बृजलाल! न गलत कहो, न गलत करो

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: मीडिया के अधिकारों का हनन करने की चेष्टा सही नहीं : बृजलाल के बयानों और उनकी सोच की मैं निंदा करती हूं : उत्तर प्रदेश के विशेष पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) बृजलाल का एक बयान उनके गले की फांस बनने जा रहा है. जानकारी के मुताबिक एक वेबसाईट पर यह खबर आई है कि पुलिस विभाग, उत्तर प्रदेश में कुछ लोगों द्वारा एक एशोशिएशन बनाया गया है.

बृजलाल से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने धमकाने के अंदाज़ में कहा कि पुलिस में एसोशिएशन बनाना प्रतिबंधित है और जिन लोगों ने यूनियन बनाई है उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी. साथ ही यह धमकी भी दी है कि इस तरह के एसोशिएशन से जुड़े पुलिसकर्मियों की नौकरी तो जायेगी ही, साथ ही उन्हें जेल भी जाना पड़ेगा.  उन्होंने पुलिस फोर्सेस (रेस्ट्रिक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 और पुलिस (इनसाईटमेंट टू डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 का जिक्र करते हुए कहा है कि यहां एसोशिएशन बनाना प्रतिबंधित है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि जिस वेबसाईट पर एसोशिएशन बनने की खबर छपी है, उन तत्वों के बारे में जांच पड़ताल शुरू कर दी गयी है. यह भी कहा कि यूपी आईपीएस एसोशिएशन कोई ट्रेड यूनियन नहीं है, इसीलिए उसका अस्तित्व है अन्यथा किसी भी प्रकार का यूनियन पुलिस में बन ही नहीं सकता.

मैं एक आईपीएस अफसर की पत्नी तो हूं पर साथ ही श्री ब्रिजेन्द्र सिंह यादव के संरक्षण में बने कल्याण समिति, उत्तर प्रदेश से जुडी हुई भी हूं, क्योंकि मेरा यह साफ़ मानना है कि उत्तर प्रदेश पुलिस में जिस प्रकार से अधीनस्थ स्तर पर भेदभावपूर्ण आचरण किया जाता है, वह किस भी प्रकार से उचित नहीं है. हम लोगों ने हमेशा इस तरह के बुरे बर्ताव और नीचे के अधिकारियों को परेशान करने से अपने आपको दूर रखा, पर इस चीज़ को होते हुए तो कई जगह देखा है. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति या समूह इस प्रकार से परेशान हो रहे समूह के विषय में चिंतित है और कुछ अच्छा करना चाहता है तो उसे हतोत्साहित करना और धमकी देना तो पूर्णतया गलत है.

इस रूप में मैं यह बताना चाहती हूं कि श्री बृजलाल के ये कथन ना सिर्फ कानूनी रूप से पूर्णतया गलत हैं बल्कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 19 (ग) में हर व्यक्ति को समूह बनाने के मौलिक अधिकार का भी साफ़ तौर पर हनन करते हैं. यह सही है कि पुलिस बलों के लिए संविधान के ही अनुच्छेद 33 के अनुसार एसोशिएशन बनाने के विषय में कई सारी सीमायें निर्धारित कर दी गयी हैं.  उसी के अनुसार पुलिस फोर्सेस (रेस्ट्रिक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 बनाया गया है जिसकी धारा तीन के अनुसार पुलिस बल का कोई भी सदस्य बगैर केंद्र सरकार (या राज्य सरकार) की अनुमति के किसी ट्रेड यूनियन, लेबर यूनियन आदि का सदस्य नहीं बन सकता है. लेकिन इसी एक्ट की धारा 3(1)(2) के अनुसार यह नियम उन संगठनों के लिए नहीं है जो पूर्णतया सामजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक ढंग की हो.

उपरोक्त कल्याण संस्थान विधि के अधीन रजिस्ट्रार, फर्म एंड सोसायटी, लखनऊ के कार्यालय में विधिवत पंजीकृत है. ऊपर से यह संस्था उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पंजीकृत हुई है. इस संस्था के उद्देश्य अराजपत्रित पुलिस एसोसिएशन पुलिसकर्मियों व उनके बच्चों के कल्याण के काम करने और उनकी समस्याओं को उचित मंच पर प्रस्तुत करना है.  जाहिर है कि यह कृत्य किसी भी प्रकार से अवैधानिक और गलत नहीं है. बल्कि जिस प्रकार से यूपी आईपीएस एसोशिएशन तथा यूपी पीसीएस एसोशिएशन रजिस्ट्रार, फर्म एंड सोसायटी के यहाँ पंजीकृत संस्थाएं हैं उसी प्रकार से यह कल्याण समिति भी है. इस समिति के विषय में बगैर पूरी जानकारी किये इस प्रकार के धमकाने वाली बयानबाजी करना निश्चित तौर पर अवैधानिक है और मूल अधिकारों का हनन भी.

उससे कम गंभीर बात यह है कि श्री बृजलाल इस खबर को छापने वाले वेबसाईट पुलिसवाला.इन के बारे में भी इस तरह की बात कह रहे हैं कि इन “तत्वों” की जांच कराई जायेगी मानो ये पत्रकार न होकर कोई आपराधिक तत्व हों. वेबसाईट के बारे में इस तरह के शब्दों का प्रयोग भी पूर्णतया अलोकतांत्रिक है. मैं व्यक्तिगत तौर पर इस प्रकार से एक लोकतांत्रिक अधिकार के हनन के प्रयास और मीडिया के नैसर्गिक अधिकार के हनन की कोशिश को पूर्णतया गलत मानते हुए उसकी निंदा करती हूं.

डॉ नूतन ठाकुर
संपादक
पीपल’स फोरम,
लखनऊ
09415534525


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