क्योंकि वो मायावती की नहीं, मेरी मां हैं

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: गाजीपुर के नंदगंज थाने के भीतर बिना अपराध जबरन बंधक बनाकर रखी गईं महिलाएं : लाल साड़ी में खड़ी मेरी मां, पैर व कूल्हे में दिक्कत के कारण लेटी हुईं चाची, बैठी हुईं दो स्त्रियों में चचेरे भाई की पत्नी हैं. एक अन्य दूसरे आरोपी की मां हैं.वो मायावती की नहीं, मेरी मां हैं. इसीलिए पुलिस वाले बिना अपराध घर से थाने ले गए. बिठाए रखा. बंधक बनाए रखा. पूरे 18 घंटे. शाम 8 से लेकर अगले दिन दोपहर 1 तक. तब तक बंधक बनाए रखा जब तक आरोपी ने सरेंडर नहीं कर दिया. आरोपी से मेरा रिश्ता ये है कि वो मेरा कजन उर्फ चचेरा भाई है. चाचा व पिताजी के चूल्हे व दीवार का अलगाव जाने कबका हो चुका है. खेत बारी सब बंट चुका है. उनका घर अलग, हम लोगों का अलग. उस शाम मां गईं थीं अपनी देवरानी उर्फ मेरी चाची से मिलने-बतियाने. उसी वक्त पुलिस आई. ये कहे जाने के बावजूद कि वो इस घर की नहीं हैं, बगल के घर की हैं, पुलिस उन्हें जीप में बिठाकर साथ ले गई. चाची व चाची की बहू को भी साथ ले गई. चाची के कूल्हे का आपरेशन हो चुका है. पैर व कूल्हे की हड्डियां जवाब दे चुकी हैं. सो, चलने-फिरने में बड़ी मुश्किल होती है. लेकिन हत्यारोपी मेरा चचेरा भाई है, चाची का बेटा है, सो उन्हें तो पुलिस थाने में जाना ही था.

बेटा पर आरोप लगे और मां थाने पहुंचे, ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है लेकिन पुलिस के अपने कई मौखिक व निजी नियम होते हैं, उसमें एक ये भी नियम है. चाची, चाची की बहू व मां को थाने इसलिए ले गए ताकि आरोपी चचेरे भाई को सरेंडर करा सके. मतलब, परिजनों को थाने बिठाकर इमोशनल ब्लैकमेलिंग या इमोशनल टार्चर के जरिए सरेंडर कराने का ये तरीका है यूपी पुलिस का. ताकि पुलिस को खुद हत्यारोपी पकड़ने के लिए मेहनत न करनी पड़े. रणनीति न बनानी पड़े. छापेमारी न करनी पड़े. काम से बचने का ये नायाब तरीका निकाला है यूपी पुलिस ने. खुद काम न करना पड़े, इसके लिए कई निर्दोषों की जिंदगी में दाग लगा दें, यह रणनीति है यूपी पुलिस की. खुद काम न करना पड़े इसलिए दूसरों की जिंदगी के अधिकारों को छीन लें, यह तरीका निकाला है यूपी पुलिस ने.

बिना जुर्म बुजुर्ग महिलाओं, माताओं और युवा शादीशुदा महिलाओं को पुरुष थाने में रात भर - दिन भर बिठाए रखना आईपीसी के किस सेक्शन में लिखा है, संविधान की किस धारा में लिखा है, मुझे नहीं पता. आपको पता हो तो मेरे ज्ञान में वृद्धि करिएगा. लेकिन लखनऊ में बैठे बृजलाल से लेकर गाजीपुर में कप्तानी कर रहे रवि कुमार लोकू तक को खूब पता है कि ऐसा करना, महिलाओं को बिना जुर्म पकड़कर रात में पुरुष थाने में बंधक बनाए रखना जुर्म है, बावजूद इसके, सभी में ये सर्वमान्य सहमति भी है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए ऐसा किया जाना चाहिए. क्या तो पंचायत चुनाव में उपर से बहुत सख्त आदेश हैं कि अपराध हों तो तुरंत आरोपी गिरफ्तार किए जाएं.

