और वहॉं अपने ससुराल वालों के प्रेम और विश्वास के सहारे जीवन जीना चाहती है. इस तरह जब वह अपने ससुरालवालों की शरण में, उनकी कृपा पर रह रही होती है, तब यदि उस पर कोई जुल्म किया जाता है तो मेरी निगाह में इससे जघन्य कोई अन्य अपराध नहीं है. अपने घर में, अपनी शरण में आये व्यक्ति पर, उसकी असहायता के क्षणों में उस पर किसी भी प्रकार का अत्याचार अक्षम्य है. लेकिन यह भी सही है कि आज भी हमारे समाज में यह सब हो रहा है, कभी खुल पर तो कभी छिपे रूप में.

मीनाक्षी कहती है कि शुरू के दो साल तो वह यह मारपीट चुपचाप सहती रही किन्तु वर्ष 2008 के आते आते उसकी पीड़ा और प्रताड़ना इतनी बढ़ गयी कि वह बर्दाश्त करने लायक नहीं रही. पहली बार वह 11/02/2008 को एम0एम0सी0 अस्पताल गाजियाबाद गयी, जहॉं उसने मुख्य सी0एम0ओ0 को लिखित तौर पर कहा कि उसके पति ने उसे मारा-पीटा गया है और उसका डाक्टरी मुआयना किया जाये. इसके बाद भी उसके पति द्वारा मारने-पीटने का सिलसिला जारी रहा. जून 2008 में उसके पति ने इतनी बेरहमी से मारा कि उसके कान के पर्दे लगभग फट से गये थे और उसे नरेन्द्र मोहन अस्पताल गाजियाबाद में लंबा इलाज कराना पड़ा. इसके दो महीने बाद ही उसके पति ने उसे पुनः बहुत निर्ममता से मारा जिसके सम्बन्ध में उसने पुनः एम0एम0जी0 अस्पताल  में दिनांक-09/08/2008 को अपना मेडिकल कराया.

मीनाक्षी कहती है कि उसके पति अमित कुमार द्वारा अपने माता-पिता और भाई के साथ मिलकर उसे लगातार प्रताडित किया जाता रहा पर उसने उन्हीं अवसरों पर डाक्टरी करायी जब काफी गम्भीर रूप से चोट लगती थी. इसी क्रम में उसने  दिनांक-30/12/2008 को जिला चिकित्सालय मुरादाबाद में पुनः मेडिकल कराया था. लगभग 10 दिन बाद ही जब उसे एक बार पुनः बेहरमी से मारा गया तो उसने निश्चय किया कि अबकी डाक्टरी ही नहीं कराऊगी बल्कि प्रताडित करने वाले लोगो के खिलाफ एफ0आई0आर0 भी कराऊगी.

उसने 10/01/2009 को पति द्वारा मारे-पीटे जाने के बाद 12/01/2009  को प्यारे लाल शर्मा चिकित्सालय, मेरठ में अपना डाक्टरी मुआयना कराया, जिसमें कुल 9 चोट बतायी गयी. इन सभी चोटों के आकार इतने थे जिसे देखकर कोई भी यह कह सकता है कि उसे किस तरह से मारा-पीटा गया है. क्रम संख्या 5 पर उसके बांये हाथ के अग्र भाग में आयी चोट का आकार 10 सेंटीमीटर गुने 6 सेंटीमीटर था, जो यह साबित करता है कि उसका पूरा बायॅं हाथ ही कुचल सा दिया था. ऐसे ही क्रम संख्या- 7 पर बांये पॉंव पर चोट का आकार 7 सेंटीमीटर गुने 5 सेंटीमीटर था जो उस बर्बरता को दिखाता है. इस प्रकार यह सब हैवानियत सहने के बाद मीनाक्षी ने 12/01/2009  को अपना मेडिकल कराया और 14/01/2009 को एसएसपी के आदेश के बाद ही थाना दौराला पर मु0अ0सं0-21/09 धारा-323, 504, 506, 498 ए आईपीसी व 3/4 दहेज अधिनियम पंजीकृत हुआ. उस पर से तुर्रा यह कि मामले के विवेचक द्वारा 6/4/2009 को इस मामले में अन्य मुल्जिमों के नाम निकाल कर मात्र उसके पति के विरुद्ध सीमित धाराओं में ही आरोप पत्र प्रेषित कर दिया गया.

