हमले की निंदा लेकिन कश्मीर पर मेरी राय प्रशांत से अलग : डा. कुमार विश्वास

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उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य श्री प्रशांत भूषण पर हुए असभ्य शारीरिक हमले की मैं कठोर शब्दों में निंदा करता हूँ. भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में वैचारिक असहमति प्रकट करने के अनेक समाज-स्वीकृत एवं संविधान प्रदत्त उपकरण उपलब्ध हैं. मैं विचार की विभिन्नता और उसे उचित स्थान दिए जाने का सदैव पक्षधर रहा हूँ.

किन्तु कल प्रशांत भूषण जी द्वारा व्यक्त उनके एक निजी विचार के विरोध में कुछ युवको ने जो हिंसक कार्रवाही की, वह सांस्कृतिक, सामाजिक और संवैधानिक, तीनो रूप से अमान्य हैं. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजता के दायरे में यह अधिकार है की वह आप से सहमत हो या असहमत हो. किन्तु अपनी असहमति के चलते वह हिंसा का सहारा ले, यह किसी भी प्रकार से स्वीकृत नहीं है.

अन्ना के अनशन के दौरान संपूर्ण भारत और भारत की सीमाओं से बाहर एक विराट जन-शक्ति ने जिस शालीनता के साथ अहिंसक आन्दोलन को प्रासंगिक बनाया है, वह पूरी दुनिया में अपने आप में एक अलग उदाहरण है. ऐसे हिंसक युवको को इस आन्दोलन से सीख लेनी चाहिए. संविधान के द्वारा दिए गए विचार की स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार का उपयोग करते हुए मैं यहाँ अपना यह निजी  विचार व्यक्त करना आवश्यक समझता हूँ कि कश्मीर भारत का अक्षुन्न, अविछिन्न, अविभाज्य तथा आवश्यक अंग है. कश्मीर समस्या हमारे कुछेक राजनीतिक दलों के राजनैतिक नेताओं कि स्वार्थी राजनीति तथा भ्रामक दुष्प्रचार के साथ-साथ नीतिगत दुष्प्रवृत्तियों का घातक प्रतिफल है.

श्री प्रशान्त भूषण द्वारा कश्मीर समस्या का समाधान जनमत संग्रह द्वारा कराये जाने के विचार को मैं अव्यावहारिक, अवैधानिक, अनावश्यक तथा अनुचित समझता हूँ. कई लाख नागरिकों को बलपूर्वक तथा असह्य आतंक के साए में देश के अन्दर ही शरणार्थी बनाने को बाध्य करने, सहस्त्रो निर्दोषों की जघन्य हत्या करने तथा समस्त राज्य की शान्ति व्यवस्था नष्ट किये जाने के उपरांत जनमत संग्रह का विचार अतार्किक व पूर्णतः अव्यावहारिक है. अतः मेरे विचार में कश्मीर समस्या का हल ढूँढने के लिए समस्त राजनैतिक दलों, बुद्धिजीवियों , सभ्य समाज की संस्थाओ, संचार माध्यमो, तथा सामाजिक प्रशासनिक माध्यमो को समवेत विमर्श एवं प्रयास करने होंगे.

डा. कुमार विश्वास

3/1084, वसुंधरा, गाज़ियाबाद

09868220488


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