जूती चमकाने वाले का एक पद होना चाहिए

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संजय कुमार सिंह: जैसे उप राष्ट्रपति के जूते संभालने वाला वह शख्स लाल बत्तियों में घूम रहा था, मेरे साथ : नेताओं के जूते झाड़ने वालों पर प्रतिक्रिया – एक ये और एक वो : मायावती की जूती साफ करने वाले पुलिस अधिकारी की खबर पढ़कर मुझे 1988-89 का एक मामला याद आ गया।

जनसत्ता में काम करते हुए एक दिन मुख्य संवाददाता कुमार आनंद ने पूछा कि कल सुबह उपराष्ट्रपति (तत्कालीन, डॉ. शंकर दयाल शर्मा) के साथ कलकत्ता जाओगे? साथ ही उन्होंने यह भी बताया था कि विशेष विमान से जाना है, दो दिन शांतिनिकेतन में कार्यक्रम है और वहां से खबरें भेजने के लिए वे टेलीग्राफिक अथॉरिटी का भी बंदोबस्त कर देंगे। उस समय तक मैंने हवाई जहाज में चढ़ना तो दूर जमीन पर खड़ा विमान भी नहीं देखा था। ना कहने का कोई सवाल नहीं था। उपराष्ट्रपति के साथ रिपोर्टिंग करने का मौका – पत्रकारिता की दृष्टि से भी बड़ा असाइनमेंट लगा था।

कलकत्ता पहुंचा, बहुत अच्छा लगा, हम पश्चिम बंगाल सरकार के राजकीय अतिथि थे और सुरक्षा की दृष्टि से हमें इस आशय के बैज दिए गए थे जिनपर अंग्रेजी में लिखा था – मीडियामेन अकमपनिंग दि वाइस प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया। जमशेदपुर जैसे छोटे शहर से आने के बाद अचानक इतना सब पा-देखकर खूब खुश था। दुख सिर्फ ये कि किसी तरह परिचितों को बता पाता कि मैं कहां हूं, क्या कर रहा हूं आदि। पर कोई संभावना या गुंजाइश नहीं थी। उन दिनों तो खबर भेजने के लिए फोन करना संभव नहीं होता था हवाबाजी कहां संभव थी। काश उस समय एसएमएस और फेसबुक होता!!

कलकत्ता से शांति निकेतन उपराष्ट्रपति को हेलीकॉप्टर से जाना था।  उनके साथ कुछ ही लोग जा सकते थे बाकी को कार से जाना था। बताया गया तीन-चार घंटे लगेंगे। मैंने कार से ही जाना पसंद किया। क्योंकि तब तक एक शहर से दूसरे शहर की यात्राएं भी बसों में ही हुई थीं। कार से कभी हाईवे पर चलने का मौका नहीं मिला था। खैर जब कारें आईं तो लाल बत्ती वाली सफेद एम्बैसडर (पांच-सात थीं शायद) सफेद सीट कवर और पर्दों के साथ। दो-दो लोग ही बैठे। मजा आ गया। आगे पायलट कार और शहर से बाहर निकलने तक तो मोटर साइकिल सवार पुलिस वाले भी थे जिसने एक मोटरसाइकिल सवार को रास्ता न देने के लिए डांटा (शायद गाली दी)। बाद में शायद गाड़ियों का काफिला देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। एक मोटर साइकिल वाला तो पलट भी गया।

रास्ते में हमलोग एक जगह रुक गए (थे तो सब झोला छाप ही) किसी ने पूछा के? (बांग्ला में कौन के लिए) हम कुछ कहते उससे पहले ही उसने पूछा मंत्री? हममें से किसी ने टालने के अंदाज में हां कह दिया और उसके बाद उसने पूछ दिया कि हममें से कौन मंत्री है तो हमलोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे क्योंकि हममें से कोई ऐसा नहीं था जिसे मंत्री कहा जा सकता। खैर, हमलोग शांति निकेतन पहुंचे। वहां का कार्यक्रम हुआ और वापसी में हमलोगों के हेलीकॉप्टर से ही लौटने की व्यवस्था की गई और हम बीच कलकत्ता शहर में हेलीकॉप्टर से उतार दिए गए। यह एक अलग रोमांचक और वीवीआईपी अनुभव था। वहां से निकले तो 70 गाड़ियों का काफिला था और हमारी गाड़ी आगे की चार-पांच गाड़ियों में थी। यह अहसास बिल्कुल नहीं था कि इस शानदार यात्रा का यह वृतांत मैं जूते साफ करने के एक मामले से प्रेरित होकर लिखूंगा।

इस यात्रा के दौरान मुझे बार-बार लग रहा था कि मैंने जनसत्ता में नौकरी नहीं पाई, कोई मैदान मार लिया है। पता नहीं कैसे यह जिज्ञासा उठी कि राष्ट्रपति की टीम में अखबार वालों के साथ कौन-कौन है। मुझे यह जानकर भयंकर आश्चर्य हुआ कि उप राष्ट्रपति के साथ इस राजकीय यात्रा में एक व्यक्ति उनके जूते संभालने के लिए भी था। पता नहीं क्यों, इस जानकारी के बाद मुझे भारी निराशा हुई और लगा कि अगर जूते संभालने वाला एक व्यक्ति भी मेरी ही तरह राजकीय अतिथि है, लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूम रहा है और 70 गाड़ियों के काफिले में चल रहा है तो मैंने क्या तीर मार लिया?

समय निकलता गया। पर मेरे मन में जूते संभालने वाले की राजकीय यात्रा गंभीरता से बैठ गई। रिपोर्टिंग करते हुए मैंने यात्राएं खूब कीं, पांच सितारा होटलों में ठहरा और खाया भी खूब (100 किलो के शरीर में इसका भी योगदान है) पर पत्रकारिता को जब भी कोई अच्छा पेशा बताता है तो मैं यही कहता कि किस्मत अच्छी हो तो जूते संभालने वाला भी वीवीआईपी राजकीय अतिथि हो सकता है। और अगर हवाई जवाज में घूमना ही सफलता है तो एयर होस्टेस आदि सबसे अच्छे हैं। 20 वर्ष से भी ज्यादा हो गए आज मायावती के जूते साफ करने वाले के बारे में पढ़, देखकर सोच रहां हूं कि राष्ट्रपति के जूते संभालने वाला वह अधिकारी कोई आईएएस तो नहीं था? अगर था तो मेरी पूरी अवधारणा उलट गई – अब मुझे कहना पड़ेगा कि आईएएस भी नालायक हो तो जूते ही साफ करेगा (लालू यादव के राज में पीकदान संभालेगा) और जूते संभालने वाला भी योग्य हो तो उपराष्ट्रपति के संभालेगा। वैसे, मायावती जी को बिन मांगे सलाह है कि एक पद जूती चमकाने वाले का बना ही डालें।

लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता, दिल्ली से जुड़े रहे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना खुद का काम शुरू किया. अनुवाद के काम को संगठित तौर पर शुरू किया. ब्लागिंग में सक्रिय रहे. सामयिक मुद्दों पर लिखते-पढ़ते रहते हैं.


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