अरे भाई, अपराध तो यूपी में बहुत बड़े बड़े हो रहे हैं, खुद मैडम मायावती सिर से लेकर पांव तक ढेर सारे अपराधों में डूबी हैं, कोर्ट-कचहरी में केस चल रहा है, लेकिन उनको तो कोई पुलिस नहीं उठाकर थाने में बिठाती है, मायावती को सरेंडर कराने के लिए उनकी मां को तो कोई पुलिस या अदालत थाने या कोर्ट में नहीं बिठाती है. फिर मेरी मां के साथ ही ऐसा क्यों?  क्या मायावती सीएम हैं, उनके पास सत्ता और पैसा है तो उनके साथ कानून अलग सुलूक करेगा और जिनके पास सत्ता व पैसा नहीं है उनके लिए कानून के नियम अलग होंगे?

ये क्या पाखंड है दोस्त!

समरथ को नहीं दोष गुसाईं, इसी तर्ज पर जितने आधुनिक समर्थ (पैसे, शासन, सत्ता, बाहुबल में दखल के हिसाब से) लोग हैं उनके अपराध अपराध नहीं और जितने असमर्थ लोग हैं (पैसे व पावर से विहीन मुझ जैसे लोग) उनका निर्दोष होने के बावजूद जीना भी मुहाल!!

ये कौन सी पालिटिक्स है पार्टनर??

पूरे 72 घंटे बाद लिख रहा हूं. तात्कालिक आवेशों व उद्वेगों से मुक्त होने के बाद. ताकि लिखने में आक्रोश व गुस्सा ज्यादा न दिखे, मूल मुद्दा व तथ्य ज्यादा उठे. मैं मायावती और उनके चेले पुलिस अधिकारियों से पूछना चाहता हूं कि वो बताएं, मेरी मां को 18 घंटे तक गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने में क्यों बंधक बनाए रखा? मेरी मां के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं है, मां के बेटों के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं है, जो आरोप मेरे चचेरे भाई पर लगा है, वो कितना गलत या सही है, ये अलग मुद्दा है, लेकिन वह तो अलग परिवार का सदस्य है, उस परिवार की खेती, चूल्हा, मकान सब अलग है. कई दशक पहले बंटवारा हो चुका है. तो मेरी मां, जिनका नाम यमुना सिंह हैं, को क्यों थाने ले जाकर बंधक बनाए रखा.

चलिए, अपनी मां की बात नहीं करता. मेरे चचेरे भाई की मां व उसकी पत्नी को थाने क्यों ले जाकर 18 घंटे तक बंधक बनाए रखा. सिर्फ इसलिए कि मेरा आरोपी चचेरा भाई मां व पत्नी के थाने में बिठाए जाने की बात सुनकर इमोशनली टार्चर हो जाएगा और सरेंडर कर देगा. धिक्कार है माया राज पर. धिक्कार है कानून के ऐसे राज पर. थू-थू करता हूं यूपी पुलिस विभाग के आला अफसरों के मुंह पर. दलित और महिला, दो गुणों से संपन्न मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बावजूद प्रदेश की आम महिलाओं के साथ ऐसा सुलूक किया जा रहा है? मेरी मां का मुद्दा है, इसलिए मैं लिख पा रहा हूं, अपनी दिल की बात कह पा रहा हूं. जाने कितनी माओं की कहानी कहीं नहीं आती होगी. जाने कितनी माएं थाने में आंसू इसलिए बहाती होंगी क्योंकि वे किसी ऐसे बेटे की मां है जिसके खिलाफ एफआईआर है और वो पुलिस के हाथ नहीं लग रहा, सो, निकम्मी पुलिस और भ्रष्ट पुलिस अधिकारी माताओं-बहनों को थाने में बिठाकर किसी बहेलिये की तरह आरोपी के थाने में आकर सरेंडर करने का इंतजार करते रहते हैं.

