''माई लार्ड, आपकी टिप्पणी को मैं सच मानने से इनकार करती हूं''

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: अब अदालतों से भी भिड़ने की जरूरत : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस एससी अग्रवाल की पीठ द्वारा इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) द्वारा शीलू और दिव्या प्रकरणों में डीजी करमवीर सिंह और स्पेशल डीजी अपराध बृज लाल की भूमिका की जांच किये जाने से सम्बंधित दायर किये गए एक जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह अगंभीर किस्म की याचिका है, जिसमें समुचित मात्रा में तथ्य नहीं प्रस्तुत हैं.

उच्च न्यायालय द्वारा आदेशित किया गया कि यह पब्लिसिटी पाने के लिए की गयी याचिका है. निर्णय में यह कहा गया है कि ये दोनों जिम्मेदार अधिकारी हैं और वे इस विवेचना से सम्बंधित नहीं थे. इन्हीं तथ्यों के दृष्टिगत उच्च न्यायालय द्वारा बीस हज़ार का हर्जाना आईआरडीएस पर लगाया गया है.

आपको याद होगा कि उच्चतम न्यायालय के जस्टिस काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा कुछ समय पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में कुछ अत्यंत कड़ी टिप्पणी की गयी थी, जिसके अनुसार वहाँ वास्तव में गड़बड़ है. उन्होंने यह भी कहा था कि इस उच्च न्यायालय के कतिपय न्यायाधीशों के बारे में उन्हें गंभीर शिकायतें मिली हैं. इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में मैंने व्यक्तिगत हैसियत से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ खंडपीठ में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमे यह अनुरोध किया गया था कि ऐसे सभी न्यायाधीशों, जिनके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में गंभीर शिकायतें हैं, के खिलाफ तत्काल न्यायोचित कार्यवाही की जाए. उस समय भी लखनऊ खंडपीठ ने यही कहा था कि यह वाद बलहीन है और याची द्वारा यह सस्ती लोकप्रियता के लिए किया गया है.

मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि इन दोनों मामलों में ऐसी कौन सी ऐसी बात कही गयी जो गलत थी या महत्वपूर्ण नहीं थी. पहले मामले में दो मासूम नाबालिग लड़कियों के साथ निर्मम और वीभत्स बलात्कार की बात सामने आई. दिव्या मामले में उस मासूम बच्ची की हत्या तक हो गयी. कानपुर जैसे बड़े महानगर में यह घटना घटी. पुलिस ने दिव्या की माँ के चीखने-चिल्लाने के बावजूद उसके एक पड़ोसी को मुलजिम बना दिया. मीडिया द्वारा आवाज उठाने पर हिंदुस्तान जैसे बड़े अखबार के दफ्तर पर छापा मारा गया. यह सब लखनऊ से मात्र नब्बे किलोमीटर की दूरी पर हुआ. सारे हिन्दुस्तान को पता लग गया पर उत्तर प्रदेश के डीजीपी करमवीर सिंह और सक्रिय एडीजीपी बृज लाल को मालूम नहीं हो सका. असली मुलजिम घूमता रहा और बेगुनाह जेल चला गया. लेकिन न्याय के स्तर पर ठन-ठन गोपाल. तब जा कर कुछ न्याय हुआ जब स्वयं मुख्यमंत्री के लेबल पर हस्तक्षेप हुआ.

शीलू मामले में भी उतना ही गज़ब हुआ. लड़की के साथ बलात्कार की बात सामने आई और पता चला कि वही जेल भेजी जा चुकी है, कुछ मामूली पैसे की चोरी के जुर्म में. वह लड़की चीखती-चिल्लाती रही, यहाँ-वहाँ घूमती रही, दरख्वास्तें देती रही पर उसका मुकदमा तक नहीं लिखा गया. स्वयं उच्च न्यायालय को अपने स्तर पर आदेश करना पड़ा और फिर मुख्यमंत्री ने मामला सीबी-सीआईडी को भेजा. तब जा कर बसपा विधायक गिरफ्तार हो सका.

