हालत विकट है, संस्थानों की प्रतिष्ठा ध्वस्त होने का दौर है

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आलोक कुमारहम उस दौर में प्रवेश करते जा रहे हैं जहां समाज में सही-गलत की दिशा तय करने वाले पारंपरिक तंत्र की प्रतिष्ठा बचाए नहीं बच रही। सदैव आपके साथ होने का दंभ भरने वाली दिल्ली पुलिस हो। या सच्चाई सामने लाने के लिए बनी सीबीआई, या फिर भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली सीवीसी हो या न्याय के मंदिर का प्रतीक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट या निचली अदालत।

इन सभी संस्थानों की प्रतिष्ठा पर सियासत प्रहार कर रही हैं। बारी बारी से प्रतिष्ठित संस्थाओं की छवि धूल धूसरित होती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के कालेधन की जांच की निगरानी के लिए विशेष जांच दल बनाने के प्रस्ताव को सरकार ने सियासी जिरह से ठुकरा दिया। सरकार के आगे सुप्रीम कोर्ट विवश है। हालत विकट है। सीवीसी और सीबीआई जैसी शीर्ष संस्था के प्रमुखों को लोकपाल की संरचना तय करने वाली संसदीय समिति के समक्ष गुहार लगानी पड़ रही है। चित्कार कर याद दिलाना पड़ रहा है कि चोरों को बेनकाब करने और सजा दिलाने की सफलता में उनका ट्रेक रिकार्ड का ख्याल किया जाए। इन संस्थाओं के स्वायत्त स्वरूप की रक्षा की जाय।

लोकपाल के दायरे में लाकर बौना बना देने की कोशिश को खत्म किया जाय। देश की इन दो सुनामी संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। यह जरूरी है कि देश और समाज के गलत तत्व को रोकने के लिए कारगर तंत्र बने। बदलते वक्त की जरूरत के साथ नए उपयोगी तंत्र बनाई जाए। लेकिन नए को बनाए बगैर पुराने की छवि मलीन की जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या यह किसी साजिश के किया जा रहा है ? इस पर संजीदगी से सोचने की जरूरत है।

इसके तहकीकात के लिए एक तथ्य है। 1997 में प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा के पद से हटने की एक बडी वजह बोफोर्स मामले की जांच कर रही है सीबीआई की बढी सक्रियता थी। सीबीआई की टीम ने स्विट्जरलैंड जाकर बोफोर्स दलाली प्रकरण से जुड़े स्विस बैंक खातों की प्रमाणिक दस्तावेज लाने के साथ दस जनपथ जाकर कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से पूछताछ करने की जुर्रत तक की थी। क्या यही जुर्रत अब सीबीआई की टोपी उछाले जाने की वजह बन रही है ? हकीकत को समझने के लिए आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि बीते सात सालों के यूपीए शासन में सीबीआई की प्रतिष्ठा लगातार नीचे गिरती जा रही है। सिर्फ सीबीआई ही नहीं देश की अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों की खराब होती छवि के अनंत मिसालें हैं। उनमें से हिल्कोर मारने वाली कुछ मिसालें इस तरह हैं।

एक, दिल्ली पुलिस ने वोट के लिए कैश मामले की जांच में अदालत से कहा है कि आरोपी अमर सिंह के खाते में कोई अनियमितता नहीं है। यह वहीं दिल्ली पुलिस है,जो किसी को पकड़ ले तो अपराध कबूल करवाने के लिए कुख्यात है। इसका चार्जशीट इतना ठोस होता है कि अदालत के सामने पकड़े गए शख्स को बेकसूर साबित करने का गुंजाईश नहीं के बराबर रहती है।

दूसरा, सीबीआई ने टूजी घोटाले की सुनवाई के दौरान विशेष अदालत से सांसद कनिमोझी पर महिला होने की वजह से रहम करने का आग्रह किया है। सीबीआई का ताजा रुख अदालत में बाकी आरोपियों के जमानत का विरोध और केंद्र सरकार की प्रमुख सहयोगी दल के नेता की बेटी कनिमोझी को स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे की देखरेख के नाम पर रियायत दिलाने का है।

तीसरा, प्रर्वतन निदेशालय के दिखावटी हाय तौबा के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट काला धन विदेश पहुंचाने वाले मामले के प्रमुख आरोपी हसन अली को जमानत दे देती है। सुप्रीम कोर्ट से जब फटकार लगती है,तो प्रर्वतन निदेशालय के विधिक प्रकोष्ठ के निर्लज्जता की पोल खुल जाती है। हसन अली- हसन अली के शोर में सह आरोपी काशीराम तडपुडिया के जेल में बरकरार ऐशो आराम की बात दबकर रह जाती है।

चौथा, नंबर 2008 के बाद से हुए आतंकी वारदाताओं का खुलासा करने में हमारे आतंरिक सुरक्षा का निगरानी तंत्र विफल है। नई बनी एनआईए का ट्रेक रिकार्ड बुरा है। आतंकी हमलों की जांच और आतंकियों की धडपकड के लिए कुख्यात सीबीआई की आतंकवाद विरोधी प्रकोष्ठ एनआईए बनने के बाद से पंगु पड़ा है। इसपर कोई चूं चपड़ नहीं कर रहा।

पांचवां, सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता की वजह से काले धन विदेश भेजने की जोर पकड़ी रफ्तार कम होती नजर आ रही है। कानून मंत्री बदलने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने अडियल रूख का इजहार करना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट को मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल बनाने का फैसला वापस लेने को मजबूर कर दिया गया है।