कानून की मूल आत्मा क्या है. यही न कि बेगुनाह को गलती से भी कोई सजा न मिले. सौ अपराधी भले छूट जाएं लेकिन कोई निर्दोष न सजा पाए. अपराधी को सुधार, हृदय परिवर्तन का मौका दिया जाए. अपराधी कोई एलियन तो होते नहीं, वे भी इसी धरती के लोग हैं जो हालात व संगति के कारण अपराधी बन जाते हैं, गलत कदम उठा लेते हैं. उनमें सुधार की अपार संभावनाएं होती हैं. लेकिन इन पुलिस वालों का क्या करें, जो अपराधियों का हृदय परिवर्तन कर शराफत की जिंदगी जिलाने की बजाय खुद अपराधी बनते जा रहे हैं और लाखों करोड़ों निर्दोष लोगों को न सिर्फ अवैध तरीके से प्रताड़ित कर रहे हैं बल्कि उन्हें अपराधी बनने को मजबूर कर रहे हैं.

मैं दिल्ली में हूं, दुनियादारी में हूं, बावजूद इसके, कुछ न कर सका. मां थाने से तभी छूट सकीं, जब चचेरे भाई ने सरेंडर कर दिया. लेकिन जो दूसरा हत्यारोपी है, जिस पर शक है कि उसी ने हत्या को अंजाम दिया, वो अब भी फरार है. क्योंकि पुलिस पर उसका कोई वश नहीं चलता. मेरे गांव के उस लड़के पर पुलिस ने ईनाम घोषित कर रखा है, इस कांड से पहले ही. उसकी भी मां को थाने में बिठा रखा है. पता नहीं वो घर लौटीं या नहीं. चचेरा भाई ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ रहा है. जो शख्स अभी तक प्रधान हैं, राम निवास सिंह उर्फ नेमा भइया, वे मेरे बहुत अच्छे दोस्तों में हैं, इसी कारण मैंने तय किया कि इस बार कोई वोट शोट डालने नहीं जाऊंगा. क्योंकि मेरे लिए दुविधा है. दोनों मेरे प्रिय हैं. किसी एक को वोट देकर दूसरे को दुखी नहीं कर सकता. चचेरे भाई के नाम पर दोस्ती की बलि नहीं चढ़ा सकता. और दोस्ती के नाम पर चचेरे भाई के परिवार को यह कहने का हक नहीं दे सकता कि उनका मैंने साथ नहीं दिया. सो, 20 तारीख के पंचायत चुनाव में मैं अपने गांव वोट देने नहीं जा रहा. लेकिन उसके पहले ही यह सूचना आई कि राम निवास सिंह उर्फ नेमा भइया व उनके समर्थकों पर फायरिंग कर दी गई व एक की मौत हो गई.

जिसकी मौत हुई, शमशेर सिंह की, वो भी हम लोगों के परिवार के पड़ोसी हैं, करीब करीब खानदान के ही हैं, बहुत पहले से वो लोग अलग रहते हैं और उनका लंबा चौड़ा कुनबा हैं. कुछ महीनों पहले गांव गया था तो शमशेर समेत कई जूनियर सीनियर दोस्तों के साथ बैठा था. एक दलित बस्ती वाले दोस्त के घर बैठकर खाए पिए थे. गांव में बहुतों ने हम लोगों को बुरा भला कहा कि जाने ये सब कहां कहां जाकर बैठ जाते हैं और खाने पीने लगते हैं लेकिन हम सभी मानते हैं कि ये सब भेदभाव समाज के मठाधीशों द्वारा खड़ा किया गया है. आदमी आदमी में कोई भेद नहीं होता. न जाति का भेद. न रंग का भेद. न धर्म का भेद.

