कौन बनेगा पीएम : नहीं जनाब! मोदी बनाम नीतिश में होगी जंग

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आलोक कुमारराहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी। ना जाने कहां से इस सियासी जुमले का प्रादुर्भाव हो गया। जबकि साफ दिख रहा है कि भावी प्रधानमंत्री के लिए असली लडाई तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बीच छिड़ी है। फिर न जाने क्यों नकली भूत बनाकर राहुल गांधी को खडा कर दिया गया। नरेन्द्र मोदी और नीतिश कुमार अखाड़ा में आमने-सामने हैं।

इन दोनों का मानना है कि अगला प्रधानमंत्री अंग्रेजी के एन नामाक्षर वाले एनडीए से होगा और बनने वाले प्रधानमंत्री का नाम भी एन नामाक्षर राशि से शुरू होगा। ऐसी कोई भवष्यवाणी करने वाले प्रकांड ज्योतिषाचार्य को यह गणना करने में मुश्किल आ रही है कि एन नाम का यह भावी प्रधानमंत्री पश्चिम के गुजरात से चलकर दिल्ली आएगा या पूरब के बिहार से। इसलिए बिहार के एन गुजरात के एन पर विफर गए। ऐसा करते वक्त बिहार के एन यह आंकलन करना भूल गए कि गुजरात के एन की बिहार के एन से ज्यादा बीजेपी के एल यानी लालकृष्ण आडवाणी को लेकर चिंता है। बीजेपी के एल ने रथयात्रा पर निकलने की एकतरफा घोषणा करके संघ समेत पार्टी के अगली कतार के तमाम दिग्गजों को चमका रखा है।

धवल साफ दिख रहे एनडीए के एन नाम के इन दो महारथियों के बीच छिड़ी जंग के बावजूद न जा क्यों धड़ल्ले से बताया जाने लगा कि 2014 का संसदीय चुनाव राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के बीच रहेगा। ऐसा कहने और सोचने वालों का मतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सियासत से थकने लगी हैं। अमेरिका से ऑपरेशन कराके लौटने के बाद उनमें विरासत को लेकर चिंता जगी है। वो अब युवराज राहुल गांधी में आत्मविश्वास जगाने की भरसक तैयारी में हैं ताकि 2014 संसदीय चुनाव में कांग्रेस की नैया के खेवनहार की स्टेयरिंग पर डॉ. मनमोहन सिंह की जगह राहुल गांधी ला बिठाया जा सके। फिलहाल यह कपोल कल्पना लगता है क्योंकि सोनिया गांधी की नजर में व्यापक बदलाव का कोई संकेत नजर नहीं आ रहा है।

दूसरी तरफ अहमदाबाद की घटना से यह सियासी भाव उमड़ा कि तीन दिनों तक सदभाव उपवास का उपहास कर नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी की सोच की पूरी धारा ही बदल दी। बताया जाने लगा कि नरेन्द्र मोदी के प्रताप से आरएसएस की व्यक्ति के बजाय विचार प्रधान रहने की पूरी सियासत ही चटक गई। नरेन्द्र मोदी ने पूरी पार्टी को खुद के पीछे इस तरह से खड़ा कर लिया कि बीजेपी विचार के बजाय व्यक्ति पूजा की मुद्रा में खड़ी हो गई। नरेन्द्र मोदी को ही भारत का भावी प्रधानमंत्री बनाने की अनुगूंज होने लगी। नरेन्द्र मोदी के जीवन के अबतक के सबसे बड़े सियासी तमाशे से जो समां बंधा है उसे पंचर करने के लिए भाई लोगों ने अंदर बाहर का पूरा जोर लगा रखा है। मोरचा दर मोरचा खुलने का सिलसिला तेज है। नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री मान लेने पर परस्पर विरोधी बातें की जाने लगी हैं।

इससे अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर मेहनत कर रहे बीजेपी के कई नेताओं का सूखा गला तर होने लगा है। मसलन संघ के निर्देश पर दिल्ली में बुजुर्ग लालकृष्ण आडवाणी को किनारे करने पर आमादा और नेता नंबर वन की होड़ में फंसे अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू में नरेन्द्र मोदी के अचानक आसमान से टपक जाने की वजह से जो हवा गुल थी उसमें जान लौटने लगी है। नरेन्द्र मोदी ने दिन में तारे दिखा दिए हैं।

ये सब के सब एकसुर में केंद्र की राजनीति में गुजरात के मॉ़डल को अपनाने की पैरवी करने लगे हैं। सूखते गले से ही सही, सबको बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम जपने को मजबूर होना पड़ रहा है। रथी बनकर एकबार फिर से संघ को चमकाने की तैयारी कर रहे लालकृष्ण आ़डवाणी भी हक्के बक्के नजर आए और झंझावात से बचने के लिए खुद को चुपचाप नरेन्द्र भाई मोदी के पीछे छिपा लिया। भारी अंगुलियों से ब्लॉग पर टाईप कर गए कि वो सदा की तरह अमेरिका की नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उपयुक्त उम्मीद्वार बनाने की राय से भी सहमत हैं।

आगे चाहे जो हो पर नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय नेतृत्वहीनता के दौर से गुजर रही बीजेपी को सही वक्त पर चोट किया है। यह वो वक्त है, जब संघ की निजी पसंद बनकर दिल्ली के घाघों की वाट लगा रहे नागपुर के नितिन गडकरी पार्टी का कायाकल्प करने में विफल रहने के बाद खुद का कायाकल्प करने के लिए अचानक अस्पताल का रुख कर लिया।  मीडिया मंडली में यह मजाक चल रहा है कि बीजेपी अध्यक्ष गडकरी ने सोनिया गांधी की देखादेखी अस्पताल में दाखिल होने का शौक पाल लिया। कहते हैं कि आडवाणी के रथयात्रा पर निकलने के एकतरफा फैसला पर गडकरी को मजबूरी में ठप्पा लगाना पड़ा। इस पर संघ के संरक्षक नेताओं ने नितिन को निक्कमेपन का तमगा दिया तो घबराए मन से अस्पताल में इस सोच के साथ दाखिल हो गए कि शायद कांग्रेस में सोनिया गांधी की तरह ही बीजेपी को भी उनकी गैरमौजूदगी खलने लगेगी।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.


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