छठां, काले धन की जांच में सुप्रीम कोर्ट की निर्देश पर कूद रही सीबीआई और ईडी को औकात में लाने के लिए इसी साल अप्रैल में पांडुचेरी ले जाकर सबक सिखाया गया। कालेधन के मामले में सबूत मिलने के बाद एजेंसियां आरोपी इकबाल सिंह से पूछताछ करना चाहती थी। इकबाल सिंह को आरोप के बावजूद लेफ्टीनेंट गवर्नर से नहीं हटाया गया। सीबीआई और ईडी के जांचकर्ताओं को लेफ्टीनेंट गवर्नर दफ्तर के अर्दली की हैसियत में बौनापन रखकर पूछताछ करनी पड़ी। इस नायाब मिसाल ने लेफ्टीनेंट गवर्नर जैसे सत्ता प्रतिष्ठान की इज्जत को मटियामेट कर दिया।

सातवां, सीबीआई ने अदालत में 2006 के एक एफआईआर की जांच बंद करने की रिपोर्ट पेश कर दी। एफआईआऱ इजराइली फर्म सोल्तम से हुए हथियार सौदे की दलाली का था। सीबीआई ने जांच की शुरूआत मीडिया चैनल की टीम के साथ नई दिल्ली के आलीशान बंगलों पर दबिश के साथ शुरू की थी। बारी बारी से खुलासा किया कि मामले के आरोपी सुधीर चौधरी ने दलाली की रकम से नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाकों में अरबों की अचल संपत्ति बनाई है। ब्रिटिश पासपोर्टधारी सुधीर चौधरी गिरफ्त में नहीं आए। अदालत में क्लोजर रिपोर्ट पेश होने के तीन हफ्ते के बाद सुधीर चौधरी के दिल्ली में मौजूदगी का पता लगा है।

इन चंद मिसालों से साफ है कि मौजूदा दौर में रसूखदारों के आगे साख वाली संस्थानों की प्रतिष्ठा बौनी बनाई जा रही है। यह वह दौर है जब पारदर्शिता का दंभ भरा जा रहा है। दलील दी जा रही है कि सबकुछ दिखने की स्थिति में शर्म के मारे लोग गलत करना बंद कर देंगे। लेकिन जो शर्मसार करेंगे या कर रहे हैं उनको दंडित करने का तंत्र दंतहीन हुआ जा रहा है। हम खतरनाक दौर में प्रवेश करते जा रहे हैं कि समाज के गलत तत्व को रोकने के लिए जिस कारगर तंत्र की जरूरत है वह मलीन होती जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट करप्शन के कोढ से अकेले दम पर मुकाबला कर रही है। अन्ना हजारे के सहारे समाज में नैतिक उत्थान की कोशिश हो रही है। इन कोशिशों से फलितार्थ की उम्मीद के बीच सवाल है कि जब व्यवस्था बहाल रखने वाले संस्थानों की प्रति प्रतिष्ठा नहीं बचेगी तब क्या होगा? साफ नजर आ रहा है कि संस्थानों की प्रतिष्ठा खत्म करने से हमारा आधार खोखला हुआ जा रहा है। इसी बिना पर जन लोकपाल बहाल करने की मुहिम के खिलाफ सीबीआई के नए पुराने मुखियाओं ने बैठक प्रस्ताव पारित किया है। दलील दी गई है कि केंद्र में लोकपाल या जनलोकपाल जैसी व्यवस्था लागू होने के बाद करप्शन के खिलाफ लड़ रही संस्था सीबीआई के बौने हो जाने का खतरा है।

मौजूदा व्यवस्था में केंद्र सरकार के संस्थानों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की सीबीआई सीधे जांच कर लेती है। और राज्य सरकार व हाईकोर्ट के निर्देश पर भेजी गई मामलों की जांच सीबीआई से कराई जाती है। उलटपेंच के दावों से होने वाली बदनामी के बावजूद सीबीआई के विधिक प्रकोष्ठ की साख अच्छी है। विधिक प्रकोष्ठ की मदद से ही सीबीआई की जांच रिपोर्ट या चार्जशीट को एयरटाईट किया जाता है ताकि अदालत में चार्जशीट की पेशी के बाद आरोपी के छूटने की उम्मीद ना के बराबर बन जाए। इस खूबी की वजह से भ्रष्टाचारियों में सीबीआई को लेकर एक दहशत है।

सीबीआई में मौजूद आईपीएस अफसर की फौज की प्रतिष्ठा इसी खूबी से बनी है कि वो मुख्यमंत्री और मंत्रियों की जी हजूरी करके अकूत दौलत बनाने वाले आईपीएस से अलग हैं। सीबीआई में तैनात आईपीएस के पास सियासत दां को यस सर कहने की मजबूरी से बचने और कर्तव्यनिष्ठा पेश करने का शानदार मौका रहता है। आने वाले दिनों में लोकपाल अथवा जनलोकपाल रुपी व्यवस्था बन जाने से भ्रष्टाचार की जांच करने वाली अलग संस्था और न्याय कर सजा देने वाली दूसरी संस्था का फासला खत्म हो जाएगा। जांच के साथ लोकपाल ही सजा सुना दिया करेंगे। इससे सीबीआई में आकर प्रतिष्ठा बचाने वाले आईपीएस अफसरों का ठौर खत्म हो जाएगा।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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