आईआरडीएस ने यही प्रश्न उठाया कि इस मामले में केवल थानाध्यक्ष और एडिशनल एसपी ही क्यों जिम्मेदार हों? प्रदेश के बड़े पुलिस अधिकारी क्यों नहीं जिम्मेदार माने जाएँ? जब प्रदेश के इन बड़े अधिकारियों की पुलिस एक्ट की धारा 2, 3 और 4 तथा सीआरपीसी की धारा 36 के अनुसार सीधी जिम्मेदारी है तो उन्हें कर्तव्यच्युतता के लिए क्यों नहीं दण्डित किया जाए? ऐसा क्यों और कब तक रहे कि अच्छा-अच्छा होने पर डीजीपी और एडीजीपी कूद कर उसका श्रेय लें और अपनी पीठ थपथपाएं और बाकी मामलों में शून्य में विलीन हो जाएँ. जब किसी को क्लीनचीट देना होता है तब तो बृजलाल घटना घटने के दो घंटों के अंदर घोषित कर देते हैं कि फलां विधायक निर्दोष है, और जब दोषी ठहराने की बात आती है तो एक दम से गायब हो जाते हैं. क्या यह किसी भी तरह जायज और न्यायसंगत है?

उसी प्रकार दूसरे मामले में जब स्वयं उच्चतम न्यायालय यह कहता है कि उच्च न्यायालय के कई जजों के खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कुछ बदबू कर रहा है और मैं न्यायालय से यह निवेदन करती हूँ कि ऐसे सभी जजों, जिनके विरुद्ध गंभीर शिकायतें हैं, के खिलाफ नियमानुसार कार्यवाही की जाए, तो क्या यह गलत है? मैं बहुत साफ़ मानती हूँ कि यदि उच्चतम न्यायालय खुलेआम कह रहा है कि हाई कोर्ट जजों की गंभीर शिकायतें हैं तो ऐसे जजों पर न्यायसंगत कार्यवाही भी होनी चाहिए. ऐसा नहीं होने पर पहले वाली टिप्पणी अपना अर्थ खो बैठेगी और लोगों में गलत सन्देश जाएगा. और यही बात यदि मैं न्यायालय के सम्मुख उठाती हूँ तो वह सस्ती लोकप्रियता पाना कैसे हो गया?

लोकप्रियता किसे अच्छी नहीं लगती. ऐसा कौन आदमी होगा जो पैसे और अन्य सुविधाओं के अलावा भरपूर मात्रा में नाम नहीं कमाना चाहेगा. इसीलिए यदि किसी भी व्यक्ति को कोई भी काम करने पर यह कह दिया जाए कि वह यह काम लोकप्रियता हासिल करने के लिए कर रहा है तो उसमें कुछ ना कुछ सच्चाई तो होगी ही. मैं समझती हूँ कि शायद लाखों-करोड़ों में एक-दो ऐसे आदमी होंगे जिनमें अपने नाम और अपनी शोहरत को लेकर किसी प्रकार की कोई इच्छा नहीं है. लोग राजनीति कर रहे हैं लोकप्रियता के लिए, सिनेमा में काम कर रहे हैं लोकप्रियता के लिए, क्रिकेट खिलाड़ी हैं तो लोकप्रियता की चाहत है. अन्य तमाम प्रोफेशन में भी आदमी चाहता है कि उनकी शोहरत और इज्जत बढे़. ऐसे में मैं भी एक साधारण प्राणी होने के नाते खुलेआम यह कह सकती हूँ कि अखबारों में अपना नाम पाकर या अन्य मीडिया साधनों में अपना जिक्र होने पर मुझे अच्छा लगता है. पर साथ ही मैं यह भी पूछती हूँ कि इसमें बुरा क्या है? क्या चर्चा में आना कोई बुरी बात है? क्या यह कोई अपराध है?

यह सही है कि अच्छा नाम और बुरे नाम में अंतर है. किसी व्यक्ति द्वारा हत्‍या, बलात्कार, नफरत फैलाने, दंगा कराने, वीभत्स कृत्य करने, अमानवीय कार्य करने के परिणामस्वरूप भी नाम पैदा किया जा सकता है और ऐसा हो भी रहा है. पर मैं चाह कर भी इस प्रकार के नाम को अच्छा नहीं कह सकती हूँ. इसके विपरीत यदि कोई समाज के लिए उपयोगी काम कर रहा है और देश और समाज की व्यवस्था और तंत्र को सुधारने की दिशा में अपने कुव्वत भर योगदान दे रहा है, तो मैं उसे किसी भी प्रकार से बुरा नहीं कह सकती, भले ही इस बारे में कोई भी संस्था किसी भी प्रकार की राय क्यों ना व्यक्त करे.