मेरे गांव में कभी कोई फायरिंग में नहीं मरा. हवाई फायरिंग और फैटाफैटी के किस्से बहुत हुए. मैं भी प्रत्यक्षदर्शी रहा. लेकिन कोई किसी की जान ले लेगा, यह कल्पना कोई नहीं करता. पर ऐसा हो गया. चचेरे भाई और रामनिवास सिंह उर्फ नेमा भइया के बीच एक तनातनी थी, चुनाव को लेकर, प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन मैं दोनों को करीब से जानता हूं, ये कभी एक दूसरे के प्रति हिंसक होने या जान मार देने या हमला करा देने जैसा भाव नहीं रख सकते, गोली चलाने की तो बात दूर की है. जिस एक अन्य शख्स पर आरोप लगा है, वो कई महीनों से पुलिस रिकार्ड में फरार हैं. उससे राम निवास सिंह उर्फ नेमा भइया के झगड़े हो चुके हैं जिस कारण रामनिवास सिंह उर्फ नेमा भइया कई महीनों तक जेल में रहे. नेम्ड एफआईआर में उस फरार युवक का पहला नाम है, दूसरा नाम मेरे चचेरे भाई का डलवा दिया गया, गांव वाली पालिटिक्स के तहत. गोलीबारी में घायल होने के कारण नेमा भइया बनारस स्थित अस्पताल में भर्ती कराए गए और इधर उनके परिजनों ने दो लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर करा दी. एफआईआर होते ही पुलिस ने पहला काम यही किया कि दोनों आरोपियों के घरों की महिलाओं को उठा लिया और थाने में लाकर बिठा दिया. न कप्तान को होश, न सीओ को और न थानेदार को कि महिलाओं को पुरुष थाने में बिठाना अपराध है. शरीफ घर की संकोची महिलाएं हैं, इसलिए कुछ नहीं बोलेंगी, वरना थोड़ी समझदार होतीं तो सुबह पुलिस वालों के खिलाफ ही मुकदमा लिखा देतीं कि इन सालों ने छेड़छाड़ की है. फिर मुंह छुपाते फिरते ये हरामखोर पुलिस वाले.

मेरे परिवार, खानदान के ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि महिलाओं को थाने में बिठा दिए जाने से परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल गई. अभी तक खानदान की कोई महिला थाने नहीं गई थी लेकिन इस बार थाने पर महिलाओं को बिठाकर पुलिस ने खानदान की नाक को कटवा दिया है. मेरा इसके उलट मानना है. आज अगर मेरी मां थाने पर नहीं बिठाई गई होतीं, बंधक न बनाई गई होतीं तो शायद मैं उन माओं, युवतियों के दर्द को इतनी शिद्दत से महसूस नहीं कर पाता जो सिर्फ इसलिए थाने लाई जाती हैं और तरह तरह की प्रताड़ना की शिकार होती हैं कि उनके भाई या बेटे या पति पर कोई गलत काम करने का आरोप लगा है और वे भाई या बेटे या पति पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं.

एफआईआर होते ही आरोपी को पकड़ने की कोशिश करने की जगह महिलाओं को घर से उठाकर थाने पर बिठा देने जैसा जघन्य अपराध करने वाली यूपी पुलिस के हर अफसर को यह पता है कि ऐसा होता है, लेकिन कोई नहीं सोचता कि यह गैर-कानूनी है, कोई नहीं सोचता कि यह किसी मानव के अधिकारों का हनन है, कोई नहीं सोचता कि यह निर्दोषों को मानसिक रूप से भयग्रस्त और कुंठित करने का तरीका है, कोई नहीं सोचता कि यह आत्महत्या को प्रेरित करने वाला नापाक काम है. क्योंकि, सोचने और संवेदनशील होने जैसा काम तो अफसर अब लखनऊ - दिल्ली में ही गिरवी रखकर जिलों की ओर रवाना होते हैं. वे सत्ता के इशारे पर चलने वाले प्यादे हो गए हैं, मोहरे हो गए हैं, जिनका अपना कोई दिमाग नहीं, अपना कोई विजन नहीं, सच-गलत महसूस करने की अपनी कोई दृष्टि नहीं. कहने को तो ये जनता के नौकर हैं लेकिन इनका जीवन दर्शन जनता को नौकर बनाकर रखने का है. जिनके पास पैसा हो, उनके आगे तो ये पूंछ हिलाते घूमते मिल जाएंगे लेकिन जो पैसा व पावर से विहीन हैं उनके पिछवाड़े ये लोग डंडा लगाने से नहीं चूकते, बिना किसी अपराध के.

