यूपी में समझौता कराने की पुलिस फीस 50 हजार

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सय्यद मजहर हुसैन: मेरे जीवन में पहली बार मेरे ही सामने पुलिस वालों ने पैसे के लिए मुंह खोला : उत्तर प्रदेश जैसा हाल इस समय किसी प्रदेश का नहीं है. न कोई लॉ है, न कोई आर्डर. लूट सको तो लूट लो वाली स्थिति बनी है. क्या बड़े अफसर और क्या छोटे, जिसो देखो वही लूट रहा है. ताजी सूचना बस्ती से है. यहीं भी पुलिस ने एक ऐसा कारनामा किया है जिसे सुनकर आप हिल जाएंगे.

मायावती की पुलिस ने बस्ती में निर्दोषों, असहायों पर न सिर्फ अत्याचार किया है बल्कि न्याय व मानवीयता के मूलभूत सिद्धांतों के परे जाकर सरेआम रिश्वतखोरी की कोशिश की है. बस्ती जिले में थानों पर तैनात अधिकारी बिना मोटी रकम लिये कोई काम नहीं करते. यहां गलत और सही, दोनों काम कराने के लिए पैसा देना पड़ता है. अगर सही काम कराने के लिए आपने पैसा नहीं दिया तो निर्दोष होते हुये भी आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती है. यहां की पुलिस आम आदमी तो आम आदमी, अब पत्रकारों से भी पैसे के लिये मुंह खोल देती है. अभी 24 जनवरी की बात है. बस्ती कोतवाली में एक महिला थाना है.

16 जनवरी को दहेज उत्पीड़न का एक मामला दर्ज हुआ था. लेकिन फौरन बाद लड़की और लड़का पक्ष के लोगों ने पंचायती सुलह कर लिया. दोनों पक्ष सुलहनामा तथा एक अप्लीकेशन के साथ थाने गये. यहां महिला थानाध्यक्ष सुनीता त्रिपाठी ने सुलहनामा की बात सुनते ही आव देखा न ताव, लड़के के पिता को लाकअप में बंद कर दिया और लड़की और उसकी विधवा मां को थाने में बिठा लिया. फिर महिला थानेदार सुनीता ने मां-बेटी से कहा कि अगर तुम सुलह करोगी तो तुमको भी बन्द कर दूंगी. बेचारी दोनों, थाने में डर से बैठी रह गयीं. चूंकि वह दोनों पक्ष मेरे परीचित थे, समझौता भी हम लोगों ने ही आपस में बिठा कर कराया था, तो मैं थाने में जा पहुंचा.

महिला थानाध्यक्ष को अपना परिचय दिया और सुलह हो जाने पर क्यों बन्द कर दिया, सब सवाल पूछा. इस पर महिला थानेदार मुझे अलग ले गई और कहा कि मैं छोड़ दूंगी लेकिन आप थोड़ा टाइट रहें, और कुछ करा दें. सच बताऊं, महिला थानेदार की इस हिम्मत पर मुझे काफी आश्चर्य हुआ. मैंने उनसे कहा कि मेरे बारे में आप नहीं जानतीं, आप पता कर लें, मैं पैसे की बात नहीं करता, न पैसे लेता हूं, और न ही देता हूं. इतना सब सुनने के बाद भी वह महिला थानेदार उसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं हुई. मैं जैसे ही कोतवाली प्रांगण में पहुंचा तो कोतवाल एसएन सिंह और पुरानी बस्ती थाने के थानेदार क्षत्रजीत सिंह बैठ कर धूप सेंक रहे थे.

कोतवाल ने देखते ही मुझे बुलाकर बैठा लिया. इसी बीच महिला थानेदार और लड़की और उसकी मां भी आ गयीं. मैंने मां-बेटी से कहा कि तुम लोग जाओ और एफीडेविट बनवा लो. तभी महिला थानेदार ने कोतवाल से कहा- ''ये मीडिया से हैं और पैरवी करने आये हैं. एक बार तो इस औरत ने मुकदमा दर्ज कराया और एक बार समझौता करने आ गई, अब कैसे समझौता करा दूं.'' इतना सुनते ही पुरानी बस्ती थाना के थानेदार क्षत्रजीत सिंह बूढ़ी लाचार औरत से बोल पड़े- ''समझौते की फीस जानती हो?'' चूंकि बूढ़ी औरत कम सुनती है तो उसकी बेटी ने कहा कि क्या? तो उन्होंने कहा कि समझौता कराने की फीस पचास हजार रूपया है, पैसा मंगवा लो और ले जाओ. इतना सुनते ही मैं हैरान रह गया कि कोतवाल और एसओ मुझे जानते हैं और मेरे सामने ही पैसे की बात कर रहे हैं. मैंने गुस्से में कहा कि पैसे की बात मैं नही करता, जो करना हो कर दें.

पैसा न पाकर एसओ महिला थाना सुनीता त्रिपाठी ने बेकसूर नूर मोहम्मद का चालान कर दिया. लेकिन लड़की पक्ष की एफीडेविट पर दूसरे दिन जमानत हो गयी. लेकिन पुलिस की यह कारस्तानी देख दुख होता है. सच कहूं, मेरे जीवन का यह पहला अवसर था 12 साल की पत्रकारिता में मुझसे किसी ने हिम्मत नहीं की कि पैसे की बात कर ले. क्योंकि मैं इस चक्कर में कभी नहीं रहता. इसीलिये हमेशा क्रायसिस में रहता हूं. लेकिन सुकून में हूं कि कभी किसी का गला नहीं काटा, हां मदद जरूर की है. उस दिन से लेकर आज तक मेरे दिमाग में वही बात तैर रही है, न दिल को सुकून मिल रहा है, न ही चैन. मैंने किसी अधिकारी से इस बात की शिकायत नहीं की, सिर्फ इस कारण की मैं उस भ्रष्ट अधिकारियों को सबक सिखाना चाहता हूं, लेकिन कैसे, यह समझ में नही आता. हां, अगर उस समय मेरे पास स्पाई कैमरा होता तो स्टिंग जरूर कर देता. इसका मुझे हमेशा अफसोस रहेगा. लेकिन पुलिस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि इसमें सुधार लाना नामुमकिन है.

सय्यद मजहर हुसैन

पत्रकार

बस्ती


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