मैं मानती हूँ कि अब समय आ गया है जब अन्य संस्थाओं के अतिरिक्त हमें न्यायपालिका के कार्यों को ले कर भी लगातार सजग रहना चाहिए और यदि हमें ऐसे दृष्टांत दिखते हैं जहां उनके निर्णयों से हमारी सहमति नहीं बनती दिखती है तो हमें इस सम्बन्ध में खुल कर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए. ऐसा हमारे पूरे लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के लिए नितांत आवश्यक है.
इसीलिए मैं यह स्वीकार करने से इनकार करती हूँ आईआरडीएस द्वारा अथवा मेरे द्वारा इन दोनों मामलों में दायर की गयी याचिकाएं किसी भी प्रकार से अगंभीर अथवा हलके प्रकार की थीं. मैं यह मानती हूँ कि इन दोनों याचिकाओं में जो प्रश्न उठाये गए हैं वे बहुत ही गंभीर और महत्वपूर्ण हैं और अब हम सबों को इन प्रश्नों पर विचार करना ही होगा. इस प्रकार अब वह समय आ गया है कि नीचे के अधिकारियों, नीचे की न्यायपालिका के अतिरिक्त ऊपर के अधिकारियों और ऊपर की न्यायपालिका को भी अपने कार्यों के लिए जनता के समक्ष उत्तरदायी होना होगा. इनमे से कोई भी संस्था जनता से ऊपर नहीं है और ये सब आम जन के प्रति निश्चिततौर पर उतरदायी हैं.

इलाहाबाद बेंच के निर्णय से असहमत होने की दशा में इस सम्बन्ध में आईआरडीएस उच्च न्यायालय में रीव्यू पेटिशन दायर कर रहा है. हमारा यह स्पष्ट मत है कि पुलिस एक्ट की धारा 2, 3 और 4 तथा सीआरपीसी की धारा 36 के अनुसार प्रदेश पुलिस की सीधी जिम्मेदारी डीजीपी और स्पेशल डीजीपी अपराध की है तथा वे अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं ठहराए जा सकते. यह कत्तई उचित नहीं है कि चंद अधीनस्थ अधिकारियों पर कार्यवाही कर दी जाए और ये बड़े अफसर अपने दावित्व से विलग हो जाएँ. साथ ही हमारा यह भी मानना है कि जब स्वयं उच्च न्यायालय और मुख्यमंत्री को इन प्रकरणों में हस्तक्षेप करना पड़ा तो इतने से ही स्पष्ट है कि पुलिस के आला अधिकारियों के स्तर पर लापरवाही हुई थी.

इन्ही बातों के दृष्टिगत आईआरडीएस इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर रहा है क्योंकि उसका साफ़ मानना है कि उसके द्वारा किसी सस्ती लोकप्रियता अथवा निजी स्वार्थ के लिए नहीं, अपितु जनहित में पुलिस के बड़े अधिकारियों के कर्तव्यों से सम्बंधित यह महत्वपूर्ण प्रश्न इस जनहित याचिका के द्वारा उठाया गया था. इस प्रक्रिया में आईआरडीएस पर जो भी जुर्माना लगाया जाएगा, आईआरडीएस उसे प्रयास कर पूरा करेगा पर वह मानने से इनकार करता है कि उत्तर प्रदेश के डीजीपी और एडीजीपी बहुत जिम्मेदार अधिकारी हैं, क्योंकि यदि ये इतने ही जिम्मेदार होते तो फिर स्वयं उच्च न्यायालय को इसमें क्यों हस्तक्षेप करना पड़ता? यदि समाज के हत्यारे, बलात्कारी, दंगाई, वीभत्स कृत्य करने वाले, बेईमान, चोर लोग इन्हीं  न्यायालयों में अपने व्यक्तिगत मामलों को ले कर पहुँचते हैं तब तो उनकी याचिका खारिज करते समय उन पर जुर्माना नहीं लगता, पर यदि आईआरडीएस पर जनहित का एक मुद्दा सामने लाने के लिए जुर्माना लगा है तो मैं इसे एक तमगे के रूप में लेती हूँ और आगे भी इस तरह के मुद्दे बार-बार उठाने का प्रण करती हूँ, चाहे इस प्रक्रिया में मेरा कोई भी हित-अहित हो.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस, लखनऊ


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