लखनऊ और गाजीपुर के कुछ पत्रकार साथियों ने सक्रियता दिखाई. मां को थाने से घर भिजावाने के लिए पहल की. तरह तरह के अफसरों से बात की. मैंने खुद बनारस के आईजी आरपी सिंह या आरके सिंह, से बात की. उन्होंने नाम भी नोट किया. लेकिन कुछ नहीं हुआ. महिलाएं तभी घर जा सकीं जब मेरा चचेरा भाई थाने जाकर हाजिर हो गया, गिरफ्तारी दे दी. मेरे पत्रकार मित्रों ने जिन जिन पुलिस अधिकारियों से बात की, सबने यही उपदेश दिया... ''उपर का दबाव है पंचायत चुनाव को लेकर, अगर हत्या जैसा कांड हो गया है तो गिरफ्तारी जरूरी है. बोलिए कि वो लोग सरेंडर कर दें. फिर महिलाएं घर चली जाएंगी.''

मैं सुनकर भौचक्क. बृजलाल जैसा अधिकारी अगर उपरोक्त बात कह सकता है, जैसा कि मेरे एक पत्रकार मित्र ने बताया, तो क्या होगा मानव अधिकारों का और क्या होगा इस सिस्टम का, मैं नहीं कुछ समझ पा रहा. मुझे बहुत पहले से लगने लगा है कि ईमानदार बनकर जीते रहने के आप्शन बहुत सीमित हो गए हैं. या तो भ्रष्टाचार के खेल में शामिल होकर पैसा वाला हो जाया जाए और पैसे के बल पर न्याय से लेकर पुलिस तक, सबको खरीद लिया जाए. ऐसा करना मंजूर नहीं तो फिर दूसरा रास्ता बचता है माओवादी या नक्सलवादी हो जाने का. ताकि हथियार उठाकर उन उन को ठोंका जा सके जो निर्दोषों को प्रताड़ित करते हैं और मानव अधिकारों के उल्लंघन को अपना कर्तव्य समझते हैं, भले इस प्रक्रिया में खुद की जान चली जाए. क्योंकि अपमानित होकर जीने, मर-मर कर जीने से तो अच्छा है न कि कुछ लोगों को निपटाकर निकल लिया जाए. लेकिन नक्सलवादी या माओवादी बनने का साहस सबमें नहीं होता. मेरे में भी नहीं है. ऐसे में मान लिया जाए कि हम बिना पैसे, बिना पद और बिना ताकत वाले लोग, भ्रष्ट तंत्र से अपमानित होते रहने को अभिशप्त हैं? अपनी माताओं-बहनों-बहुओं को बिना अपराध थाने में बैठा देखते रहने के लिए मजबूर हैं?? कड़वा है लेकिन शायद यही सच है.