जब उसके पति अमित कुमार व परिवार वालो पर एफ0आई0आर0 हो गया तो उन्होंने मीनाक्षी से मिल कर उसे समझा लिया कि वह घर लौट आये, ऐसा आगे नहीं होगा. वह उस समय गर्भवती थी और उसे भी लगा था कि अपने होने वाले बच्चे के भविष्य के लिये अपने ससुराल लौट जाऊ. वापस आने के लगभग एक-दो महीने बाद वही बात दोहरानी शुरू हो गयी.  मीनाक्षी कहती है-“यह मेरा असीम दुर्भाग्य समझा जायेगा जिस दिन मेरी संतान ने जन्म लिया, उस दिन भी अस्पताल जाने से पूर्व मेरे पति ने मुझे बेहरमी से मारा.”  लडकी के पैदा होने के बाद वह मार-पीट चुपचाप सहन करती रही, लेकिन इस साल अप्रैल में एक बार मारपीट का सिलसिला बहुत बढ़ गया और दिनांक 28/04/11 को उन लोगों ने उसे बहुत ही बेहरमी से मारा. जब वह ये सारी चोट लेकर अपने कार्यालय आयी तो वहॉं सभी लोगों ने कहा कि इस अत्याचार का प्रतिरोध करना चाहिये.

इसके बाद 30/04/2011 को उसने अपना मेडिकल कराया. इस मेडिकल में भी 7 चोटें हैं, जिनके आकार यह बताने को सक्षम है कि उसे कितनी बेहरमी से मारा गया. एक चोट का आकार 12 गुने 7 सेंटीमीटर है तो अन्य चोट का आकार 7 गुने 6 सेंटीमीटर. इसके बाद मीनाक्षी ने थाना दौराला पर 03/05/2011 को एफ0आई0आर0 संख्या 327/11 दर्ज कराया. यह मुक़दमा भी पुलिस वाले नहीं लिख रहे थे, क्योंकि शायद उनकी निगाह में औरत का पति से पीटा जाना एक घरेलू और आतंरिक मामला है. मेरे पति अमिताभ जी ने इस मामले में थानाध्यक्ष को पत्र लिखा और फोन से वार्ता की. तब जा कर तो मुक़दमा लिखा गया और उसमे भी विवेचक प्रभाकर कैंथला ने मामला गलत बताते हुए अन्तिम रिपोर्ट लगाते हुये मामले को खत्म करने की कोशिश की थी. इस प्रकार मीनाक्षी के शरीर में जो गहरी चोटें थी जो उसे निर्ममता से मारे जाने की स्पष्ट निशानी थी, वे भी विवेचक को नहीं दिखाई दीं.

इस मामले में इसके अलावा भी छोटी-छोटी कहानियाँ हैं. जहां मीनाक्षी अपने तमाम अत्याचरों को लेकर लगातार संघर्षरत है, वहीं उसके पति इसे उसके चरित्र से जोड़े हुए हैं. उन्होंने तमाम स्थानों पर लिखित तौर से यह कहा है उनकी पत्नी का विवाह से पूर्व कई लोगों से सम्बन्ध था. मीनाक्षी खुद कहती है कि उसका एक सिपाही से विवाह से पूर्व स्नेह सम्बन्ध था.

वह बताती है कि यह सम्बन्ध शादी से पहले ही आज से करीब आठ साल पहले खत्म हो गया था पर साथ ही वह यह भी खुल कर कहती है- “एक स्वतन्त्र महिला के रूप में यह मेरा मौलिक अधिकार है कि मैं किसी पुरूष के साथ स्नेह पूर्ण सम्बन्ध रख सकूँ और मैं इसे किसी प्रकार से अनुचित नहीं मानती.” वह यह भी कहती है-“यदि कोई भी व्यक्ति इसे मेरी कमजोरी बनाने की कोशिश करता है अथवा इसे मेरी चरित्रहीनता के साथ जोड़ने की कोशिश करता है तो मैं इसे किसी भी कीमत पर सही नहीं मानती हूं और न ही इसे बर्दाश्त करूंगी. किसी भी स्वाभिमानी महिला की तरह मैं अपने चरित्र को लेकर सजग हूं और यद्यपि अपनी शादी के बाद मैंने किसी भी अन्य पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं बनाया पर एक बालिग महिला के रूप में मुझे प्रेम सम्बन्ध बनाने में पूरा अधिकार है.”

