हार गए पत्रकार, जीत गई माया सरकार

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नूतन ठाकुर: इसलिए लड़ाई जारी रहे : पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में पुलिस अफसरों के बड़े भारी संख्या में तबादले हुए. सत्तर के आस-पास. इनमे हर रैंक के अफसर थे- एसपी भी, डीआईजी भी, आईजी और एडीजी तक. इनमे कुछ तबादले खास तौर पर गौर करने लायक थे- एक पूरब में गाजीपुर का, एक उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का और एक उत्तर प्रदेश के पुराने औद्योगिक नगर कानपुर का. इन तीनों को मैं एक अलग नज़र से इसीलिए देख रही हूँ क्योंकि इन तीनों ही जगह पर पिछले एक-डेढ़ महीने के अंदर पत्रकारों से जुड़े बड़े-बड़े कांड हुए थे.

सबसे पहले लखनऊ का मसला देखें. यहाँ शाही इमाम १५ अक्टूबर को अपने एक प्रेस कांफ्रेंस में आये थे बाबरी मस्जिद को ले कर. इसी प्रेस कांफ्रेंस में एक स्थानीय उर्दू अखबार के पत्रकार मोहम्मद वाहिद चिस्ती साहब को उन्होंने बीच कांफ्रेंस में सरे-आम गाली-गलौज किया था और उनके साथ संभवतः हाथापायी भी हुई थी. बात यहीं तक नहीं रुकी थी- पत्रकार महोदय ने हजरतगंज थाने में जा कर मुकदमा भी दर्ज कराया था. यह अलग बात है कि उस घटना के घटे आज लगभग एक महीना हो चुका है. तब लखनऊ के पुलिस के आला-हुकुमरानों ने दावा किया था कि मामले में तुरंत जांच होगी और आनन-फ़ानन में न्याय होगा. तब का दिन है और आज का दिन है- न्याय अपना कटोरा लिए घूम रहा है. पत्रकार महोदय भी शांत हो कर कहीं किसी कोने में जा बैठे हैं- हो सकता है शाही इमाम के स्तर से उनके मालिकों या उनको बात “ठीक” से समझा दी गयी हो और पत्रकार भाई साहब ने चुप रहना ही उचित समझ लिया हो. यह भी हो सकता है कि वे यहाँ-वहाँ घूम रहे हों और उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई भी न हो.

अब दूसरी घटना कानपुर से जुडी है. यहाँ तो पुलिस ने हद ही कर दी जब एक मासूम बच्ची दिव्या से सम्बंधित दुराचार और हत्या के मामले में न्याय को सरे-आम नीलाम करते हुए उसी आदमी को जेल भेज दिया जो उस गरीब मृतक बच्ची के परिवार को सहारा दे रहा था और वही पुलिस उस स्कूल के मालिक और उसके बच्चे का खुले-आम समर्थन कर रही थी जिसको दिव्या की माँ चीख-चीख कर दोषी बता रही थी. अखबारों से यह गलती हो गयी कि इस मामले में चुप नहीं रह सके. सच्ची बात बोलने का प्रयास किया तो वहाँ की पुलिस ने हिन्दुस्तान अखबार पर एक तरह का हमला ही बोल दिया. अंग्रेजों के ज़माने को याद दिलाते हुए रात में बूटों की भयावह आवाजें हिन्दुस्तान अखबार के दफ्तर में गूंजने लगीं और अखबार से जुडी गाड़ियों को सरेआम उतार-उतार कर गाडियां सील की जाने लगीं. मानों हम किसी आपातकाल में जी रहे हों. इस मामले को लखनऊ के सारे वरिष्ठ पत्रकारों ने शासन स्तर तक उठाया और इसमें न्याय देने की लंबी-चौड़ी घोषणा हुई. अभी तक तो कुछ भी नहीं हुआ है.

तीसरा मामला है भड़ास के यशवंत जी का. इनकी माँ, चाची और भाभी को गाँव के एक ह्त्या के मामले में समस्त कानूनों को धता बताते हुए रात के वक्त थाने पर लाया गया और उन्हें रात भर थाने में रखा गया. ये महिलायें थाने से तभी छोड़ी गयीं जब ह्त्या का एक वांछित अभियुक्त हाज़िर हुआ. यशवंत जी ने इस मामले से जुड़े तमाम दस्तावेज और साक्ष्य पुलिस के सारे अधिकारियों को दिया. लेकिन अब तक तो इस सारे प्रयास का नतीजा सिफर ही है. यहाँ भी लखनऊ के बड़े अधिकारियों ने कहा कि न्याय होगा, दोषियों पर कार्यवाही होगी, पर क्या कार्यवाही हो रही है ये हम सभी देख रहे हैं. पता चला है कि थानेदार को लाइन हाजिर कर दिया गया है, महिलाओं को थाने में रखने के आरोप में. बाकी बड़े अधिकारियों का कोई बाल बांका नहीं हुआ.

अब पुलिस के इन भारी तबादलों में इन जगहों के पुलिस कप्तान भी बदल गए हैं. तो इसका क्या निष्कर्ष निकाला जाए. यह कि शासन ने पत्रकारों की पीड़ा को संज्ञान में लिया है. या यह कि उत्तर प्रदेश में सरकार अब यह चाहती है कि पत्रकारों के मसलों को विशेष ध्यान दिया जाये. मैं इनमे से कुछ भी नहीं मानती. मैं जहां तक देख रही हूँ ये सब तो रूटीन के ट्रांसफर हैं जो कई बार प्रोमोशन और दूसरे प्रशासनिक मामलात को ध्यान में रख कर किये जाते हैं. इसीलिए इन तीनों ट्रांसफर को इसी रूप में देखा जाना उचित होगा.

साथ ही जो सबसे बड़ी बात है वह यह कि इन ट्रांसफर से अलग सभी पत्रकार साथियों को यह ध्यान में रखना होगा कि ट्रांसफर और पोस्टिंग से न्याय का कुछ भी लेना-देना नहीं है. यदि इन तीनों मामलों में पत्रकारों के साथ अन्याय हुआ है तो उसका सही जवाब तभी माना जाना चाहिये जब इनमे जो भी दोषी व्यक्ति हैं (चाहे वे सरकारी लोग हों या प्राइवेट) उनके विरुद्ध नियम और क़ानून के अनुरूप कार्यवाही हो. केवल थानेदार को लाइन हाजिर करना न्याय नहीं होता. केवल तबादला करना न्याय नहीं होता. न्याय होता है तो दिखता है और लगता है कि न्याय हुआ है. पत्रकारों के मामलों में न्याय इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जनता देखने-सोचने लगी है कि ये लोग तो स्वयं अपने मामलों में न्याय नहीं करा पा रहे हैं तो ये हमारी लड़ाई क्या लड़ पायेंगे. और लोकतंत्र की हमारी व्यवस्था में यह काम चौथे स्तंभ का ही तो है.

इसीलिए लड़ाई जारी रहे.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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