मैं दिल्ली में हूं. यूपी के आधा दर्जन से ज्यादा बड़े शहरों में अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे अखबारों में छोटे-बड़े पदों पर रहा. दर्जनों पुलिस अधिकारियों और आईएएस अधिकारियों से परिचय रहा. लेकिन सत्ता व पैसे ने कभी लुभाया नहीं, सो, मैंने बिना वजह वाली बड़े बड़े लोगों से दोस्तियों को कांटीन्यू नहीं किया. बल्कि इसके उलट कहूं तो पंगे ज्यादा लिए, दोस्तियां कम कीं. जो खुब ब खुद जितने दिनों तक साथ चला तो चला, दोस्त बना रहा तो रहा, वरना जय राम जी की. तुम अपने रास्ते. मैं अपने रास्ते. ऊर्जा-उम्मीदों से भरे गरीब लोग, आम जन मुझे अपने ज्यादा करीब लगे. तो, मैं देखता हूं कि मेरे पास सिफारिश करने के लिए भी ऐसे बड़े लोग नहीं हैं जिनसे कह सकूं कि भई, ये काम करवाना है. अपना किसी किस्म का काम किसी से पड़ा नहीं क्योंकि दंद-फंद न होने के कारण अपन के जीवन की जरूरत बहुत सीमित है, और, कोई काम नहीं पड़ता. दूसरों के गलत काम को सुनता नहीं, दूसरों के गलत काम के लिए किसी से कहता नहीं.

ऐसे में जब अपने परिवार के किसी जन पर मुश्किल आती है तो मैं बहुत पसोपेश में पड़ जाता हूं कि किससे कहूं और किससे ना कहूं. मां के थाने में बिठाए जाने की सूचना मिलने के बाद मैंने जितने भी वरिष्ठ पदों पर आसीन दो-चार अपने पत्रकार साथियों को फोन किया, उसमें केवल एक को, लखनऊ वाले कुख्यात पत्रकार कम दलाल ज्यादा, हेमंत तिवारी को जो अपने घर में मायावती के साथ खिंचाई गई अपनी तस्वीरें टांगना प्रदर्शित करना अपनी शान समझता है, को छोड़कर बाकी सभी ने अच्छा रिस्पांस दिया, अपने स्तर से प्रयास किया, बात की, मेरे अनुरोध पर सक्रिय होते हुए लगे लेकिन सबके जोर लगाने के बावजूद मैं अपनी निर्दोष मां को थाने से घर तब तक नहीं भिजवा सका जब तक कि चचेरा भाई थाने में जाकर हाजिर न हो गया. मेरे जैसे दिल्ली में बैठे जर्नलिस्ट का जब ये हाल है कि वह अपनी निर्दोष मां को थाने में अवैध तरीके से बिठाए जाने से नहीं बचा सका, बिठाने जाने के बाद लाख कोशिश करके भी नहीं छुड़वा सका, तो इस देश की 60 फीसदी आबादी, जिनका सत्ता व कारोबार में कोई लिंक नहीं है, वे कृषि व मजदूरी पर ही निर्भर रहते हैं, का क्या हाल होगा. उनकी तो मां-बेटियों को उठाकर ये पुलिस वाले बलात्कार कर डालते होंगे और कोई शर्म के बारे में कुछ बोल न पाती होगी. ऐसी खबरें तभी बाहर आती हैं जब कोई महिला अवसाद में आत्महत्या कर लेती है या फिर किसी तरह से मामला लीक हो जाता हो, या घरवाले भय को भेदकर, साहस करके सामने आ जाते हों.

आखिर में मैं अपनी मां से मुखातिब होकर कुछ कहना चाहूंगा, जो कि मैं बोलकर उससे नहीं कह सकता, यहां लिखकर अपनी भावना जरूर प्रकट कर सकता हूं....