मैं समझती हूँ कि मीनाक्षी यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठा रही है जिस पर हमारे समाज को गौर करना होगा. वैसे वह कह रही है कि उसके विवाह के बाद किसी भी अन्य पुरुष से सम्बन्ध नहीं रहे पर यदि एक पल को यह मान भी लें कि उसके इस तरह के सम्बन्ध बने तो क्या यह किसी भी प्रकार से उसके पति अथवा परिवार वालों को उसे प्रताडित करने अथवा मारने-पीटने का अधिकार देता है. क्या इस आधार पर कोई औरत निर्ममतापूर्वक मारी जाए कि उसके कथित तौर पर अन्य लोगों से सम्बन्ध हैं? मेरी निगाह में यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिस पर ना सिर्फ खुल कर चर्चा होनी चाहिए बल्कि जिस पर समाज कि सोच को भी बदलने की जरूरत है.

सबसे कष्ट का विषय यह है कि पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी भी इन कथित संबंधों को मीनाक्षी की गलती और उसके साथ हो रहे अत्याचार का एक कारण बता देते हैं. मैं स्वयं उसे ले कर मेरठ के अपर पुलिस महानिदेशक गुरबचन लाल के पास गयी थी और उन्होंने छूटते ही मीनाक्षी को एक प्रकार से दोषारोपित सा कर दिया था कि तुम्हारे तो दूसरे लोगों से सम्बन्ध हैं. वे उसके पूर्व संबंधों पर अधिक बल दे रहे थे और उस बेचारी औरत के शरीर पर आई चोटों के प्रति बेपरवाह से दिख रहे थे. जब मैंने उन्हें कहा कि प्रेम सम्बन्ध अलग बात है और यह किसी भी प्रकार से किसी को पीटने का हक नहीं देता, जब वे थोड़ी सी हरकत में आये थे, यद्यपि इसके बाद भी मीनाक्षी के मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी गयी थी.

मैं अपनी तरफ से मीनाक्षी की पूरी मदद करने की कोशिश कर रही हूँ और उससे भी खुशी की बात यह है कि तमाम परेशानियों और हर तरह की विपरीत स्थितियों के बाद भी मीनाक्षी ने लड़ने का हौसला नहीं खोया है. मैं समझती हूँ कि मीनाक्षी का यह संघर्ष का माद्दा ही अंत में उसके काम आएगा और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज नहीं तो कल वह अपनी इस लड़ाई में जरूर सफल होगी.

पर यह भी सही है कि मीनाक्षी की कहानी अकेले उसकी कहानी नहीं है. आज भी हमारे देश में ना जाने कितनी ही मीनाक्षी अपने ससुराल वालों से अलग-अलग कारणों से प्रताडित हो रही हैं- कभी दहेज के लिए, कभी प्रेम विवाह हो जाने और इसके कारण कई सारे लोभ के फलीभूत नहीं हो पाने के कारण, तो कभी सुंदरता के नाम पर तो कभी लड़का पैदा नहीं हो पाने पर. इसी तरह से आज भी तमाम मीनाक्षी विवाहेतर संबंधों के नाम पर मारी-पीटी जा रही हैं. “अस्तित्व” फिल्म ने इससे मिलती-जुलती समस्या बड़े करीने से उठायी थी जहाँ पति विवाह के बाद भी लगातार मनमर्जी से अन्य महिलाओं से सम्बन्ध बनाता रहा पर जब उसे अपनी पत्नी के विषय में ऐसी बात मालूम हो जाती है तो उसका पूरा रुख ही बदल जाता है. यहाँ तो स्थिति उससे भी विकराल है जहाँ उसका पति कथित विवाहेतर संबंधों के नाम पर उसे लगातार क्रूरता से मार-पीट रहा है और थाना-पुलिस ने उसकी सुनवाई इस नाम पर नहीं कर रही है कि उसके तो बाहर सम्बन्ध हैं या रहे हैं. इस मामले में मुझे मीनाक्षी की यह बात बहुत पते की लगी जो उसने मुझे कहा था- “ बाकी सारी बातें जो मैं कह रही हूं, वे भले ही झूठ साबित हो जाये किन्तु एक चीज जिसे कोई नहीं झुठला सकता वे हैं मेरे शरीर पर आये तमात चोट जो आधा दर्जन मेडिकल रिपोर्ट में मौजूद हैं.”

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस


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