''आदरणीय मां

चरण स्पर्श

मां, मुझे समझ में आ गया है कि तुम लोग मुझे क्यों पुलिस अधिकारी बनाना चाहती थी. आईएएस अधिकारी बनाना चाहती थी. मैं अपने गांव अपने इलाके में पढ़ने लिखने में सबसे तेज था, सो आप सब सोचते थे कि लड़का इलाहाबाद विश्वविद्यालय पढ़ने गया है, पढ़ लिखकर अधिकारी बन कर लौटेगा और तब घर के दुखों का अंत हो जाएगा. लेकिन मां, मैं भगत सिंह को आदर्श मानते हुए नक्सलवादी संगठन आईपीएफ उर्फ सीपीआईएमएल उर्फ आइसा से जुड़ गया. अपने परिवार का सुख-दुख बनाम पूरे समाज के सुख-दुख, दोनों में मैंने समाज के सुख-दुख के साथ जीना ज्यादा पसंद किया और नौकरशाह बनकर अपनी जनता पर राज करने की जगह जनता के बीच रहकर उन्हें गोलबंद कर सत्ता-शासन से लड़ाई लड़ना उचित माना. पर वो ज्यादा दिन तक न कर सका. मुझे लगने लगा कि जनता के बीच रहकर उन्हें गोलबंद करना बेहद मुश्किल काम है सो मैंने बीच का रास्ता चुना. कलम के जरिए जनता की आवाज उठाने का काम शुरू किया. इलाहाबाद और बीएचयू में छात्र आंदोलन, नुक्कड़ नाटक, गाना-बजाना करते करते जाने कब पत्रकार बन गया.

पर उसी कीड़े ने, जिसने मुझे भगत सिंह को रोल माडल मानने को कहा और परिवार के हित की बजाय समाज व जनता के हित को सर्वोच्च मानने की नसीहत दी, मुझे कहीं भी टिकने नहीं दिया. सिस्टम के, आफिस-आफिस के खेल में रमने नहीं दिया. क्योंकि हर जगह न्यूनतम नैतिकता और न्यूनतम ईमानदारी का निर्वाह करना मेरे लिए भारी पड़ने लगता था. और, ये न्यूनतम नैतिकता व न्यूनतम ईमानदारी कोई आरोपित भाव नहीं है, बल्कि बचपन में गांव के प्राइमरी स्कूल व आदर्श माध्यमिक स्कूल में उच्च विचार युक्त लेख श्लोक कविता कहानी पढ़े होने के कारण है जिसे झूठ मानने के बावजूद अब तक अपने व्यवहार का हिस्सा नहीं बना सका हूं. क्योंकि तुम्हीं लोग कहते थे कि झूठ बोलना गलत है, चोरी करना गलत है, रिश्वत लेना गलत है, सो, वही मानता रहा. हालांकि मुझे अब लगता है कि ये सब बातें फर्जी हैं. दो नैतिकताएं हैं. एक गांव वाली जिसे तुम मैं जीते हैं, दूसरी शहर वाली जिसे कथित सफल व चालाक लोग जीते हैं लेकिन बताते नहीं हैं.

मां, मैं कह रहा था कि लिखने पढ़ने के कामकाज में ठीकठाक होने के कारण मैं लिखने पढ़ने में लगा रहा और मेरे ही सामने बेईमान पत्रकारों और रीढ़विहीन संपादकों ने आफिस की बाहर की दुनिया के चोर-उचक्कों धन्ना सेठों से सांठगांठ कर मिशन मनी का अभियान चलाते रहे, संस्थान को भी बेईमानी की रकम खिलाते रहे तो प्रसन्न प्रबंधन के हाथों तरक्कियां पाते रहे. उनके परिवारों में अचानक समृद्धि आने लगी, फ्लैट व कार खरीदे जाने लगे लेकिन मैं लिखने-पढ़ने को ही आदर्श मानता रहा. अच्छे कामकाज के कारण मेरी सेलरी बढ़ती रही, पद भी बढ़ता रहा लेकिन बढ़ने के बावजूद, 35 हजार रुपये महीने तक तनख्वाह हो जाने के बावजूद महीने के आखिर में पैसे खत्म हो जाया करते थे. उसी कीड़े के चलते मैं आज तक कहीं सेटल नहीं हो पाया, सफल नहीं हो पाया क्योंकि दुनिया जिसे सेटल होना कहती है, सफल होना कहती है, वो मेरे लिए स्खलन सरीका है, आंखें मूंद लेने जैसा है. जो सुख अपनी फकीरी में जी पाता हूं, वो अंबानी बन जाने के बाद मुझे कतई नसीब नहीं हो सकता. लेकिन ऐसी फकीरी का क्या करूं जो तुम्हें थाने जाने से बचा नहीं पाया.

लेकिन मां, चिंता न करना. मेरे लिए तुम मेरी अकेली मां नहीं हो. तुम जैसी लाखों माएं हैं जिनके बेटे मेरे जैसे ही हैं. जो चाहते हैं कि उनकी माओं का उत्पीड़न करने वालों को सजा मिले लेकिन उन्हें तरीका नहीं पता होगा. मैं कोशिश करूंगा मां कि आगे से तुम ही नहीं, तुम जैसी तमाम माओं को ऐसी जिल्लत-जलालत से दो चार न होना पड़े. इसके लिए मुझे सोनिया गांधी से लेकर मायावती जैसी तमाम महिलाओं-माताओं से मिलना होगा तो मिलूंगा, कानून हाथ में लेकर अपनी बात रखने को मजबूर होना पड़ेगा तो उसके बारे में भी सोचूंगा क्योंकि ऐसा भगत सिंह ने सिखाया है हम लोगों को लेकिन तुम्हारे अपमान को मैं भूलूंगा नहीं. मुझे पता है, तुम बहुत जल्दी ही सब भूल जाओगी, सबके आगे खुद को ऐसे पेश करोगी जैसे कुछ हुआ ही न हो. सबसे कहोगी कि पुलिस वालों ने बहुत सम्मान और अच्छे से रखा था. लेकिन मुझे पता है कि तुम्हारा दिल अंदर से कहीं दरक गया होगा, तुम्हारे मन में जो गहरी कचोट लगी होगी उसे मैं समझ रहा हूं. तुम अपने दुख को अभिव्यक्त नहीं कर सकती हो क्योंकि अभिव्यक्ति का अधिकार तो हम पुरुषों और पुलिस वालों के पास है. तुम लोगों को सिर्फ रिसीविंग इंड पर रखा गया है, महसूस करते रहने के लिए.

मैं नहीं जानता मां कि तुम्हे अपमानित करने वाला मैं किसे मानूं, नंदगंज थाने के थानेदार को मानूं, इलाके के सर्किल आफिसर को मानूं, पुलिस कप्तान रवि कुमार लोकू को मानूं, आईजी आरके सिंह या आरबी सिंह को मानूं या बृजलाल को मानूं या डीजीपी को मानूं या सीएम मायावती को मानूं या इस लोकतंत्र को मानूं या खुद को मानूं. मुझे तो सब एक ही लगते हैं. हिंसक पशुओं की पूरी चेन है जो जनता के उपर बिछे पड़े हैं, खून पीते रहने के लिए. इनमें से किस पशु को मैं दोषी मानूं? मैं रियली कनफ्यूज हूं. मुझे लगता है मां दोषी मैं हूं जो इतना पैसा न कमा सका कि पुलिस वालों के तुम तक पहुंच पाने से पहले उन्हें खरीद सकता. इतनी बड़ी नौकरी नहीं खोज पाया कि जिससे पुलिस वाले तुम तक पहुंचने के नाम से ही थर्राने लगते. ऐसे मित्र न बना सका जो इतने प्रभावशाली होते कि एक फोन पर ही गाजीपुर का कप्तान यस सर यस सर कहते हुए आदेश की तामील करने में जुट जाता. इसलिए मां, मैं खुद को अपराधी दोषी मानते हुए वादा करता हूं कि मैं प्रायश्चित करूंगा और तुम जैसी लाखों कराड़ों माओं के सामने आते रहने वाले ऐसे मजबूर दिनों में उनके साथ खड़ा रह पाया, उनके लिए लड़ पाया तो मैं खुद को धन्य समझूंगा.

हो सके तो माफ कर देना, बावजूद इसके कि तुम मुझे दोषी नहीं मानती.

लेकिन मैं खुद को माफ न कर सकूंगा.''

तुम्हारा

यशवंत

09999330099


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